अब सोशल मीडिया की निगरानी नहीं करेगी मोदी सरकार, सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद केंद्र ने पीछे खींचे कदम

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सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अब सोशल मीडिया की निगरानी की योजना को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है। जी हां, सोशल मीडिया पर निगरानी के लिए ‘सोशल मीडिया हब’ बनाने के फैसले से सरकार पीछे हट गई है। केंद्र सरकार ने शुक्रवार (3 अगस्त) को सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह सोशल मीडिया हब बनाने वाली प्रस्तावित अधिसूचना वापस ले रहा है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि केंद्र सरकार सोशल मीडिया की निगरानी नहीं करेगी और सरकार पूरे प्रोग्राम पर पुनर्विचार कर रही है।

दरअसल रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार सोशल मीडिया कंटेट की निगरानी के लिए एक व्यापक सोशल मीडिया हब बनाने की तैयारी कर रही थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने कहा था कि क्या आप लोगों के व्हाट्सअप मैसेज टैप करना चाहते हैं। बता दें कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सोशल मीडिया हब बनाने का निर्णय लिया था।

पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह ‘निगरानी राज’ बनाने जैसा होगा। शीर्ष अदालत ने कहा था कि सरकार नागरिकों के वॉट्सऐप संदेशों को टैप करना चाहती है। इसके बाद केंद्र सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। शुक्रवार को एक सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार सोशल मीडिया हब नीति की समीक्षा करेगी।

बता दें कि तृणमूल कांग्रेस की विधायक महुआ मोइत्रा का कहना था कि सोशल मीडिया की निगरानी के लिए केंद्र यह कार्यवाही कर रहा है। इसके बाद ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम व ईमेल में मौजूद हर डेटा तक केंद्र की पहुंच हो जाएगी। उन्होंने कहा था कि निजता के अधिकार का यह सरासर उल्लंघन है। इससे हर व्यक्ति की निजी जानकारी को भी सरकार खंगाल सकेगी। इसमें जिला स्तर तक सरकार डेटा को खंगाल सकेगी।

दरअसल हाल ही में केंद्रीय मंत्रालय के तहत काम करने वाले पीएसयू ब्रॉडकास्ट कंसल्टेंट इंडिया लि. (बीईसीआइएल) ने एक टेंडर जारी किया है। BECIL ने टेंडर जारी कर निजी कंपनियों से एक सरकारी प्रोजेक्ट स्थापित करने को कहा था। इस फ्लेटफॉर्म के जरिए सोशल मीडिया, ब्लॉग्स, और न्यूज से डाटा संग्रह किया जाना था। इस संस्था ने कहा था कि इस प्रोजेक्ट के तहत संविदा के तहत मीडियाकर्मियों की नियुक्ति की जानी थी जो ऑनलाइन कंटेट की निगरानी करते।

अनुबंध आधार पर जिला स्तर पर काम करने वाले मीडिया कर्मियों के जरिए सरकार सोशल मीडिया की सूचनाओं को एकत्र करके देखती कि सरकारी योजनाओं पर लोगों का क्या रुख है। हालांकि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर व जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ के सामने सरकारी बयान के बाद इस मामले का निस्तारण कर दिया गया।

 

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