उत्तराखंड में इस समय चुनाव का माहौल है, तो आइए आज हम आपको उत्तराखंड के कुछ ऐसे गांव के बारे में बताते है जहां के हालात जुदा हैं। यहां तो जिसने एक बार गांव से विदा ली दोबारा वहां का रुख नहीं किया। गुजरे 16 सालों में तो पलायन की रफ्तार थमने की बजाए ज्यादा तेज हुई है। बता दें कि, सूबे के कुल 16793 गांवों में से तीन हजार का वीरान होना इसकी तस्दीक करता है, दो लाख 57 हजार 875 घरों में ताले लटके हैं। अब तक यहां की सरकारों ने शायद ही कभी पलायन के मुद्दे पर गंभीरता से मंथन कर इसे थामने के प्रयास किए हों। इसी का नतीजा है कि रोजगार के लिए न तो पहाड़ में उद्योग चढ़ पाए और न मूलभूत सुविधाएं ही पसर पाईं।
उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों के सुदूरवर्ती गांवों के हालात आज भी ठीक वैसे ही हैं जैसे राज्य बनने से पहले थे। आइए अब आपको थोड़ा यहां के हालत के बारे में बताते है जिसका पता भी आपको जरुर होना चाहिए। राज्य में सरकारी अस्पताल तो खुले हैं, लेकिन इनमें चिकित्सकों के आधे से अधिक पद खाली हैं। रोजगार के अवसरों को लें तो 2008 में पर्वतीय औद्योगिक प्रोत्साहन नीति बनी, मगर उद्योग पहाड़ नहीं चढ़ पाए।
करीब चार हजार के करीब तो गांवों को बिजली का इंतजार है। जिन क्षेत्रों में पानी, बिजली आदि की सुविधाएं हैं, उनमें सिस्टम की बेपरवाही किसी से छिपी नहीं है। एनुअल स्टेटस आफ एजुकेशन की रिपोर्ट बताती है कि बुनियादी शिक्षा बदहाल है। सरकारी प्राथमिक स्कूलों में 40 फीसद से अधिक बच्चे गुणवत्ता के मामले में औसत से कम हैं। 71 फीसद वन भूभाग होने के कारण पहाड़ में तमाम सड़कें अधर में लटकी हुई हैं।