क्या शहादत का बदला बेकसूर कश्मीरियों को निशाना बनाकर पूरा होगा?

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90 का दशक (बशारत पीर की किताब कर्फ़्यूड नाइट (Curfewed Night- Basharat peer) का हिस्सा)

”तुम हमारे बेटे हो, तुम हमारे अपने गाँव के हो, तुम इस हमले को रोक सकते हो, तुम जानते हो ना इस हमले के बाद सैनिक हमारा क्या करेंगे, तुम चाहते हो तुम्हारा गाँव जले? तुम कैसे भूल सकते हो हमारी जवान बेटियाँ हैं… ख़ुदा का ख़ौफ़ खाओ ये तुम्हारा अपना गाँव है” लेकिन टांगा नहीं रुका और इसके आगे की कहानी आंखों को नम करने वाली है।

सैनिक

क्या 14 फ़रवरी 2019 के दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा? क्या फ़िदायीन हमले के लिए निकल रहे उसे लड़के को भी किसी ने रोका होगा? क्या उसे भी किसी ने उसके बाद बिगड़ने वाले हालात का डर दिखाया होगा? क्या कोई मां बाप अपने बच्चों के भटके क़दमों के निशान पर ज़िल्लत की छाप बर्दाश्त कर सकते हैं? पुलवामा हमला से निकले कई सवालों में से एक सवाल ये भी होगा?

कश्मीर पर नज़र रखने वाले जानकार बता रहे हैं कि कश्मीर में एक बार फिर हालात 90 के दशक जैसे हो गए हैं अगर हालात वैसे हैं तो ये कश्मीर के लिए ही नहीं बल्कि पूरे मुल्क़ के लिए चिंता की ख़बर है क्योंकि इस हमले के बाद जो आवाज़ें पीड़ित परिवार के लिए उठनी चाहिए थी वो कुछ और ही चिल्ला रही हैं। क्या इस वक़्त शहीद जवानोंं के मासूम बच्चों, बुज़ुर्ग मां बाप और उनके पीछे छूट गई ज़िम्मेदारियों से ज़्यादा कुछ हो सकता है?

शायद है, और वो है बदला पर ये बदला किससे लिया जाना चाहिए ये ज़रूर सोचना होगा, बदला यूं ही गली मुहल्लों में पंचायत लगाकर अपने लोगों से लिया जाएगा या फिर ये काम सरकार का है?

क्या सोशल मीडिया पर बैठे रणबांकुरे देश की रौ तय करेंगे? आख़िर क्यों हमले के बाद एक गहरी खाई नज़र आने लगी है? क्यों एक बार फिर गहरी लकीर खींच दी गई है। जिसके एक तरफ़ वो हैं जो हमला, बदला, कश्मीर खीर चीर जैसी मांग से कम की बात नहीं करते। क्यों राह से गुज़रते वक़्त एक मुसलमान के कानों में फुसफुसाहट भी चीरती हुई दाख़िल हो जाती है? क्यों फिर किसी मुसलमान को देशभक्ति का सर्टिफिकेट तलाशने की ज़रूरत पड़ जाती है और क्यों फिर से कश्मीरी दूर खड़े तन्हा दिखाई देते हैं।

सोशल मीडिया के ज़हर और बयान बहादुरों ने बड़े ही महीन और धीरे धीरे बुने देश के ताने बाने को एक ही झटके में हिलाकर रख दिया। देश बदला चाहता है पर वो बदला सीमा पर पाकिस्तान से लिया जाएगा या फिर कश्मीरी लड़कियों के हॉस्टल को घेरकर, कश्मीरी किरायेदारों को बेघर कर, दिल्ली और दूसरे शहरों में रह रहे कश्मीरी लोगों को खदेड़ कर या फिर जबरन उनसे भारत माता की जय बुलवा कर लिया जाएगा? आख़िर ये कैसी देशभक्ति है जो ख़ुद के ज़ाहिर करने से ज़्यादा कश्मीरी और मुसलमानों का कलेजा फाड़कर उसमें झांक कर देखना चाहती है कि कहीं किसी कोने में उसने पाकिस्तान को तो नहीं छुपा रखा।

पुलवामा हमले के बाद कुछ राज्यों में कश्मीरी लोगों को घेरा जा रहा है उन्हें उस बात की सज़ा दी जा रही है जिसमें वो शामिल ही नहीं हैं। क्या शहादत का बदला बेकसूर कश्मीरियों को निशाना बना कर पूरा होगा? क्यों हम अपने ही लोगों को ख़ुद से दूर जाने पर मजबूर कर रहे हैं? सरकार बार बार देश का माहौल ना बिगाड़ने की अपील कर रही है पर उसपर हमारी ‘जिम्मेदार’ सोशल मीडिया ‘आर्मी’ और मीडिया ने क्या किया है ये उसे ज़रूर अपने गिरेबान में झांक कर देखना होगा अपने ज़मीर को बताना होगा कि TRP से आगे जहां और भी है। देशभक्ति भी राज्यों में बांट दी गई है।उत्तराखंड रो रहा है क्योंकि उसने अपने बेटे को खो दिया पर 76वीं बटालियन के राजौरी के नासीर अहमद की शहादत
के बावजूद देश के कई हिस्सों में कश्मीरियों से उनकी देशभक्ति का वो सबूत मांगा जा रहा है जिसपर ‘भारत माता की जय’ का नारा लिखा हो।

चुनाव क़रीब है और मुद्दा शहीद जवानों की मदद से दूर और युद्ध के क़रीब है, देश में बेरोज़गारी बहुत है तो हर गली के चार छह लड़कों को देशभक्ति झाड़ने का रोज़गार मिल गया। फुलटाइम नौकरी नहीं मिली तो क्या हुआ पार्टटाइम देशभक्ति ही मिल गई। बाक़ी बजंरग दल और हिन्दू महासभा तो ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ का फंडा डंडा लेकर करना जानती है ही। कौन हैं ये लोग जिन्हें रोकने वाला कोई नहीं? जवानों पर हमला और पाकिस्तान से बदला लेने के बीच कुछ सवाल हैं पर माहौल ऐसा बना दिया गया कि सवाल उठाने वाला देशद्रोही घोषित कर दिया जाएगा और अगर ग़लती से वो मुसलमान या फिर कश्मीरी है तो गद्दार का टैग भी तैयार है। तो जो सवाल उठ रहे हैं वो दफ़न कर दीजिए क्योंकि यहां शहादत पर तलवारें खिंचती हैं सवाल पूछने की रवायत तो ख़त्म ही कर दी गई है।

वो दिन याद आते हैं जब घर के छोटे बच्चे घर में स्कूल की पोयम से ज़्यादा उस तराने को गुनगुनाते थे जिसके अल्फ़ाज़ थे --
हो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी
जिन्दगी शमा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी

मैं कोई मंजी हुई जानकार नहीं पर जैसा माहौल बना था मैं पहले ही भांप गई थी कि कश्मीरियों पर गाज गिरना तय है एक कश्मीरी दोस्त से बात की तो जो जवाब मिले उसमें डर के साथ घुली हुई मायूसी थी जो दिल तोड़ने वाली थी, ज़्यादा कुछ नहीं बस इनता ही लिखना चाहती हूं जैसे हर मुसलमान आतंकी नहीं होता वैसे हर कश्मीरी हमलावर नहीं है ये हमारे अपने लोग हैं।

(लेखक टीवी पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ‘जनता का रिपोर्टर’ उत्तरदायी नहीं है।)

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