गुजरात की जनता ने AAP, NCP और BSP से ज्यादा NOTA को किया पसंद

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गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों में एक बार फिर ‘ब्रांड मोदी’ का असर दिखा। इसकी बदौलत भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) जहां गुजरात में अपनी सरकार बचाने में सफल रही, वहीं हिमाचल प्रदेश की सत्ता कांग्रेस से छीन ली है। गुजरात की 182 सीटों में से बीजेपी को 99 पर जीत मिली है। कांग्रेस ने सहयोगी दलों के साथ यहां 80 सीटें जीती हैं। बीजेपी लगातार छठी बार गुजरात में सरकार बनाएगी।कांग्रेस बहुमत से भले ही काफी पीछे है लेकिन पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के सघन प्रचार अभियान और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के साथ से कांग्रेस को फायदा मिलता दिख रहा है। वर्ष 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में 182 सीटों वाली सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी को 115, कांग्रेस को 61 और अन्य दलों को छह सीटों पर जीत मिली थी।

उधर हिमाचल प्रदेश में हर 5 साल बाद सत्ता में परिवर्तन का क्रम जारी रहा और कांग्रेस की जगह एक बार फिर बीजेपी सरकार प्रचंड बहुमत से सत्ता में आ रही है। 68 सीटों वाली हिमाचल विधानसभा में पार्टी को 44 सीटें मिली हैं वहीं कांग्रेस 21 सीट पर सिमट कर रह गई है। हालांकि बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल सुजानपुर से चुनाव हार गए हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस को 36 और बीजेपी को 26 सीटें मिली थीं।

गुजरात की जनता ने AAP और BSP से ज्यादा NOTA को किया पसंद

गुजरात की जनता ने नोटा यानी कोई भी पसंद नहीं वाले ऑप्शन का जमकर इस्तेमाल किया है। यहां बीजेपी और कांग्रेस के बाद तीसरे नंबर पर नोटा (इनमें से कोई नहीं) रहा। राज्य में 1.8 प्रतिशत वोट नोटा को गए, यानी किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं मिले। ईवीएम पर यह बटन दबाने वाली उंगलियों की संख्या आम आदमी पार्टी (AAP), एनसीपी और बीएसपी जैसी पार्टियों को मिले वोट से ज्यादा रही है।

बता दें कि ईवीएम में नोटा बटन के जरिए मतदाता यह बता सकते हैं कि चुनाव मैदान में उतरा कोई उम्मीदवार उनका प्रतिनिधि बनने लायक नहीं है। चुनाव आयोग के मुताबिक, पीएम मोदी के गृह राज्य में नोटा पर 1.8 फीसदी यानी 5,51,615 वोट पड़े। 2012 के विधानसभा चुनाव में नोटा का ऑप्शन नहीं था। ऐसे में तुलना करने के लिए 2014 केदीय चुनाव का आंकड़ा उठाया जा सकता है।

उस चुनाव में गुजरात के 4.2 लाख मतदाताओं ने नोटा बटन दबाया था। विधानसभा चुनाव में नोटा का वोट शेयर 1.8 फीसदी रहा है लेकिन जो एक विधानसभा चुनाव के लिहाज से असामान्य बात नहीं है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक नोटा वोट कुल मतों के 0.8 से 3 प्रतिशत के बीच रह सकता है।

न्यूज एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में आम आदमी पार्टी ने कुल 29 सीटों पर ही प्रत्याशियों को उतारा था, जहां पार्टी को केवल 29 हजार 517 वोट हासिल हुए। वहीं इन 29 सीटों पर 75 हजार 880 लोगों ने नोटा का लिकल्प चुना। नोटा का विकल्प चुनने वालों की संख्या 2.5 फीसदी अधिक रही।

हालांकि, पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने वोटिंग से कुछ दिनों पहले गुजरात के लोगों से अपील की थी कि उसे वोट देना, जो बीजेपी को हरा सके। वह चाहे AAP का उम्मीदवार हो या फिर किसी और का। आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों को जितने वोट मिले हैं, उससे ज्यादा वोट नोटा को मिले। हर सीट पर AAP से ज्यादा नोटा को वोट मिले हैं।

इस चुनाव में बीएसपी को जहां 207007 वोट मिले, जबकि एनसीपी को मात्र 184815 वोट मिला। वहीं गुजरात में निर्दलीय प्रत्याशियों को 4.3 प्रतिशत वोट मिले। जबकि बीजेपी को 49.1 फीसदी और कांग्रेस को 41.4 प्रतिशत वोट मिले। गुजरात में 1.8 फीसदी और हिमाचल प्रदेश में 0.9 फीसदी मतदाताओं ने नोटा का विकल्प चुना।

गुजरात में नोटा की अहमियत बढ़ जाती है, क्योंकि कई विधानसभा क्षेत्रों में सफल रहे उम्मीदवार मतों के मामूली अंतर से जीते हैं। मिसाल के लिए कपराडा असेंबली सीट पर कांग्रेस के जीतूभाई चौधरी ने बीजेपी के मधुभाई राउत को 170 वोटों से हराया है। दिलचस्प बात यह है कि यहां नोटा पर 3868 वोट पड़े हैं जिसको कांग्रेस के जनादेश के तौर पर देखा जा रहा है।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 2013 में नोटा को पेश किया गया था। इसका विकल्प पहली बार छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और मिजोरम के विधानसभा चुनावों में दिया गया था। पहली बार में नोटा का वोट शेयर 1.85 प्रतिशत रहा था।

 

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