खतरनाक ‘फेक न्यूज’ के साथ अर्नब गोस्वामी ने की ‘रिपब्लिक भारत’ की शुरूआत, क्या फर्जी खबर परोसने के लिए चैनल पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?

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अर्नब गोस्वामी ने हाल ही में अयोध्या विवाद पर ‘सुपर एक्सक्लूसिव’ रिपोर्ट के साथ अपना नया हिंदी चैनल ‘रिपब्लिक भारत’ लॉन्च किया। अपने तथाकथित ‘सुपर एक्सक्लूसिव’ स्टिंग ऑपरेशन में चैनल ने एक वीर बहादुर सिंह (वीबी सिंह) नाम के शख्स से बात करने का दावा किया। चैनल ने दावा किया कि अक्टूबर 1990 में अयोध्या के एक पुलिस स्टेशन में वह SHO थे, जब उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार ने पुलिस को कारसेवकों पर गोलीबारी का आदेश दिया था। बता दें कि सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस की इस गोलीबारी में 15 लोग मारे गए थे।

शनिवार को ‘रिपब्लिक भारत’ ने अपने कथित स्टिंग में एक तत्कालीन अधिकारी से बात की। चैनल ने दावा किया कि रामजन्मभूमि थाने के तत्कालीन एसएचओ वीर बहादुर सिंह ने सनसनीखेज दावा किया है कि कारसेवकों की मौत का जो आंकड़ा बताया गया था, उससे कहीं ज्यादा कारसेवकों की मौत हुई थी। चैनल ने एसएचओ वीबी सिंह के हवाले से अपनी रिपोर्ट में बार-बार ‘नरसंहार’ शब्द का इस्तेमाल किया। चैनल अपने स्टिंग को अगले दिन अपने अंग्रेजी चैनल ‘रिपब्लिक टीवी’ पर भी चलाया।

लेकिन गोस्वामी का चैनल रिपब्लिक भारत ने 1990 में अयोध्या में हुए इस गोलीकांड पर तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन कर लोकसभा चुनाव से पहले हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए एक बिल्कुल झूठी न्यूज से सिर्फ और सिर्फ सनसनी फैलाने की कोशिश है। चैनल की एंकर शिवानी गुप्ता ने दावा किया कि पुलिस की गोलीबारी में मारे जाने वाले कारसेवकों की संख्या करीब 1,000 से अधिक हो सकती है।

एंकर ने कहा कि आधिकारिक तौर पर अधिकारी ने बताया कि 16-18 कारसेवकों की मृत्यु हुई थी, लेकिन हमारे स्टिंग ऑपरेशन में यह खुलासा हुआ है कि कारसेवकों की यह संख्या सैकड़ों में था। वास्तव में, चश्मदीद गवाहों सहित कई अन्य का दावा है कि यह संख्या एक हजार में भी हो सकती है। रिपब्लिक टीवी के एक अन्य रिपोर्टर ने तथाकथित खुलासे की मूल रिपोर्ट पढ़ते हुए मुलायम सिंह यादव पर ‘गंदी झूठ’ में लिप्त होने और ‘इस क्रूर नरसंहार’ के लिए दोषी ठहराया।

‘रिपब्लिक भारत’ के झूठ का पर्दाफाश

रिपब्लिक भारत चैनल ने अपने वीडियो में दावा किया है कि उस वक्त के (अक्टूबर-नवंबर 1990) अयोध्या में रामजन्म भूमि थाने के इंचार्ज वीबी सिंह का उन्होंने स्टिंग ऑपरेशन किया है। स्टिंग में रिपोर्टर ने ऐसा जताया है कि मानो वह पूरे घटनाक्रम के प्रत्यक्ष गवाह हों। जबकि हकीकत यह है कि खुद वीबी सिंह इसी स्टिंग में यह स्पष्ट करते हुए दिखाई दे रहे हैं कि वह उस वक्त राम जन्मभूमि थाने का इंचार्ज नहीं थे, जब गोलीबारी की घटना हुई थी। चैनल के स्टिंग में खुद वीबी सिंह ने बताया कि जब गोलीबारी की घटना हुई थी, उस वक्त वह एसएसपी कार्यालय में रीडर थे, ना की थाना इंचार्ज।

लेकिन रिपब्लिक भारत का रिपोर्टर बार-बार उसे थाना इंचार्ज (एसएचओ) बताने पर तुला रहा। नीचे वीडियो में देखिए, वह खुद कह रहा है कि मैं एसएसपी के दफ्तर में रीडर था। सिंह ने कहा, (नीचे देखें), “जब गोलीबारी हुई, तो कोतवाल (पुलिस अधिकारी) भाग गए, थाना प्रभारी (एसएचओ) भी चले गए, वहां रिपोर्ट दर्ज करने वाला कोई नहीं था। उस समय, मैं READER, SSP था। तब डीएम और एसएसपी ने मुझे बुलाया।”

चैनल के स्टिंग में वीबी सिंह ने खुद यह साफ कर दिया कि 1990 में गोलीकांड के दौरान वह एसएसपी कार्यालय में रीडर था। सवाल यह नहीं है कि इस झूठ के जरिए रिपब्लिक ने लोकसभा चुनाव से पहले सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश की। चैनल का रिपोर्टर स्टिंग में (नीचे देखें) में, अपने अतिथि से यह कहते हुए सुना जा सकता है कि 1990 में मारे गए कारसेवकों की संख्या काफी अधिक थी। वह कहता हैं, “जब सरकारी तंत्र आपके खिलाफ था, तब केवल 16 लोग कैसे मारे गए। कुछ तो था। कुछ तो रहा होगा।”

वीबी सिंह के उपनाम को लेकर ही चैनल ने झूठ नहीं बोला। बल्कि कारसेवकों की मौत को भी लेकर चैनल ने अपनी तरफ से फेक दावे किए। पूरे स्टिंग ऑपरेशन में वीबी सिंह कहीं भी मरने वालों की संख्या सैकड़ों या हजारों में होने का दावा नहीं किया है। हालांकि, सिंह ने यह यह जरूर दावा किया है कि उस गोलीकांड में काफी लोग मारे गए थे। लेकिन चैनल का रिपोर्टर बार-बार सिंह के हवाले से कारसेवकों की मौत की संख्या सैकड़ों-हजारों में बता रहा था। इतना ही नहीं रिपब्लिक 1990 की गोलीकांड की तुलना ‘जलियावाला बाग’ में हुए नरसंहार से तक कर दिया। चैनल यह साबित करने की कोशिश करता है कि मुलायम सिंह यादव ने जानबूझकर ‘हिंदुओं का नरसंहार’ करवाया।

क्या है सच्चाई?

विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने 1990 में अयोध्या में हुए गोलीकांड में मारे गए लोगों की एक सूची जारी की थी। जिसमें वीएचपी ने दावा किया था कि कुल 59 लोगों की पुलिस गोलीबारी में मौत हुई थी। वीएचपी द्वारा जारी सूची में कहा गया था कि 30 अक्टूबर, 1990 और 2 नवंबर, 1990 को हुई पुलिस फायरिंग के दौरान अयोध्या में 36 कारसेवकों की मौत हुई थी। जबकि 23 अन्य कारसेवक आंदोलन के दौरान अयोध्या के अलावा अन्य जगहों पर मारे गए। हालांकि, 2010 में अंग्रेजी की प्रतिष्ठित पत्रिका फ्रंटलाइन में खबर प्रकाशित होने के बाद पूरे देश में उस वक्त हंगामा मच गया और वीएचपी का दावा झूठा साबित हो गया। पत्रिका की एक रिपोर्ट में वीएचपी की सूची में शामिल कई व्यक्ति जीवित पाए गए थे।

Source: The Frontline

पत्रिका फ्रंटलाइन के इस रिपोर्ट का शीर्षक था – ‘When the ‘dead’ came back, जब मुर्दे वापस लौटे’। फरवरी, 1991 में अयोध्या गोलीकांड के मृतकों की जो सूची वीएचपी ने जारी की थी उसमें 11 नाम वही थे जो सरकारी सूची में भी थे। लेकिन वीएचपी की सूची में 23 लोगों को उत्तर प्रदेश के विभिन्न पतों का निवासी दिखाया गया था और 12 अन्य राज्यों से बताए गए थे, जिन्हें वीएचपी ने ‘शहीद’ होने का दावा किया था। सूची जारी होने के बाद, अन्य राज्यों से बताए गए 12 लोगों में से चार लोग विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में जीवित पाए गए थे। जबकि पांच अन्य ऐसे लोग थे, जिनका कारसेवा से कोई सीधा संबंध ही नहीं था और उनकी मौत गोली लगने से नहीं हुई थी। एक का नाम, पता तलाश करने पर मिला ही नहीं।

इनमें से 2 लोग जरूर ऐसे थे जो कारसेवा के दौरान घायल तो हुए थे, लेकिन घर लौट गए थे और कई सप्ताह बात उनकी मौत हो गई। फ्रंटलाइन के वरिष्ठ संवाददाता एसपी सिंह और वेंकिटेश रामाकृष्णन ने उत्तर प्रदेश में जाकर (जहां से 23 लोगों के ‘शहीद’ होने का जिक्र था और नाम-पते दिए गए थे) उनकी पड़ताल की। उत्तर प्रदेश में सूची के पहले तीन नाम मथुरा से थे। इसमें पहले मृतक के तौर पर दर्ज थे मथुरा के ‘राल’ नामक गांव के 64 वर्षीय ठाकुर लाल सिंह। दूसरे थे वृंदावन के साधु आशुतोष दास और तीसरे थे गड़ाया गांव के बाबा राघव दास। इन तीनों से पत्रिका के रिपोर्टरों ने लाइव बात की थी, जिन्हें वीएचपी की सूची में मृत घोषित कर दिया गया था।

रिपब्लिक टीवी के फेक एक्सपोज के पीछे का क्या है मकसद?

दरअसल, राम मंदिर का मुद्दा एक बार फिर इस साल के लोकसभा चुनावों से पहले गति पकड़ ली है। विकास के मोर्चों पर केंद्र सरकार की विफलता से लोगों का ध्यान हटाने के लिए केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ बीजेपी इस मुद्दे को हवा देने की पूरी कोशिश कर रही है। जिस जल्दबाजी के साथ, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद, बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा, आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे लोगों ने अर्नब गोस्वामी को बधाई दी है और इस फर्जी स्टिंग के लिए चैनल की टीम को दिल खोलकर सराहना की… इससे पता चलता है कि इनकी एक पूरी टीम है।

बता दें कि रिपब्लिक टीवी की सह-संस्थापक बीजेपी के राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर थे। अर्नब गोस्वामी का बीजेपी के लिए प्यार कोई नई बात नहीं है। हाल ही में, यह विवादास्पद एंकर बीजेपी प्रवक्ता की तुलना में अधिक एनिमेटेड दिखे थे जब उन्होंने अपने स्टूडियो में मंदिर मामलो को जोर-शोर से उठाया था। उन्होंने अयोध्या मुद्दे पर धीमी सुनवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट को भी फटकार लगाई थी।

यह पर्दाफाश वास्तव में बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है, लेकिन क्या किसी समाचार चैनल को फर्जी स्टिंग का उपयोग कर हिंसा भड़काने की अनुमति दी जा सकती है? अर्नब गोस्वामी के रिपब्लिक भारत द्वारा इस महत्वपूर्ण समय पर हिंदू आबादी को भड़काने वाली रिपोर्ट की वजह से उत्तर प्रदेश और उसके बाहर बड़े पैमाने पर हिंसा होने की संभावना थी।

अभी हाल ही में संतों ने कहा था कि 21 फरवरी को अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की आधारशिला रखी जाएगी। इस गंभीर स्थिति में क्या अर्नब के चैनल को इस गैर-जिम्मेदार और खतरनाक प्रसारण के लिए प्रतिबंध का सामना नहीं करना चाहिए? क्या किसी भी चैनल को मात्र टीआरपी के लिए फर्जी खबर परोसने का अधिकार होना चाहिए? खासतौर पर वह खबर जिससे समाज में तनाव फैले और दो समुदायों के बीच सांप्रदायिक हिंसा की नौबत आ जाए? बता दें कि यह पहला मौका नहीं है, जब अर्नब गोस्वामी को फर्जी खबरों के लिए दोषी पाए गए हों, इससे पहले भी फेक न्यूज को लेकर उन्हें शर्मसार होना पड़ा है।

 

 

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