केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिला किया हलफनामा, कहा- देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं रोहिंग्या शरणार्थी

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केंद्र सरकार ने म्यांमार से आए मुस्लिम रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध और देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए देश से वापस भेजने की योजना पर सोमवार (18 सितंबर) को सुप्रीम कोर्ट में 16 पन्नों का एक हलफनामा दायर किया है। इस हलफनामे में मोदी सरकार की तरफ से कहा गया है कि रोहिंग्या मुसलमान देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं।

(Associated Press)

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार ने इस हलफानामे में कहा कि कुछ रोहिंग्या शरणार्थियों के पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों से संपर्क की सूचना मिली है। ऐसे में ये राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से खतरा साबित हो सकते हैं। इसके साथ ही मोदी सरकार ने आशंका जताई कि रोहिंग्या शरणार्थियों के भारत में आने से क्षेत्र की स्थिरता को नुकसान पहुंच सकता है।

अपने हलफनामे में रोहिंग्या शरणार्थियों के पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों से संबंध होने की बात करते हुए उन्हें किसी कीमत में भारत में रहने की इजाजत नहीं देने की बात कही गई है। हलफनामे में सरकार ने कहा कि रोहिंग्या शरणार्थियों को किसी कीमत में भारत में रहने की इजाजत नहीं दी सकती है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए इस मामले को 3 अक्टूबर तक टाल दिया है।

हलफनामे के मुताबिक भारत में अवैध रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या 40 हजार से अधिक हो गई है। हलफनामे में सरकार ने साफ किया है कि ऐसे रोहिंग्या शरणार्थी जिनके पास संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज नहीं हैं, उन्हें भारत से वापस जाना ही होगा। केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में अवैध रोहिंग्या शरणार्थियों की वजह से हो सकने वाली दिक्कतों के बारे में बताया है।

हलफनामे में केंद्र ने कहा है कि रोहिंग्या मुस्लिमों के भारत में रहने से देश के नागरिकों का प्राकृतिक संसाधनों पर जो हक है, वह बुरी तरीके से प्रभावित होगा। इनके भारत में रहने से भारतीय नागरिकों के रोजगार, हाउस सब्सिडी, चिकित्सा, शिक्षा और अन्य मौलिक अधिकारों शामिल किये जाने पर असर पड़ेगा।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने भारत में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों के भविष्य को लेकर सरकार से अपनी रणनीति बताने को कहा था। सरकार द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों को वापस म्यांमार भेजने के फैसले के खिलाफ याचिका को सुनने के लिए स्वीकार करते हुए कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा था। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस भेजे जाने का विरोध किया है।

क्या है रोहिंग्या विवाद

रोहिंग्या समुदाय 12वीं सदी के शुरुआती दशक में म्यांमार के रखाइन इलाके में आकर बस तो गया, लेकिन स्थानीय बौद्ध बहुसंख्यक समुदाय ने उन्हें आज तक नहीं अपनाया है। 2012 में रखाइन में कुछ सुरक्षाकर्मियों की हत्या के बाद रोहिंग्या और सुरक्षाकर्मियों के बीच व्यापक हिंसा भड़क गई। तब से म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ हिंसा जारी है।

रोहिंग्या और म्यांमार के सुरक्षा बल एक-दूसरे पर अत्याचार करने का आरोप लगा रहे हैं। ताजा मामला 25 अगस्त को हुआ, जिसमें रोहिंग्या मुसलमानों ने पुलिस वालों पर हमला कर दिया। इस लड़ाई में कई पुलिस वाले घायल हुए, इस हिंसा से म्यांमार के हालात और भी खराब हो गए।

म्यांमार की सेना ने हाल ही में रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है, जिसकी वजह से लाखों रोहिंग्या भागकर बांग्लादेश के शरणार्थी कैंपों में शरण ले चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने इसे नस्ली सफाए का उदाहरण तक बता दिया है।

 

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