22 अक्टूबर को शहीद अशफ़ाकुल्लाह की याद में हुए दिल्ली के जामिया नगर में कुल हिंद मुशायरें का आयोजन किया गया। इस मुशायरे में दिल्ली सरकार के मंत्री सहित तमाम शायर मौजूद रहे।
Support honest journalist and advertise with usअपने व्यंग और क्रांतिकारी शायरी से मशहूर प्रतापगढ़ के इमरान प्रतापगढ़ी ने अपनी नज़्मों से समाज, मोदी सरकार और राजनीतिज्ञों, पत्रकारों को आईना दिखाने की कोशिश की।
इमरान ने लापता नजीब के लिए न्यूज चैनलों, पत्रकारों को भी आड़े हाथों लिया जो छात्र के लापता होने पर गूंगे हो गए हैं।
शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने जेएनयू के लापता छात्र नजीब की मां के आंसुओं का दर्द अपनी नज़्म से दर्द बयां किया नज़्म पढ़ते-पढ़ते खुद भी रोने लगे और महफिल को भी रोने पर मजबूर कर दिया।
शायर इमरान प्रतापगढ़ी की जेएनयू के लापता छात्र नजीब की मां के लिए नज़्म-
कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा.
सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली,
समंदर सी ख़ामोश गहरी है दिल्ली
मगर एक मॉं की सदा सुन ना पाये,
तो लगता है गूँगी है बहरी है दिल्ली
वो ऑंखों में अश्कों का दरिया समेटे,
वो उम्मीद का इक नज़रिया समेटे
यहॉं कह रही है वहॉं कह रही है,
तडप करके ये एक मॉं कह रही है
कोई पूँछता ही नहीं हाल मेरा…..!
कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा
उसे ले के वापस चली जाऊँगी मैं,
पलट कर कभी फिर नहीं आऊँगी मैं
बुढापे का मेरे सहारा वही है,
वो बिछडा तो ज़िन्दा ही मर जाऊँगी मैं
वो छ: दिन से है लापता ले के आये,
कोई जा के उसका पता ले के आये
वही है मेरी ज़िन्दगी का कमाई,
वही तो है सदियों का आमाल मेरा
कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा!
ये चैनल के एंकर कहॉं मर गये हैं,
ये गॉंधी के बंदर कहॉं मर गये हैं
मेरी चीख़ और मेरी फ़रियाद कहना,
ये मोदी से इक मॉं की रूदाद कहना
कहीं झूठ की शख़्सियत बह ना जाये,
ये नफ़रत की दीवार छत बह ना जाये
है इक मॉं के अश्कों का सैलाब साहब,
कहीं आपकी सल्तनत बह ना जाये
उजड सा गया है गुलिस्तॉं वतन का
नहीं तो था भारत से ख़ुशहाल मेरा
कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा।