अलीगढ़ मर्डर केस: “मज़हब की चादर में लपेट कर दर्द को दफ़न करने की कोशिश”

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एक दिन पहले जो ईद की मुबारकबाद दे रहे थे, अलीगढ़ की हैवानियतभरी ख़बर के सामने आते ही असली और सच्चे मुसलमान का सर्टिफिकेट बांटने की दुकान सजा कर बैठ गए। और इस बात की पड़ताल में लग गए कि ‘हमने’ विरोध किया कि नहीं? यक़ीनन उन्हें मायूसी मिली होगी, क्योंकि उन दरिंदरों की पैरवी के लिए ना तो मुसलमानों ने कोई जुलूस निकाला और ना ही कोई रैली की। कुछ को आरोपियों में हैवान कम मुसलमान ज़्यादा दिखाई देने लगे। देखते ही देखते सोशल मीडिया पर एक बार फिर नफ़रत का काउंटर खुल गया।

Photo: Indian Express

वैसी ही आंखे, वैसी ही मासूमियत, गोलू मोलू सी, बिल्कुल आसिफ़ा की तरह रूई के फ़ाहे जैसी थीं तुम, माफ़ करना बेटी तुम्हारी तुलना एक ऐसी बच्ची से कर रही हूं जो तुम्हारी ही तरह दरिंदगी की शिकार हो गई थी। कहते हैं बेटियां सबकी एक सी होती हैं, लेकिन जाने क्यों लोगों को आसिफ़ा के लिए उठी आवाज़ और तुम्हारे लिए उठ रही आवाज़ में फ़र्क दिख रहा है।

क्या करें ये तंग नज़र लोग हैं जो दिल से नहीं सियासी नज़रों से परखते हैं। तुम्हारे मम्मी पापा का दर्द भी तो वैसा ही होगा जैसा आसिफ़ा के अम्मी और अब्बू का। लेकिन, देखो ना दर्द को भी हम मज़हब की तलवार से काटकर अलग करने का हुनर रखते हैं। किसी ने कहा कि ”बच्ची को मौत के घाट उतार कर आरोपियों ने ईद मनाई, तो कोई कह रहा है कि अगर सच्चे मुसलमान हो तो इनका विरोध करो”।

क्या वाकई ज़हनी तौर पर हम इतने कमज़ोर हो गए हैं कि बच्चियों की मौत को मज़हब की चादर में लपेट कर उनके दर्द को दफ़न करने की कोशिश में लगे हैं? क्या वाकई बच्चियों का कोई मज़हब होता है? फिर क्यों तुम्हारे दर्द और मौत से ज़्यादा हमें उठ रही आवाज़ों में हिन्दू और मुसलमान आवाज़ की तलाश है?

ये ख़बर सुनकर क्या हर मां की तरह एक मुसलमान मां का कलेजा भी क्या मुंह को नहीं आ गया होगा? क्या वो भी सिहर नहीं उठी होगी? क्या वो भी अपनी बेटी के लिए और फ़िक्रमंद नहीं हो गई होगी? क्या किसी मुसलमान मां ने इन दरिंदों के मुसलमान होने पर कहकहा लगाया होगा?

कैसे कोई समझाए हर दिन ऐसी ही हैवानियत की शिकार हो रही बच्चियों का मज़हब तो सिर्फ़ मासूमियत है, फिर क्यों उनके लिए उठ रही आवाज़ों में मज़हब की लकीर खींच कर मुसलमानों को दूसरी तरफ़ खदेड़ा जा रहा है और ना सिर्फ़ खदेड़ा जा रहा है बल्कि गुनहगानों की सफ़ में खड़ा कर दिया जा रहा है।

क्या कोई मुसलमान इन दरिंदों की पैरवी कर सकता है? कैसे कोई मासूम बच्चियों के गुनहगारों के हक में रैलियां निकाल सकता है? कोई हमसे सवाल कर रहा है और हमें मुनीर नियाज़ी का ये शेर याद आ रहा है।

किसी को अपने अमल का हिसाब क्या देते
सवाल सारे ग़लत थे जवाब क्या देते

(लेखक टीवी पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।)

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