गुजरात के नये विधायक जिग्नेश मेवानी को लेकर आजकल कई दिग्गजों के पेट मे भय के चलते गड्डा पड़ गया है। मेवानी नामक यह चक्रवात कहां-कहां जाएगा और टकराएगा इसका अंदेशा बांधने मे राजकीय नेता मश्गूल हो गए हैं। जाहिर सी बात है की, इस होड़ मे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सबसे आगे है। मेवानी को नेस्तनाबूद करने की इस पार्टी को कितनी जल्दी है, इस बात का मैंने मुंबई में प्रत्यक्ष अनुभव किया है।
मेवानी की पिछले सप्ताह मे मुंबई मे होने वाली सभा न हो इसलिए देवेंद्र फडणवीस की सरकार ने बीड़ा उठाया था। मेवानी विद्यार्थियों को संबोधित करने वाला था। लेकिन वो शिवाजी पार्क मे जाहीर सभा लेने वाला है, इस आवेश मे पुलिस का बंदोबस्त तैनात किया गया था। उसके खिलाफ वारंट तक जारी किया गया।
इस बारे मे मुख्यमंत्री कार्यालय से आदेश जारी होने की बात पुलिस अधिकारियों ने मानी थी। लेकिन यही अधिकारी मेवानी को गिरफ्तार करने की नौबत अपने पर ना आए ऐसी प्रार्थना मन ही मन कर रहे थे। अगर मेवानी जैसे युवा नेता को गिरफ्तार किया, तो समुचे देश मे सरकार के खिलाफ गजहब हो जाएगा यह डर उनके मन मे था। आखिर मेवानी जब मुंबई से गुजरात चला गया तब जाकर पुलिस ने राहत की सांस ली।
पुना मे भी कुछ ऐसे ही हुआ। मेवानी को सुनने के लिये शनिवार को वाडा मे काफी तादाद मे भीड़ इकठ्ठी हुई थी। मेवानी ने आक्रमक शैली मे भाषण किया पर उसमे कुछ भी प्रक्षोभक नही था। अपने सवालों के जबाब ढुंढने के लिए रास्ते पर उतरना होगा, यह बात कहने वाला मेवानी कोई पहला नेता नही है। पर उस के इस वाक्य पर आक्षेप लेकर उसके खिलाफ गुनाह दर्ज किया गया। मेवानी के दिल्ली मे होने वाली हुंकार रैली पर भी पाबंदी लगाई गयी। इसके बावजूद जब सभा हुई तो वह किस कदर फ्लाप हुई यह बताने वाली खबरें फैलाई गयी।
इस तरह जिग्नेश ने मोदी सरकार और भाजपा को चारो खाने चीत किया है। भाजपा को मेवानी का इतना भय क्यूं लग रहा है यह जानने के लिए गुजरात मे जाना जरूरी है। दो साल पहले उना मे दलितों पर हुए अत्याचार के बाद जिग्नेश पहली बार उभरकर सामने आया। ऐसे ही अत्याचार गोरक्षकों ने मुसलमानों पर किये थे। पर पहले से ही दबाव मे जी रहे मुस्लिम समाज से कोई बडी प्रतिक्रीया नही आयी। लेकिन मेवानी ने उना मे हुए अत्याचार के खिलाफ पुरे गुजरात मे एक आंदोलन खड़ा किया।
अगर भाजपा और मोदी को परास्त करना हो तो राजकीय विकल्प जरूरी है, यह जानकर मेवानी ने आम आदमी पार्टी मे शामिल होने का निर्णय लिया था। लेकिन गुजरात की लड़ाई के लिये यह संघटन सशक्त विकल्प नही हो सकता, ये जानकर उसने खुद का संघटन खड़ा किया और पुरे देश का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया। जिग्नेश ने एक वकील होने के साथ-साथ कुछ समय के लिये पत्रकारिता भी की है।
गुजरात मे मानवी अधिकारों के लेकर लड़ाई लड़ने वाले दिवंगत वकील मुकुल सिन्हा के साथ भी उसने काम किया है। लिहाजा उसमे राजनीति की समझदारी पहले से ही है। गुजरात मे सन 2002 के दंगों से लेकर अबतक की सभी घटनाएं उसने नजदीकी से देखी है। इसलिए मोदी को परास्त करना हो तो कितनी तैय्यारी करनी पड़ेगी, इसका अंदेशा भी उसे है। इसीलिए जब उसने वडगाम से चुनाव लड़ने का फैसला किया तब कांग्रेस का समर्थन तो लिया लेकिन अपक्ष रहना ही पसंद किया। इससे उसकी आगे की रणनीति का अंदाजा आता है।
वडगाम का चुनाव जिग्नेश के लिए कोई अग्निपरीक्षा से कम नही था। उसने जिस उना गांव से आंदोलन छेड़ा था वह वडगाम से लगभग 300 किमी की दूरी पर है। इसे देखते चुनाव मे अपने आंदोलन का कोई प्रभाव नहीं होगा यह जानकर उसने अपने एक मित्र के माध्यम से राहुल गांधी से संपर्क किया। राहुल ने भी राजकीय माहौल को ध्यान मे रखते हुए वडगाम की सीट, जो कांग्रेस का सोलोंसे गढ माना जाता है, जिग्नेश के लिए छोड़ दी।
मोदी के दौर मे भी इस सीट से कांग्रेस का ही उम्मीदवार जिता था। शायद इसलिए कांग्रेस के स्थानीय नेता गण इस निर्णय से नाराज थे। लेकिन राहुल गांधी और अशोक गहलोत ने स्थानीय नेताओं को समझाया। वहां के विधायक को दूसरी सीट दी और सभी कार्यकर्ताओं को काम मे जूटाया। एक भूतपूर्व कांग्रेस विधायक ने बगावत की और भाजपा ने उसे मदद भी की, लेकिन उसका कोई असर नहीं पड़ा।
किसी भी हालत मे जिग्नेश की हार होनी चाहिए, ऐसे आदेश नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने दिये थे। भाजपा के सभी नेता, पूरी यंत्रणा और धनसत्ता जिग्नेश के खिलाफ काम कर रही थी। खुद मोदी, अमित शाह, मुख्यमंत्री विजय रूपानी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस विधानसभा क्षेत्र मे सभाएं की। जिग्नेश के खिलाफ जहरीला प्रचार किया गया।
जिग्नेश ने एक मुस्लिम युवती को फंसाया है, उसके आतंकवादियों से गहरे संबंध है, अगर वो चुनाव जीता तो सवर्णों के खिलाफ अॅट्रॉसिटी का दुरूपयोग कर सकता है, साथ ही वो लाल सलाम कहता है इसका मतलब वह आंबेडकर का सच्चा अनुयायी नहीं है, इस प्रकार की बाते समाज में फैलाकर संघ परिवार के कार्यकर्ताओं ने जिग्नेश के खिलाफ अप्रत्यक्ष मुहिम चलाई।
जिग्नेश के पास खुद की कोई यंत्रणा न होने के कारण कांग्रेस और पुरे देश से वामपंथी कार्यकर्ता उसके प्रचार मे जूड़ गये थे। उनके कहने के मुताबिक यह चुनाव एक प्रकार से ऐतिहासिक था। एक तरफ सर्वशक्तिमान सत्ताधारी और दूसरी तरफ जनता की ताकत थी। हाल के भ्रष्ट राजनीति के दौर मे जनता की ताकत का विजय होने की संभावना काफी कम है। लेकिन वडगाम के मतदाताओं ने जिग्नेश जैसे दलित उम्मीदवार को चुनकर सभी को अचंभे में डाल दिया। इस विजय की अपेक्षा खुद जिग्नेश को भी शायद नहीं थी।
वडगाम विधानसभा क्षेत्र की रचना भी काफी अहम है। कुल 2.6 लाख मतदाताओं में से मुस्लिम मतदाता की संख्या लगभग 25%, दलित 16% और ठाकुर, पटेल, चौधरी तथा अन्य समुदाय के लोग हैं। यहां के मुसलमान वेपारी होने के कारण सधन है। इनमे से कईयों के रिश्तेदार जिग्नेश के प्रचार के लिए मुंबई से वडगाम आये थे। अल्पेश ठाकुर और हार्दिक पटेल ने भी जिग्नेश की पूरी मदद की। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी जी जान लगाकर काम किया और मोदी-शाह को करारा झटका दिया। यह केवल स्थानीय नहीं बल्कि देश के लिए एक अहम चुनाव था।
अगर दिल से ठान ले तो मोदी-शाह तथा भाजपा को परास्त कर सकते हैं, यह बात मेवानी तथा राहुल ने साबित कर दिखाया है। शायद इसी वजह से भाजपा परेशान है। अगर यही पैटर्न देश मे चला तो अपना बेड़ा गर्क हो सकता है इस प्रकार का डर भाजपा को सता रहा है। शायद इसी वजह से जिग्नेश और अन्य युवा नेताओं पर पाबंदिया लायी जा रही है। मोदी सरकार ने कन्हैया कुमार को भी इसी प्रकार त्रस्त किया था। पर वह अग्निपरीक्षा से पास हुआ।
कन्हैया की तुलना मे जिग्नेश की जीत का महत्व इसलिये ज्यादा है क्योंकि उसने चुनावी राजनीति मे मोदी को परास्त किया है। एक विधायक के तौर पर वह कैसा काम करेगा इस पर सभी कि निगाहें टिकी है। पिछले पंद्रह सालों से भाजपा ने गुजरात मे विपक्ष को अपने जेब मे रखा है। जिग्नेश विधानसभा मे सता सकता है इसका भय भाजपा को है। भाजपा की तरह कई दलित नेताओं को भी जिग्नेश के प्रति जलन की भावना है। जिग्नेश की बढती लोकप्रियता को देख इन कद्दावर दलित नेताओं के होश उड़ गये हैं।
कोरेगांव-भीमा की घटना के बाद निषेध करने के लिए रास्ते पर उतरे युवाओं का असली हीरो जिग्नेश ही था। प्रकाश आंबेडकर सही समय पर सहीं जगह पर थे। अन्यथा यह आंदोलन अचानक हुआ था। वहां कोई नेता ना होता, तो भी वही होता जो हुआ। सरकार मे मंत्री बने रामदास आठवले के कार्यकर्ता भी इस आंदोलन मे शामिल हुए इसी वजह से उन्हें जिग्नेश का पक्ष लेना पड़ा। राम विलास पासवान और उदीत राज का भी यही हाल था। इन कद्दावर दलित नेताओं को पहले कांग्रेस और अब भाजपा ने अपनी गोदी मे बिठाया है।
बाबासाहेब आंबेडकर के पश्चात दलित नेताओं को खरीदने की प्रथा लगातार चल रही है। शायद इसी वजह से युवाओं ने पहले दलित पंथर (1970 के दशक में) और अब जिग्नेश का साथ निभाने का फैसला किया है। जिग्नेश को भी खरीदने का प्रयास हो सकता है। वह उसे किस प्रकार जबाब देगा, यह देखना होगा। कुछ वरिष्ठ पत्रकार जिग्नेश की तुलना कांशीराम से कर रहे है। लेकिन यह जल्दबाजी होगी।
कांशीराम जी ने राजनीति मे आने से पहले बामसेफ संघटन मजबूत किया था। जिग्नेश के पास फिलहाल ऐसा राष्ट्रीय स्तर का संघटन नही है। अगर उसे राष्ट्रव्यापी नेतृत्व करना है, तो उसे पहले संघटन बनाना पड़ेगा या किसी बडी पार्टी का आधार लेना होगा। वरना यह चक्रवात आया और गया, या फिर वह गुजरात तक ही सिमित था ऐसा कहना पड़ेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और महानगर व IBN लोकमत के पूर्व संपादक है, इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)


















