राफेल डील पर ‘जनता का रिपोर्टर’ के खुलासे से हड़कंप, ट्विटर पर ट्रेंड हुआ #ModiRafaleScam, जानिए क्या है पूरा मामला?

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क्या लड़ाकू विमान राफेल की खरीदारी में बड़ा घोटाला हुआ है? क्या उद्योगपति अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने के लिए नए सिरे से राफेल डील किया गया? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपीए सरकार के दौरान फ्रांसीसी कंपनी के साथ 126 राफेल लड़ाकू विमानों के रक्षा सौदे की प्रक्रिया को रद्द कर अपने दोस्त (अनिल अंबानी) को करोड़ों रुपये का फायदा पहुंचाने के लिए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से खिलवाड़ किया है? कांग्रेस ने मोदी सरकार पर यह सभी आरोप मंगलवार (14 नवंबर) को ‘जनता का रिपोर्टर’ द्वारा राफेल डील पर किए गए एक खुलासे के बाद लगाया। बता दें कि मोदी सरकार बनने के बाद राफेल डील को लेकर ‘जनता का रिपोर्टर’ के खुलासे के बाद राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। कांग्रेस ने मंगलवार को आनन-फानन में प्रेस कॉन्फेंस कर मोदी सरकार से कई तीखे सवाल पूछे।

‘जनता का रिपोर्टर’ का हवाला देते हुए मंगलवार को कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फेंस कर आरोप लगाया है कि राफेल डील पर मोदी सरकार ने ‘राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय सुरक्षा’ के साथ खिलवाड़ किया है जिसे माफ नहीं किया जा सकता है। कांग्रेस के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने राफेल एयरक्राफ्ट खरीद में मोदी सरकार पर घोटाले का आरोप लगाया है। सुरजेवाला का कहना है कि राफेल खरीद में कोई पारदर्शिता नहीं है।

कांग्रेस ने मंगलवार को राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर सवाल उठाते हुए कहा कि मोदी सरकार ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ (सरकारी सांठगांठ वाले पूंजीवाद) को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय और सुरक्षा हितों से समझौता कर रही है। हालांकि बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले में संभावित पूछताछ के डर से कांग्रेस लोगों का ध्यान भटकाना चाहती है।

वहीं, रिलायंस डिफेंस लिमिटेड ने भी कांग्रेस के आरोपों को आधारहीन करार दिया है। इस बीच सोशल मीडिया पर यह मामला गर्म होता दिखाई दे रहा है। मंगलवार (14 नवंबर) को ‘जनता का रिपोर्टर’ द्वारा इस खुलासे के बाद ट्विटर पर मोदी सरकार लोगों के निशाने पर आ गई है। बुधवार (15 नवंबर) को ट्विटर पर हैशटैग  ट्रेंड कर रहा है। इस हैशटैग के जरिए लोग मोदी सरकार पर निशाना साध रहे हैं।कांग्रेस ने लगाया गंभीर आरोप

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कांग्रेस ने फ्रांस के साथ राफेल लड़ाकू विमान की खरीद में घोटाले तथा केंद्र की मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रीय हितों एवं सुरक्षा के साथ समझौता करने का आरोप लगाते हुए दावा किया कि इसके कारण सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा। साथ ही सुरजेवाला ने सौदे में सांठगांठ वाले पूंजीवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने संवाददाताओं को संबोधित करते हुए सरकार से सवाल किया कि वह यूपीए सरकार के दौरान बातचीत के जरिये तय मूल्य से कहीं अधिक मूल्य पर विमान खरीदकर एक व्यापार समूह के हितों को आगे क्यों बढ़ा रहे हैं। उन्होंने इस सौदे में रक्षा खरीद प्रक्रिया तथा हिन्दुस्तान एयरनोटिक्स लि. के हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया।

सुरजेवाला ने कहा कि यूपीए शासनकाल में 12 दिसंबर, 2012 को राफेल से 10.20 अरब अमेरिकी डॉलर (तब के 54 हजार करोड़ रुपये) में 126 लड़ाकू विमान खरीदने का फैसला लिया गया था। इनमें से 18 विमान को तैयार स्थिति में और 108 को भारत में ही हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा तकनीक हस्तांतरण के साथ निर्मित किया जाना था।

लेकिन, मोदी सरकार ने 30 जुलाई, 2015 को यह सौदा रद कर दिया और अगले ही साल 26 सितंबर को 8.7 अरब अमेरिकी डॉलर में 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का सौदा किया। बाद में अनिल अंबानी की रिलांयस डिफेंस लिमिटेड ने राफेल की निर्माता कंपनी दासौत एविएशन के साथ भारत में रक्षा उत्पादन के लिए संयुक्त उपक्रम समझौता कर लिया।

कांग्रेस नेता ने दावा किया कि यूपीए काल में किए गए सौदे में हर विमान का मूल्य 526.10 करोड़ आता, लेकिन अब हर विमान का मूल्य 1570.80 करोड़ रुपये आएगा। इससे सरकारी खजाने को काफी बड़ा नुकसान होगा। यही नहीं, फ्रेंच विमान निर्माता कंपनी ने तकनीक हस्तांतरण (ट्रांसफर ऑफ टेक्नॉली) से भी इनकार कर दिया और एचएएल के स्थान पर रिलायंस डिफेंस के साथ समझौता कर लिया।

सुरजेवाला ने कहा कि मोदी सरकार ने राष्ट्रीय हित एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता करने का अक्षम्य खेल खेला है। उन्होंने कहा कि लड़ाकू विमानों की खरीद में एक बड़ा घोटाला पक रहा है। बड़ी आशंकाएं एवं सरकारी खजाने को गणना न हो पाने वाला नुकसान पहुंचाने के दावे सार्वजनिक जानकारी में है तथा सरकार षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी साधे हुए है।

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कांग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री मोदी से पांच सवाल किये। उन्होंने पूछा कि विमान को ऊंचे दाम पर क्यों खरीदा जा रहा है तथा एक निजी प्रतिष्ठान के व्यापारिक हितों को एक सार्वजनिक निकाय की अनदेखी कर क्यों बढ़ाया जा रहा है। सुरजेवाला ने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद में पूरी तरह अपारदर्शी रखा गया, रक्षा खरीद प्रक्रिया के अनिवार्य प्रावधानों का प्रत्यक्ष उल्लंघन हुआ।

‘जनता का रिपोर्टर’ के खुलासे के बाद हड़कंप

आपको बता दें कि ‘जनता का रिपोर्टर’ ने लड़ाकू विमानों के समझौते को लेकर बड़ा खुलासा किया है कि मोदी सरकार ने अपने कुछ करीबी उद्योगपतियों (अनिल अंबानी) को फायदा पहुंचाने के लिए यूपीए सरकार के दौरान किए गए 126 विमानों के समझौते को रद्द कर महंगे दामों पर 36 लड़ाकू विमानों का सौदा किया।

दरअसल, राफेल की शुरुआती डील यूपीए सरकार के समय में आगे बढ़ी थी। जिसमें भारत व फ्रांस की कंपनी देसाल्त एविएशन के साथ 126 राफेल क्राफ्ट का सौदा हुआ। जिसमें से भारत को 16 क्राफ्ट बने बनाए खरीदने थे और बाकी बचे हुए क्राफ्ट बनाने के लिए कंपनी को वह तकनीक भारत को देनी थी। यह क्राफ्ट भारत की सरकारी पीएसयू हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को बनाने थे।

लेकिन पीएम मोदी ने सत्ता में आने के बाद न सिर्फ बने हुए क्राफ्ट की तादाद 16 से 36 कर दी, बल्कि बचे हुए क्राफ्ट बनाने की जिम्मेदारी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से लेकर एक निजी कंपनी रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को सौंप दी गई, जिसके मालिक अनिल अंबानी हैं। साथ ही हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स के साथ फ्रांसीसी कंपनी की डील भी रद्द कर दी गई।

अगर आकड़ों पर नजर डाले तो इस पूरी प्रक्रिया में देश के खजाने का जबरदस्त नुकसान हुआ। जहां यूपीए सरकार ने 126 जहाजों का सौदा कुल 10.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर में किया था। जबकि मोदी सरकार मात्र 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का सौदा किया जिसके लिए 8.7 अरब अमेरिकी डॉलर देने पड़ेंगे, जिसमें ट्रांसफर ऑफ टेक्नॉली शामिल नहीं हैं।

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जबकि यूपीए के समय में हुए सौदे में तय हुआ था कि फ्रांसीसी कंपनी के साथ हुए कुल मसौदे की आधी रकम के बराबर पैसा भारत में निवेश होगा। साथ ही बचे हुए क्राफ्ट के निर्माण का लगभग 70 फीसदी काम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स को करना था, जबकि 30 फीसदी काम फ्रांसीसी कंपनी को। लेकिन पीएम मोदी ने आते ही इस पूरे सौदे को ही पलट दिया।

पीएम मोदी अप्रैल 2015 को फ्रांस गए और उन्होंने अचानक 23 सितंबर 2016 को 16 की जगह 36 बने बनाए जहाज खरीदने का ऐलान कर दिया। पीएम ने ऐसा करने से पहले न तो देश के रक्षा मंत्री और न ही देश के रक्षा सचिव को भरोसे में लिया।

जब वह (पीएम मोदी) फ्रांस गए तो उनके साथ एक और बड़े उद्योगपति और उनके मित्र अनिल अंबानी (रिलायंस डिफेंस के मालिक) उस समय मौजूद थे। इस ऐलान के 10 दिन के अंदर ही 3 अक्टूबर 2016 को अनिल अंबानी की कंपनी ने देसाल्त एविएशन से लड़ाकू विमानों के प्रोडक्शन को लेकर समझौता कर लिया।

अब सवाल उठता है कि मोदी सरकार ने 36 लड़ाकू विमान क्यों ऊंची कीमतों पर खरीदें? जबकि मनमोहन सरकार के दौरान इनकी कीमत काफी कम थी। तब 126 विमानों की बेस कीमत 10.2 बिलियन अमेरिका डालर थी और इसमें तकनीकी का आदान प्रदान भी था। क्या यह सही है कि मोदी सरकार ने 36 राफेल विमान बिना तकनीकी के 8.7 बिलियन अमेरिकी डालर में खरीदे हैं।

क्या यही सही नहीं है कि यूपीए के सौदे में एक विमान की कीमत 80.95 मिलियन यानी 526.1 करोड़ रुपये कीमत थी, जबकि मोदी सरकार के समय में खरीदे गए प्रति विमान की कीमत 241.66 मिलियन यानी 1570.8 करोड़ रुपये है। इस नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार है?

 

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