सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में पटाखों की बिक्री पर लगाई रोक

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार(9 अक्टूबर) को दिल्ली-एनसीआर में दिवाली पर पटाखों की बिक्री पर रोक लगा दी है। दिवाली के अवसर पर पटाखों के कारण होने वाले प्रदूषण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1 नवंबर तक के लिए दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर रोक लगा दी है। यानी 11 नवंबर 2016 का बिक्री पर रोक का आदेश फिर से बरकरार रहेगा।

File Photo: Reuters

शीर्ष अदालत में दायर याचिका में कोर्ट से गुहार लगाई गई थी कि कोर्ट 12 सितंबर के अपने उस आदेश को वापस ले जिसमें कोर्ट ने शर्तों के साथ दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर लगी रोक हटाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये बैन 1 नवंबर 2017 तक बरकरार रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दिवाली के बाद इस बात की भी जांच की जाएगी कि पटाखों पर बैन के बाद हवा की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि एक नवंबर के बाद पटाखों की बिक्री फिर से शुरू की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बार ये टेस्ट करना चाहते हैं कि पटाखों पर बैन के बाद क्या हालात होंगे?

बता दें कि पिछली सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ए के सीकरी की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस याचिका का समर्थन किया था और कहा कि 11 नवंबर 2016 के आदेश को बहाल किया जाना चाहिए और दिल्ली एनसीआर में पटाखों के प्रयोग पर पाबंदी लगनी चाहिए।

शीर्ष अदालत ने इस आदेश के जरिये सभी लाइसेंसों को निलंबित कर दिया था जो एनसीआर क्षेत्र में पटाखों की थोक और खुदरा बिक्री की अनुमति देते थे। शीर्ष अदालत ने इस साल 12 सितंबर को पिछले आदेश को अस्थायी रूप से वापस लिया था।

पिछली सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अर्जुन गोपाल की ओर से पेश अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पीठ को बताया कि पटाखों के प्रयोग पर लगी पाबंदी का आदेश फिर से दिया जाना चाहिए क्योंकि एनसीआर में पिछले साल दिवाली के दौरान और इसके बाद वायु प्रदूषण में बहुत बढोत्तरी हुई थी।

उन्होंने कहा था कि पिछली दिवाली के दौरान वायु प्रदूषण में बढोत्तरी कई कारणों से हुई जिसमें बड़े पैमाने पर पटाखों का प्रयोग शामिल है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से पेश अधिवक्ता विजय पंजवानी ने कहा था कि वह याचिकाकर्ता के अनुरोध का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा था कि मैं याचिकाकर्ता का विरोध नहीं कर रहा हूं। 11 नवंबर 2016 का आदेश बहाल होना चाहिए।

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