राफेल सौदा विवाद: मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया, क्‍यों HAL को दरकिनार कर रिलायंस को बनाया ऑफसेट पार्टनर

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पिछले काफी दिनों से राफेल विमान की कीमतों को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और विपक्ष के बीच छिड़ा विवाद अब थम सकता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन करते हुए मोदी सरकार ने राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की कीमत का ब्योरा सोमवार (12 नवंबर) को सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंप दिया। राफेल की कीमतों का खुलासा करने से इनकार करने के बाद केंद्र सरकार ने सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में जानकारी दी। इसके साथ ही केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट समेत सभी याचिकाकर्ताओं को यह भी बताया कि यह पूरा सौदा कैसे हुआ।

खबरों के मुताबिक, दस्तावेज में विस्तार से राफेल विमान की कीमत के साथ-साथ यह भी बताया गया है कि सौदे में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) पीछे क्यों रह गई और अनिल अंबानी के रिलायंस समूह की एक कंपनी का चयन फ्रांस की विमान निर्माता कंपनी दसॉल्ट एविएशन के साथ हुआ। सरकार ने बताया कि फ्रांस से 36 लड़ाकू राफेल विमानों की खरीद में 2013 की ‘रक्षा खरीद प्रक्रिया’ का पूरी तरह पालन किया गया और ‘बेहतर शर्तों’ पर बातचीत की गयई थी।

इसके साथ ही केंद्र ने कहा कि इस सौदे से पहले मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति ने भी अपनी मंजूरी प्रदान की थी। इस हलफनामे का शीर्षक ‘36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का आदेश देने के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया में उठाए गए कदमों का विवरण’ है। सरकार ने 14 पन्नों के हलफनामे में कहा है कि राफेल विमान खरीद में रक्षा खरीद प्रक्रिया-2013 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया गया। इस हलफनामे का शीर्षक ‘36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का आदेश देने के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया में उठाए गए कदमों का विवरण’ है।

सरकार ने बताई सौदे की प्रक्रिया

आपको बता दें कि एनडीए सरकार में हुए राफेल सौदे को लेकर देश में राजनीतिक घमासान मचा हुआ है और कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष सरकार पर लगातार हमले बोल रहा है। केंद्न विमानों की कीमत बताने के शुरू से खिलाफ रहा है, लेकिन रिपोर्ट में इसकी जानकारी दी गई है। शीर्ष अदालत के 31 अक्टूबर के आदेश का पालन करते हुए निर्णय लेने की प्रक्रिया और कीमत का ब्यौरा पेश किया गया। न्यायालय अब दोनों दस्तावेजों पर गौर करेगा।

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक एक वरिष्ठ विधि अधिकारी ने बताया कि विभिन्न आपत्तियों के मद्देनजर सौदे के मूल्य का ब्यौरा न्यायालय में एक सीलबंद लिफाफे में दिया गया है। दस्तावेज में कहा गया है कि राफेल विमान खरीद में रक्षा खरीद प्रक्रिया-2013 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया गया और मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति ने 24 अगस्त, 2016 को उस समझौते को मंजूरी दी जिस पर भारत और फ्रांस के वार्ताकारों के बीच हुई बातचीत के बाद सहमति बनी थी।

दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि इसके लिये भारतीय वार्ताकार दल का गठन किया गया था जिसने करीब एक साल तक फ्रांस के दल के साथ बातचीत की और अंतर-सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले सक्षम वित्तीय प्राधिकारी, मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति, की मंजूरी भी ली गई। 23 सितंबर 2016 को दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों ने अंतर-सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए।

क्या है पूरा मामला?

राफेल सौदे को लेकर कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि एनडीए सरकार हर विमान को करीब 1,670 करोड़ रुपये में खरीद रही है जबकि यूपीए सरकार जब 126 राफेल विमानों की खरीद के लिए बातचीत कर रही थी तो उसने इसे 526 करोड़ रुपये में अंतिम रूप दिया था। दस्तावेज में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा दोहराए गए आरोपों का भी जिक्र किया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑफसेट पार्टनर के रूप में अनिल अंबानी के रिलायंस समूह की एक कंपनी का चयन करने के लिए फ्रांस की विमान निर्माता कंपनी दसॉल्ट एविएशन को मजबूर किया ताकि उसे 30,000 करोड़ रुपये ‘दिए जा सकें।’

सुप्रीम कोर्ट में दो वकीलों एमएल शर्मा और विनीत ढांडा के अलावा एक गैर सरकारी संस्था ने जनहित याचिकाएं दाखिल कर सौदे पर सवाल उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने गत 31 अक्टूबर को सरकार को सील बंद लिफाफे में राफेल की कीमत और उससे मिले फायदे का ब्योरा देने का निर्देश दिया था। साथ ही कहा था कि सौदे की निर्णय प्रक्रिया व भारतीय आफसेट पार्टनर चुनने की जितनी प्रक्रिया सार्वजनिक की जा सकती हो उसका ब्योरा याचिकाकर्ताओं को दे। सरकार ने आदेश का अनुपालन करते हुए ब्योरा दे दिया है।

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