केंद्र सरकार ने मंगलवार (28 नवंबर) को सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि दिल्ली सरकार के पास कार्यपालिका के एक्सक्लूसिव अधिकार नहीं हो सकते। यह राष्ट्रहित में नहीं होगा। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली की केजरीवाल सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर कानूनी लड़ाई जारी है। केंद्र सरकार ने मंगलवार को भी शीर्ष अदालत में अपना पक्ष रखा।
file photoशीर्ष अदालत के अनेक फैसलों और एक समिति की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए केंद्र ने प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि एक केंद्र शासित प्रदेश को संविधान के अंतर्गत राज्य के स्तर पर नहीं लाया जा सकता और इसे राष्ट्रपति द्वारा ही शासित करना होगा।
हिंदुस्तान में छपी रिपोर्ट के मुताबिक संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एके सीकरी, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल हैं। यह पीठ उपराज्यपाल को दिल्ली का प्रशासनिक मुखिया करार देने संबंधी दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ आप सरकार की अपीलों पर सुनवाई कर रही है।
अतिरिक्त सालिसीटर जनरल मनिन्दर सिंह ने कहा कि एक केंद्र शासित प्रदेश (दिल्ली) केंद्र शासित ही है। यह राज्य के बराबर नहीं है। उपराज्यपाल राज्यों के राज्यपाल के समकक्ष नहीं है। प्रत्येक केंद्र शासित प्रदेश राष्ट्रपति द्वारा ही शासित होगा। दिल्ली के मामले में भी राष्ट्रपति के अधिकार कम नहीं होते हैं।
सिंह ने राष्ट्रीय राजधानी की स्थानीय सरकार को दिए जा सकने वाले अधिकारों पर विचार करने वाली एक समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि दिल्ली सरकार के पास कोई विशेष अधिकार नहीं है और उसे कोई विशेष अधिकार देना राष्ट्रीय हित में नहीं होगा। इस पर पीठ ने संविधान के प्रावधान का हवाला दिया और कहा कि न तो उपराज्यपाल और न ही मंत्रिपरिषद अपने आप कोई निर्णय कर सकते हैं।
अतिरिक्त सालिसीटर जनरल ने अपनी दलीलों के समर्थन में कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि दूसरे राज्यों की तरह उपराज्यपाल मंत्रिपरिषद की मदद और परामर्श से बाध्य नहीं है और अंतिम अधिकार राष्ट्रपति के पास ही है। सिंह ने कहा कि दूसरे पक्ष (आप सरकार) की दलीलें यही हैं कि यद्यपि मैं एक केंद्र शासित प्रदेश हूं, लेकिन मेरा स्तर एक राज्य के दर्जे का हो। ऐसा नहीं किया जा सकता।