सिसोदिया की CBI जांच पर फिर भड़के केजरीवाल, बोले- PM मोदी की भी हो जांच

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नई दिल्ली। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ सोशल मीडिया कैंपेन ‘टॉक टू AK’ में कथित गड़बड़ियों के आरोप में सीबीआई जांच को लेकर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शुक्रवार(10 फरवरी) को एक बार फिर ट्वीट कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला।

केजरीवाल ने पीएम को निशाने पर लेते हुए कहा कि जैसे पीएमओ ने डिजिटल कैंपेन का ठेका दिया था, ठीक वैसे ही मनीष सिसोदिया ने भी ‘टॉक टू AK’ का टेंडर दिया। उन्होंने कहा कि अगर मनीष के खिलाफ सीबीआई जांच हो रहा है तो प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ भी सीबीआई जांच होनी चाहिए।

आपको बता दें कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सीबीआई ने डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया और स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन की बेटी के खिलाफ जांच शुरू की थी। सिसोदिया के खिलाफ सोशल मीडिया कैंपेन ‘टॉक टू AK’ में कथित गड़बड़ियों के आरोप में, जबकि सत्येंद्र जैन की बेटी सौम्या को मोहल्ला क्लिनिक प्रोजेक्ट में एडवाइजर बनाने के मामले में प्रारंभिक जांच शुरू की गई है।

इससे पहले भी इस मामले में केजरीवाल ने बेहद तीखे शब्दोंं में मोदी पर ‘सीबीआई का गेम’ शुरू करने का आरोप मढ़ चुके हैं। उन्होंने 18 जनवरी को अपने ट्वीट में कहा था कि ‘वाह रे मोदी जी। रिश्वत खाओ ख़ुद और केस करो हम पे। चोरी और सीनाज़ोरी’ इसके बाद उन्होंने ट्वीट किया, ”मोदी जी, इसीलिए मैं आपको कायर बोलता हूं।

गोवा और पंजाब में हार रहे हो तो CBI का गेम शुरू कर दिया?” केजरीवाल ने तीसरे ट्वीट में आरोप लगाया कि मोदी ‘हाथ धोकर उनके और उनकी पार्टी के पीछे’ पड़ गए हैं। उन्होंने लिखा था, ”ऐसा लगता है मोदी जी बिलकुल पगला गए हैं। देश के PM को बस एक यही काम रह गया है। हाथ धोकर पीछे पड़ गए हैं।”

 

 

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  1. Dharmesh Prem shared Himanshu Kumar’s post. 19 hrs Himanshu Kumar 19 hrs
    सुखमती 14 साल की थी,

    सुखमती की बड़ी बहन कमली की शादी उसी गांव में रहने वाले बामन से हुई थी,

    सुखमती के गांव का नाम गम्फूड़ था,

    गम्फूड़ उन तीन गांवों में से एक था जो सरकारी कंपनी एनएमडीसी की लोहा खदान प्रोजेक्ट के लिए विस्थापित हुए थे,

    इन गावों की जमीनों पर से आदिवासियों के झोपड़े हटाकर उनकी खेती खत्म करवा कर भारत सरकार ने लोहा खोदना शुरू किया था,

    और उन्हें जंगल में खदेड़ दिया गया था,

    इन आदिवासियों से वादा किया गया था कि इन तीनों गांव का ऐसा विकास होगा जो सारे देश के लिए एक मॉडल बनेगा,

    स्कूल होगा, आंगनबाड़ी होगी, सड़कें होंगी,

    यह तब की बात है जब दिल्ली में नेहरू प्रधानमंत्री थे,

    सरकार ने लोहा खोदना शुरू किया,

    रोज़ कई सारी रेल गाड़ियों में भरकर लोहा विशाखापट्टनम समुद्र किनारे तक जाता था,

    वहां से पानी के जहाजों में भरकर यह लोहा जापान भेज दिया जाता था,

    सुखमती के गांव और बाकी के 2 गांव को सरकारी कंपनी एनएमडीसी ने गोद लिया था, और इनके सर्वांगीण विकास का वादा किया था,

    सरकार वहां से लोहा खोदती रही,

    लोहा खोदने के लिए बाहर से साहब लोग आकर कंपनी में नौकरी पाते रहे,

    उनके लिए स्टाफ क्वार्टर बने, क्लब बने, सरकारी डाक बंगले बने,

    ट्रक ड्राइवरों के क्वार्टर बने,

    पूरा एक शहर बस गया,

    लेकिन सरकार इन तीनों गावों का विकास करना भूल गई,

    गांव में न कोई स्कूल खोला गया, न कोई आंगनबाड़ी, ना कोई स्वास्थ्य केन्द्र,

    गांव के लोग सब्जी और जंगल से इकट्ठा करे हुए फल ले जाकर इन साहब लोगों को बेच देते थे,

    कुछ लोग जंगल से सूखी लकड़ियां इकट्ठी करके बचेली और किरंदुल शहर में चलने वाले होटल ढाबों में बेच कर अपना घर चलाते थे,

    सरकारी कंपनी एनएमडीसी लोहा खोदने के बाद पहले धोती थी बाद में रेल गाड़ी में लादती थी,

    लोहा धोने के बाद जो लाल पानी बचता था,

    वह लाल पानी इन गावों की तरफ बहा दिया जाता था,

    लोहे के लाल पानी से गांव की नदी बर्बाद हो गई थी,

    गाय बैल नदी का पानी पीकर जल्दी मर जाते थे,

    लाल धूल फसल पर जम जाती थी इसलिये खेती करना भी मुश्किल हो गया था,

    मच्छर बहुत थे, कई लोग हर साल मलेरिया से मर जाते थे,

    विकास का मॉडल खड़ा होने की बजाय विकास के नाम पर धब्बा बन चुके थे यह तीनों गांव,

    2OO5 में सरकार ने यहां सलवा जुडूम शुरू किया,

    जिसके तहत और बड़ी-बड़ी कंपनियों को बस्तर में जमीने दी जानी थी,

    इस बार तो सरकार को आदिवासियों से विकास का कोई वादा करने की जरूरत भी नहीं पड़ी,

    सरकार ने आदिवासियों के गांव जलाने शुरू कर दिये,

    भारी तादाद में सिपाही जंगलों में भर दिए गए,

    जगह जगह पुलिस के कैंप बन गए,

    राजस्थान, हरियाणा, तमिलनाडु और नागालैंड तक के सिपाही जंगलों में झुंड बनाकर घूमने लगे,

    आदिवासी लड़कियों का घर से निकलना मुहाल हो गया,

    एक रोज 14 साल की सुखमती अपनी बहन के देवर भीमा के साथ किरंदुल बाजार गई,

    वहां से लौटते समय अपनी मां के लिए उसने ₹10 की जलेबी खरीदी थी,

    रास्ते में भीमा आगे-आगे था सुखमति पीछे-पीछे थी,

    रास्ते में सुखमति ने देखा जंगल में सिपाही फैले हुए हैं,

    सिपाहियों ने सुखमति और भीमा को पकड़ लिया,

    भीमा को पकड़ कर एक पेड़ से बांध दिया गया,

    सिपाही सुखमति के साथ छेड़खानी करने लगे,

    दो सिपाहियों ने सुखमति के कपड़े फाड़ दिए,

    सिपाहियों ने सुखमति को रौदना शुरु किया,

    सुखमती संख्या भी भूल गई कि उसे कितने सिपाहियों ने रौंदा,

    जी भर जाने के बाद सुखमती और भीमा को थाने ले जाया गया,

    सिपाहियों ने कहा अब इनका क्या करें ?

    छोडेंगे तो यह बाहर जाकर सब कुछ बता देंगे,

    साहब ने कहा गोली से उड़ा दो और वर्दी पहना दो,

    अगले दिन अखबारों में छापा गया हमारे सुरक्षाबलों ने वीरता का परिचय देता देते हुए दो खूंखार माओवादियों को ढेर कर दिया है,

    सुखमति और भीमा की लाशें उसके परिवार वालों को दे दी गई,

    भारत के विकास का जो वादा चाचा नेहरू ने किया था,

    उसके परखच्चे उड़ चुके थे,

    विकास के नाम पर सरकारी सिपाहियों द्वारा रौंदी गई 14 साल की किशोरी की लाश गांव के बीच में पड़ी थी,

    भीमा का बड़ा भाई बामन पिछले हफ्ते अदालत जाने के लिये गांव से निकला,

    रास्ते में सिपाहियों ने बामन को पकड़ कर बुरी तरह पीटा और चाकू से उसका पांव काटने की कोशिश करी,

    बामन को इसी रविवार जेल में डाल दिया गया,

    मुझे खबर मिली है गांव वालों नें सुखमति की लाश का दाह संस्कार नहीं किया है,

    गांव के आदिवासी चाहते हैं कि मीडिया वाले आयें और विकास के नाम पर उनकी बेटियों की दुर्गति देख कर जायें,

    मैनें अपने कुछ पत्रकार मित्रों को वहां जाने के लिये फोन भी किया, लेकिन ज्यादातर पत्रकारों को उनके चैनलों ने चुनाव के समाचार लाने में लगाया हुआ है,

    सुखमती की जगह अपनी बेटियों को रखकर सोचता हूँ तो दिल कांप जाता है,

    यह कौन सी जगह आ गये है हम ?

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