मोदी कैबिनेट ने तीन तलाक के बिल को दी मंजूरी, अब संसद में होगा पेश

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मोदी कैबिनेट ने शुक्रवार (15 दिसंबर) को तीन तलाक के खिलाफ लाए गए प्रस्तावित कानून ‘मुस्लिम विमिन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन मैरेज बिल’ को मंजूरी दे दी है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में मंजूरी दी गई है। बता दें कि यह प्रस्तावित कानून केवल एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) के मामलों पर ही लागू होगा।Triple talaqअब केंद्र सरकार इस बिल को बहस के लिए संसद के दोनों सदनों (लोकसभा-राज्यसभा) में अगले हफ्ते में पेश कर सकती है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम समुदाय में तीन तलाक की प्रथा को समाप्त करने और इसे एक दंडनीय अपराध बनाने से जुड़े मोदी सरकार के इस बिल का आठ राज्यों ने समर्थन किया है।

कानून मंत्रालय ने लगभग एक पखवाड़े पहले जुबानी, लिखित या किसी इलेक्ट्रॉनिक तरीके से तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को देने पर प्रतिबंध लगाने और इसे एक दंडनीय और गैर-जमानती अपराध बनाने से जुड़े प्रस्तावित कानून पर सभी राज्य सरकारों से राय मांगी थी।

बता दें कि केंद्र सरकार ने ‘मुस्लिम वीमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन मैरेज बिल’ के नाम तीन तलाक पर रोक लगाने के लिए बिल लाया है। बिल के कानून बनने के बाद यह सिर्फ तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) पर लागू होगा। कानून बनने के बाद अगर कोई शख्स तीन तलाक देगा तो वो गैर-कानूनी होगा। कानून में तीन तलाक पर तीन साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान हो सकता है।

इस मसौदे को गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में गठित मंत्रियों के समूह ने तैयार किया है। समूह के अन्य सदस्यों में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, वित्त मंत्री अरुण जेटली, कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद और मंत्रालय में उनके जूनियर पी. पी. चौधरी शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कानून बनने से पीड़ितों को अधिकार मिल जाएगा, जिससे वे मैजिस्ट्रेट के पास जाकर अपने और बच्चों के लिए गुजारा भत्ते की मांग कर सकें।

इतना ही नहीं, महिला मैजिस्ट्रेट से अपने नाबालिग बच्चों की कस्टडी लेने की भी मांग कर सकती है। कानून के मसौदे के तहत ट्रिपल तलाक किसी भी रूप में- बोलकर, लिखित या ईमेल, SMS और वॉट्सऐप से अवैध और अमान्य होगा।साथ ही गुजारा भत्ता और कस्टडी का प्रावधान यह सुनिश्चित करने के लिए रखा गया है कि अगर पति पत्नी को घर से निकलने को कहता है तो पीड़ित महिला के पास कानूनी सुरक्षा होनी चाहिए।

प्रस्तावित बिल में अपनी पत्नियों को तीन बार ‘तलाक’ बोलकर तलाक देने की कोशिश करने वाले मुस्लिम पुरुषों को तीन वर्ष की कैद की सजा देने और पीड़ित महिलाओं को कोर्ट से गुहार लगाकर उचित मुआवजा और अपने नाबालिग बच्चों की कस्टडी मांगने की अनुमति देने का प्रस्ताव है। कानून के मसौदे के अनुसार, यह जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को बताया था असंवैधानिक

बता दें कि इसी साल 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने तीन-दो के बहुमत से ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए तीन तलाक को खत्म करते हुए असंवैधानिक करार दिया था। साथ ही शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से इस संबंध में छह महीने के अंदर कानून बनाने को कहा था। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जस्टिस जगदीश सिंह खेहर और जस्टिस नजीर ने अल्पमत में दिए फैसले में कहा था कि तीन तलाक धार्मिक प्रथा का हिस्सा है, इसलिए कोर्ट इसमें दखल नहीं देगा।

हालांकि दोनों जजों ने माना कि यह पाप है, इसलिए सरकार को इसमें दखल देना चाहिए और तलाक के लिए कानून बनना चाहिए। दोनों जजों ने कहा था कि तीन तलाक पर छह महीने का रोक लगाया जाना चाहिए, इस बीच में सरकार कानून बना ले और अगर छह महीने में कानून नहीं बनता है तो रोक जारी रहेगा। साथ ही खेहर ने यह भी कहा था कि सभी पार्टियों को राजनीति को अलग रखकर इस मामले पर फैसला लेना चाहिए।

जबकि न्यायमूर्ति जोसेफ, न्यायमूर्ति नरीमन और न्यायमूर्ति उदय यू ललित ने इस मुद्दे पर प्रधान न्यायाधीश और न्यायमूर्ति नजीर से स्पष्ट रूप से असहमति व्यक्त की थी कि क्या तीन तलाक इस्लाम का मूलभूत आधार है। बता दें कि पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने छह दिनों की मैराथन सुनवाई के बाद 18 मई को इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। पीठ ने ग्रीष्मावकाश के दौरान 11 से 18 मई तक सुनवाई की थी।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित इस संविधान पीठ में विभिन्न धार्मिक समुदायों से ताल्लुक रखने वाले न्यायाधीश शामिल थे। जस्टिस अब्दुल नजीर (मुस्लिम) के अलावा जस्टिस कुरियन जोसेफ (ईसाई), आरएफ नरीमन (पारसी), यूयू ललित (हिंदू), और इस बेंच की अध्यक्षता कर रहे सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश जेएस खेहर (सिख) शामिल थे।

 

 

 

 

 

 

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