शामली और कैराना पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जो रिर्पोट दी है उसकी राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कड़ी आलोचना की है। शामली और कैराना से हिन्दु परिवारो के पलायन के पीछे कारोबारी कारण था। किसी खास समुदाय के डर के कारण ये पलायन नहीं किया गया है, जबकि मानवाधिकार आयोग की जांच टीम पाती है कि बढ़ते अपराध और और बिगड़ती कानून व्यवस्था के कारण हिन्दु परिवारों का पलायन हुआ है।
जनसत्ता की खबर के अनुसार, मानवाधिकार आयोग की जांच टीम का कहना था कि ‘‘बढ़ते अपराध’’ और ‘बिगड़ती’ कानून एवं व्यवस्था के चलते कैराना से कई परिवारों ने पलायन किया। आयोग ने दावा किया है मुस्लिम युवकों ने कैराना में हिंदू लड़कियों को छेड़ा, जिससे वे घर के बाहर निकलने में भी डरने लगे। दंगों से प्रभावित करीब 29,300 लोग मुजफ्फरनगर और शामली में फैली 65 ‘कालाेनियों’ में रह रहे हैं। इनमें से 90 फीसदी नजदीकी कस्बे से 15-20 किलोमीटर दूर बसे हैं, जहां एनएचआरसी रिपोर्ट कहती है कि हिंदू लड़कियों को छेड़ा गया था।
खबर के अनुसार तथ्यों की पड़ताल के लिए द इंडियन एक्सप्रेस ने कैराना के ऐसे करीब 20 कैंपों का दौरा किया, जहां उन्होंने पाया कि जो कहा गया है हालात उससे बिल्कुल अलग हैं। वहां के मुस्लिम परिवार घर-बार छोड़कर किसी तरह बसर कर रहे हैं। जिनमें से अधिकांशत की हालात दयनीय है।
राहत कैंप में रह रहे 60 साल के सुलेमान राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट पर हैरानी जताते हैं, वह कहते हैं कि वे बहुत कम ही कैराना कस्बे में जाते हैं। उन्होंने कहा, ”मेरे तीन बच्चे दिनभर पत्थर तोड़ते हैं, तब कहीं जाकर हमें एक वक्त की रोटी नसीब होती है। कैंप में कोई परिवार इस ईद पर कुर्बानी नहीं दे सका, न ही हमारे पास सेवइयों के लिए पैसा है। हम अपनी समस्या में इतने परेशान हैं, लड़कियां क्या छेडेंगे, वो भी 20 किलोमीटर जाकर कैराना में? जितना पैसा वहां जाने में खर्च होगा, उतने में हम 10 रोटी बना सकते हैं।”
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग पलायन की चाहे जो वजह बताए लेकिन सच्चाई वहां जाने पर पता लगती है कि जिन परिवारों को खाने के लिए दो वक्त की रोटी नहीं मिल पा रही है वो कैसे किसी दूसरी सम्प्रदाय के लोगों को जाकर छेड़ने का अपराध करेेंगे।