कोबरापोस्ट ने भारतीय इतिहास के सबसे बड़े वित्तीय घोटाले का किया भंडाफोड़, DHFL पर लगा आम जनता का करीब 1 लाख करोड़ रुपये घपले का आरोप, BJP को 20 करोड़ रुपये का दिया चंदा

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मशहूर खोजी वेबसाइट कोबरापोस्ट आज यानी मंगलवार (29 जनवरी) को 31,000 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का खुलासा कर सनसनी फैला दी है। अगर कोबरापोस्ट का दावा जांच में सहीं पाया जाता है तो इसे भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा वित्तीय घोटाला माना जा रहा है। कोबरापोस्ट के खुलासे में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (डीएचएफएल) के प्रमोटरों पर कथित तौर पर आम जनता के करोड़ों रुपये घपला करने का आरोप लगा है। बता दें कि बॉलीवुड के मेगास्टार शाहरुख खान इस समूह के ब्रांड एंबेसडर हैं।

कोबरापोस्ट के मुताबिक, सार्वजनिक धन की इतनी बड़ी हेराफेरी को डीएचएफ़एल ने बड़ी ही चालाकी से शैल कंपनियों के जरिए अंजाम दिया है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचना और सरकारी वेबसाइट से मिली जानकारी से इस घोटाले का खुलासा हुआ है। कोबरापोस्ट का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाले इस बड़े घोटाले की जांच बेहद जरूरी है ताकि इसमें लिप्त लोगो को सजा मिल सके और सार्वजनिक धन की उगाही उनसे की जा सके।

अपनी खोजी पड़ताल में कोबरापोस्ट को 31 हज़ार करोड़ रुपए से ज्यादा के कथित घोटाले का पता चला है जो संभवतः देश का सबसे बड़ा वित्तीय घोटाला है। आरोप है कि इस घोटाले की सूत्रधार निजी क्षेत्र की जानी मानी कंपनी डीएचएफ़एल है। इस कंपनी ने कथित तौर पर कई शैल कंपनीयों को करोडों रुपए का लोन दिया और फिर वही रुपया घूम फिर कर उन कंपनीयों के पास आ गया जिनके मालिक डीएचएफ़एल के प्रमोटर हैं। इस तरह 31 हज़ार करोड़ से ज्यादा की कथित हेराफेरी DHFL ने खुल्लम खुल्ला की है।

कोबरापोस्ट का आरोप है कि सबसे हैरानी की बात ये है कि इतने बड़े घोटाले पर भारतीय रिजर्व बैंक, सेबी सहित फाइनैन्स मिनिस्टरी की किसी भी इकाई की नज़र नहीं पड़ी है जिनका दायित्व ऐसी अनियमित्ता को रोकना है। इसके अलावा बैंक, auditing एजन्सि और इंकम टैक्स विभाग ने भी इस सिलसिले में अपने दायित्व का निर्वाह नहीं किया है। कोबरापोस्ट के खुलासे में दावा किया गया है कि इस घोटाले में भारतीय स्टेट बैंक यानी पीएनबी, एक्सिस बैंक और आईसीआईसीआई बैंक की बड़ी लापरवाही सामने आई है।

इन बैंकों सहित अन्य संस्थानों द्वारा इस छोटी सी कंपनी DHFL और उसके सहयोगी कंपनियों को बिना किसी जांच पड़ताल के कुल मिलाकर 96,880 करोड़ रुपये का कर्ज (नीचे दिए गए तालिका में दर्शाया गया है) दे दिया गया है। जिसमें देश के आम लोगों का पैसा है। डीएचएफ़एल की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने कुल मिलाकर 36 बैंको से उपरोक्त धनराशि कर्ज में जुटाई थी। इन बैंको में 32 सरकारी और निजी के अलावा 6 विदेशी बैंक शामिल है। यह कर्ज अलग-अलग तरीके से हासिल किया गया है। इस कर्ज की धनराशि से डीएचएफ़एल ने 84,982 करोड़ रुपए की धनराशि कर्ज के रूप में दे दी है।

कोबरापोस्ट के मुताबिक, इसके जरिए डीएचएफ़एल के मालिकों ने देश और विदेश में बड़ी-बड़ी कंपनियों के शेयर और assets खरीदी है। ये assets भारत के अलावा इंग्लैंड, दुबई, श्रीलंका और मॉरीशस में खरीदी गई है। डीएचएफ़एल के मामले में एक बात और खुल के सामने आ रही है कि इन संदिग्ध कंपनीयों को डीएचएफ़एल के मुख्य हिस्सेदारों ने अपनी खुद की प्रमोटर कंपनियों, उनकी सहयोगी कंपनियों और अन्य शैल कंपनियों के जरिए बनाया है। कपिल वाधवन, अरुणा वाधवन और धीरज वाधवन डीएचएफ़एल के मुख्य साझेदार है।

कोबरापोस्ट की इस तहकीकात के दौरान डीएचएफ़एल के इस बड़े घोटाले के सिलसिले में कोबरापोस्ट को निम्न जानकारीयां हाथ लगी है:

  • इस कथित घोटाले को अंजाम देने के लिए डीएचएफ़एल के मालिकों ने दर्जनों शैल कंपनियां बनाई। इन कंपनियों को समूहों में बांटा गया। इन कंपनियों में से कुछ तो एक ही पते से काम कर रही है और उन्हे चला भी निदेशकों का एक ही ग्रुप रहा है।
  • कथित घोटाले को छुपाने के लिए इन कंपनियों का ऑडिट ऑडिटरों के एक ही समूह से कराया गया। इन कंपनियों को बिना किसी सेक्युर्टी के हजारों करोड़ रुपए की धनराशि कर्ज में दी गई। इस धन के जरिए देश और विदेश में निजी संपत्ति अर्जित की गई।
  • कोबरापोस्ट के मुताबिक, स्लम डेव्लपमेंट के नाम पर इन शैल कंपनियों को हजारों करोड़ रुपए की राशि लोन के तौर पर दी गई। लेकिन उसके लिए जरूरी पड़ताल की प्रक्रिया की अनदेखी की गई। इसके अलावा बंधक या डैब्ट इक्विटि के प्रावधानों को भी दरकिनार कर दिया गया।
  • कोबरापोस्ट के मुताबिक, लोन की धनराशि एक मुश्त सौप दी गई जोकि स्थापित नियमों के विरुद्ध है। किसी भी प्रोजेक्ट के लिए लोन की धनराशि प्रोजेक्ट में हुए कार्य की प्रगति को देखते हुए दी जाती है। लेकिन यहां ऐसा देखने में नहीं आया है।
  • कोबरापोस्ट का कहना है कि अधिकांश शैल कंपनीयों ने अपने कर्जदाता डीएचएफ़एल का नाम और उससे मिले कर्ज की जानकारी को अपने वित्तीय ब्यौरा (financial statement) में नहीं दर्शाया जोकि सरासर कानून के विरुद्ध है।
  • कोबरापोस्ट का दावा है कि डीएचएफ़एल ने गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की कई कंपनियों को 1160 करोड़ रुपए का कर्ज बांटा था।
  • कपिल वाधवन और धीरज वाधवन डीएचएफ़एल की फ़ाइनेंस कमेटी के मेजोरिटी मेम्बर है। कोबरापोस्ट के मुताबिक यह कमेटी 200 करोड़ या इससे ऊपर का लोन किसी भी कंपनी को दे सकती है। अपनी शक्ति और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए दोनों ने उन शैल कंपनीयों को लोन दिए जिनसे इनके निजी हित जुड़े थे।
  • आरोप है कि कंपनी के मालिको ने insider ट्रेडिंग के जरिए करोडों रुपए की हेरा फेरी भी की है। कपिल वाधवन की इंग्लैंड की कंपनी ने Zopa ग्रुप में निवेश किया। इसी Zopa ग्रुप की subsidiary कंपनी ने इंग्लैंड में बैंकिंग license के लिए आवेदन किया हुआ है।
  • इस अवैध तरीके से कथित हड़पी धनराशि से कंपनी के मालिकों ने विदेश में बकायदा श्रीलंका प्रीमियर लीग की क्रिकेट टीम Wayamba भी खरीदी है।
  • आरोप है कि कंपनी के मालिकों ने गैर क़ानूनी तरीके से विदेशी कंपनीयों के अपने शेयर भी बेचे।
  • कोबरापोस्ट के इस तहकीकत में सैकड़ों करोड़ रुपए की टैक्स चोरी का भी खुलासा हुआ है।
  • कोबरापोस्ट का दावा है कि कंपनी के मालिकों ने अपनी सहायक और शैल कंपनियों के जरिए करोडों रुपए का चंदा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को दिया है।

कोबरापोस्ट के मुताबिक, इसके अलावा कंपनी ने खुद की ऋण नीति और कॉर्पोरेट गवर्नेंस पॉलिसी दोनों को ताक पर रखकर ये सारे काम किए है। जहां तक क़ानून की बात है ये सारी गड़बड़ियाँ सेबी के नियमों, नेशनल हाउसिंग बोर्ड के दिशा निर्देशों, कंपनी एक्ट की कई धाराओं, इंकम टैक्स की विभिन्न धाराओं, आईपीसी की धाराओं और काले धन के शोधन से संबन्धित पीएमएल एक्ट का खुला उल्लंघन है।

बीजेपी को करीब 20 करोड़ रुपये का दिया चंदा

कोबरापोस्ट को उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक, RKW Developers Private Limited, Skill Realtors Private Limited और Darshan Developers Private Limited ने वित्तीय वर्ष 2014-15 और 2016-17 के बीच सत्तारूढ़ बीजेपी को कुल जमा 19.5 करोड़ रुपए का चंदा दिया है। कोबरापोस्ट के मुताबिक, गौर करने वाली बात ये है कि इन तीनों कंपनियों के मालिक कपिल वाधवन और धीरज वाधवन है। एक और बात यहां गौर करने लायक ये है कि ये चंदे संबंधित क़ानून companies act 2013 की धारा 182 के प्रावधानों को ताक पर रखकर दिए गए है।

कोबरापोस्ट का कहना है कि क़ानून के अनुसार चंदा देने से पहले किसी भी कंपनी को लगातार तीन वित्तीय वर्ष में लाभ की स्थिति में होना जरूरी है। कोई भी कंपनी इन तीन वित्तीय वर्षो में अर्जित अपने कुल लाभ का 7.5 प्रतिशत तक की धनराशि ही चंदे में दे सकती है। इन प्रावधानों के उल्लंघन की स्थिति में आर्थिक दंड और छह महीने के कारावास की सजा निर्धारित है। कोबरापोस्ट की तहकीकत से यह स्पष्ट है कि इनमें से कोई भी कंपनी क़ानूनन चंदा देने की स्थिति में कतई नहीं थी।

कोबरापोस्ट को प्राप्त जानकारी के मुताबिक, RKW Developers ने वर्ष 2014-15 में बीजेपी को 10 करोड़ रुपए का चंदा दिया था जबकि 2012-13 में कंपनी को 24,77,828 रुपए का घाटा हुआ था। लेकिन मुंबई स्थित इस रियल इस्टेट कंपनी ने अपनी बैलेन्स शीट में इस चंदे को दिखाने की जरूरत नहीं समझी। इसी तरह Skill Realtors कंपनी ने बीजेपी को साल 2014-15 में 2 करोड़ का चंदा दिया था।

कोबरापोस्ट का आऱोप है कि मगर कंपनी ने अपनी बैलेन्स शीट में इस धनराशि को नहीं दिखाया। वही बीजेपी ने भी इलैक्शन कमिशन में इन दोनों कंपनीयो के PAN का विवरण नहीं दिया है। इसके अलावा बीजेपी को साल 2016-17 में 7.5 करोड़ रुपए का चंदा देने वाली Darshan Developers 2016-17 में 7,69,68,968 रुपए के घाटे में थी।

98,718 करोड़ रुपए का हासिल कर लिया कर्ज

कोबरापोस्ट के मुताबिक, डीएचएफ़एल एक गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी है जिसकी कुल जमा पूंजी या माली हैसियत साल 2017-18 के वित्तीय ब्योरे के मुताबिक कुल 8,795 करोड़ रुपया है। ये बात अपने आप में हैरान करने वाली है कि इतनी छोटी जमा पूंजी वाली कंपनी ने अलग-अलग बैंको और वित्तीय संस्थानो से 98,718 करोड़ रुपए का कर्ज हासिल कर लिया। यह कर्ज अलग-अलग तरीके से हासिल किया गया है। इस कर्ज की धनराशि से डीएचएफ़एल ने 84,982 करोड़ रुपए की धनराशि कर्ज के रूप में दे दी है। डीएचएफ़एल की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने कुल मिलाकर 36 बैंको से उपरोक्त धनराशि कर्ज में जुटाई थी। इन बैंको में 32 सरकारी और निजी के अलावा 6 विदेशी बैंक शामिल है।

एक और बात कोबरापोस्ट की तहकीकत में सामने आई है कि जिन शैल कंपनियो को महाराष्ट्र में स्लम पुनर्वास के नाम पर कर्ज दिया गया था उनका नाम वहां की स्लम पुनर्वास प्राधिकरण की वेबसाइट में कही नज़र नहीं आता है। 45 कंपनियो को डीएचएफ़एल ने 14,282 करोड़ रुपए लोन के तौर पर दिए है। कोबरापोस्ट ने दावा किया है कि इन सभी कंपनियो के तार वाधवन ग्रुप और Sahana ग्रुप से जुड़े हुए है। Sahana ग्रुप के निदेशक जितेंद्र जैन की वित्त मंत्रालय की आर्थिक अपराध शाखा कुछ आपराधिक मामलों में जांच कर रही है। जैन अभी न्यायिक हिरासत में है। Sahana ग्रुप के एक और नामी गिरामी शेयर धारक Dalvi Shivram Gopal है।

इस खोजी वेबसाइट के मुताबिक, गोपाल शिव सेना के पूर्व विधायक है। इसके अलावा insider ट्रेडिंग के जरिए डीएचएफ़एल कंपनी के मालिकों ने अपने लिए करीब 1 हज़ार करोड़ रुपए जुटा लिए। शैल कंपनीयो को दिये गए ऋण के पैसे से डीएचएफ़एल के मालिकान ने काफी assets विदेशों में अपने लिए जोड़ लिए है। इसके अलावा कोबरापोस्ट को इस घोटाले में वाधवन परिवार के सूत्र कई देशों से जुड़ते दिखाई दिए है।

ये देश है: कोबरापोस्ट के मुताबिक इंग्लैंड, दुबई, मॉरीशस और श्रीलंका। कोबरापोस्ट की तहकीकत से जो जानकारी सामने आई है वो इस घोटाले का एक हिस्सा भर है। अगर इस घोटाले की सही ढंग से जांच की जाए तो नीरव मोदी और शारदा जैसे घोटाले इसके सामने बोने साबित हो सकते है। देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाले इस बड़े घोटाले की जांच बेहद जरूरी है ताकि इसमें लिप्त लोगो को सजा मिल सके और सार्वजनिक धन की उगाही उनसे की जा सके।

LIVE: Cobrapost exposes India’s largest financial scam, Rs 1 lakh crore of public money lent to #DHFL with no chance of recovery, Rs 20 crore donated to BJP

Posted by Janta Ka Reporter on Tuesday, January 29, 2019

कोबरापोस्ट ने जारी किया डिस्क्लेमर

कोबरापोस्ट द्वारा एक डिस्क्लेमर जारी किया गया है। जिसमें लिखा है:- पाठकों को सलाह दी जाती है कि बेहतर समझ और सरलता के लिए कई आंकड़े को निकटतम संख्या तक round off किया गया हैं। स्टोरी विभिन्न नियामकों के साथ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों पर आधारित है। हम उम्मीद करते हैं कि स्वतंत्र जांच एजेंसी द्वारा गहन जाँच करने पर सही हद तक धोखाधड़ी स्पष्ट हो जाएगी। सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध दस्तावेजों की प्रचुर मात्रा को देखते हुए उचित परिश्रम कर जाँचने की कोशिश की है। हम पाठकों को सलाह देते हैं कि संदेह होने पर जो सामग्री दी गई है उसका संदर्भ देखे। कहानी के लिए एक्सेस किए दस्तावेज़ हमने स्कैन कर पाठकों के लिए हमारी वेबसाइट पर अपलोड किए है ताकि वे प्राथमिक सबूतों को आसानी से हासिल कर सकें।

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