मोदी सरकार ने जामिया मिलिया इस्लामिया को अल्पसंख्यक दर्जा देने का किया विरोध, हाईकोर्ट में दिया हलफनामा

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केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक हलफनामा दाखिल कर जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिए जाने के फैसले को गलत ठहराते हुए विरोध किया है। बता दें कि केंद्र ने यूनिवर्सिटी को धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिए जाने का विरोध कर रही है। एक तरह से देखा जाए तो मोदी सरकार पूर्व की यूपीए सरकार के फैसले को पलटने की तैयारी कर रही है।

(Source: Express Photo)

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार ने यह हलफनामा 5 मार्च को दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल किया है, जिसे 13 मार्च को हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर लिया है। बता दें कि यूपीए सरकार में 2011 में तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटी एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स (एनसीएमईआई) के फैसले का समर्थन किया था और कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर जामिया के अल्पसंख्यक संस्थान होने की बात मानी थी।

दरअसल, 2011 में एनसीएमईआई ने कहा था कि जामिया की स्थापना मुस्लिमों द्वारा और मुस्लिमों के फायदे के लिए की गई थी और यह संस्थान अपनी मुस्लिम पहचान को कभी नहीं छोड़ेगा। इसके बाद जामिया ने एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों को आरक्षण देने से इनकार कर दिया। वहीं, मुस्लिम छात्रों के लिए हर कोर्स में आधी सीटें आरक्षित कर दी। 30 फीसदी सीट जहां मुस्लिम छात्रों के लिए, वहीं 10 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं के लिए और 10 प्रतिशत मुस्लिम पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कर दी गई।

मोदी सरकार ने किया विरोध

अब मोदी सरकार ने नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटी एजुकेशनल इंस्टीट्यूशनस (एनसीएमईआई) के उस फैसले पर असहमति जताई है, जिसमें एनसीएमईआई ने जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी को धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिया है। सरकार ने अपने स्टैंड के पक्ष में कोर्ट में दाखिल किए अपने हलफनामे में अजीज बाशा बनाम भारत गणराज्य केस (साल 1968) का हवाला देते हुए बताया कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जो यूनिवर्सिटी संसद एक्ट के तहत शामिल है, उसे अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा नहीं माना जा सकता।

सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि ऐसा जरुरी नहीं है कि जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के बोर्ड का निर्वाचन होता है और जरुरी नहीं है कि इसमें मुस्लिम धर्म को मानने वालों की ही अधिकता हो। ऐसे में जामिया के अल्पसंख्यक संस्थान होने का सवाल ही नहीं उठता। इसके साथ ही हलफनामे में कहा गया है कि जामिया अल्पसंख्यक संस्थान इसलिए भी नहीं है, क्योंकि इसे संसद एक्ट के तहत बनाया गया और केंद्र सरकार इसे फंड देती है। जिस वजह से इस संस्थान को अल्पसंख्यकों द्वारा भी स्थापित नहीं किया गया है।

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