विद्या बालन की ‘बेगम जान’ क्यों देखी जानी चाहिए, पढ़िए फिल्म समीक्षक क्या कहते है

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एक मकान न छोड़ने की जिद पर अड़ी कहानी की नायिका जिसे लोग पेशेवर अलग-अलग गंदे नामों से पुकारते है जब अपनी पर आ जाए तो जान देने और लेने से भी पीछे न हटे। विद्या बालन की खत्म हुई आभा और कमजोर पड़े अभिनय के बीच ‘बेगम जान’ में उनका अभिनय फिर से ये साबित कर कर रहा है कि वह जानती है किरदार में उतरना किसे कहते है।

बेगम जान

पाकिस्तान और हिन्दुस्तान पृष्ठभूमि में रची गई ‘बेगम जान’ की कहानी कई मायनों में व्यवसायिक सिनेमा से अलग नज़र आती है।फिल्म की पृष्ठभूमि में कोठे पर रहने वाली 11 महिलाएं हैं। विभाजन के बाद जब नई सीमा रेखा बनती है तो उस कोठे का आधा हिस्सा भारत में पड़ता है और आधा पाकिस्तान में।

फिल्म न सिर्फ अपने सेट, कास्ट्यूम, साउंड की वजह से अलग नज़र आ रही है बल्कि पीरियड फिल्मों को जिस माहौल की आवश्यकता किसी कहानी को रचने के लिए होती है। ‘बेगम जान’ अपने वो सारे पूरी करती नज़र आती है।

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नवभारत टाइम्स लिखता है करीब दो साल पहले डायरेक्टर श्रीजीत मुखर्जी के निर्देशन में बनी बांग्ला फिल्म राजकहिनी बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित रही। मीडिया में इस फिल्म को जबर्दस्त तारीफें मिली, वहीं फिल्म ने धमाकेदार बिज़नस भी किया। बांग्ला की यह फिल्म 70 के दशक में रिलीज़ हुई श्याम बेनेगल की फिल्म मंडी की याद दिलाती थी।

दैनिक भास्कर लिखता है फिल्म का डायरेक्शन अच्छा है और साथ ही सिनेमैटोग्राफी, ड्रोन कैमरे से लिए हुए शॉट्स, डायलॉग्स भी कमाल के हैं। गोलीबारी के साथ-साथ आग के सीन भी बहुत कमाल के हैं। कहानी के लिहाज से स्क्रीनप्ले और बेहतर हो सकता था। साथ ही एडिटिंग काफी बिखरी-बिखरी जान पड़ती है, जिसे और अच्छा किया जा सकता था। फिल्म में बहुत सारे किरदार हैं, जिसकी वजह कुछ अच्छे किरदार और उनकी परफॉर्मेंस की तरफ आप पूरी तरह से ध्यान नहीं दे पाते हैं। उन किरदारों को और निखारा जा सकता था।

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दैनिक हिन्दुस्तान लिखता है स्क्रिप्ट में ऐसी कई खामियां हैं। हां, फिल्म के संवाद अच्छे हैं, उनमें जबरदस्त पंच है। फिल्म का संगीत बहुत अच्छा है। अन्नू मलिक की धुनें फिल्म के प्रभाव में वृद्धि करती है और कौसर मुनीर के शब्द भी असर डालते हें। कुछ चीजों पर उम्र असर नहीं डाल पाती। आशा भोसले की आवाज भी ऐसी है। यकीन न हो तो ‘प्रेम में तोहरे’ सुन लीजिए। ‘डोली उतारो ओ रे कहारों’ भी बहुत अच्छा गाना है। भोजपुरी गायिका कल्पना इस गाने में एक अलग और बेहतरीन अंदाज में हैं।

आजतक लिखता है विद्या बालन को एक जानदार परफॉर्मेंस की दरकार थी, और उन्हें बेगम जान के साथ वह मौका मिल गया है।बेगम जान में उन्होंने दिखाने की कोशिश की है कि अगर रोल सॉलिड ढंग से लिखा गया हो तो वे उसे बेहतरीन ढंग से अंजाम दे सकती हैं। ऐसा मौका इस बार उनके हाथ लग गया है।

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खबर इंडिया लिखता है फिल्म में चंकी पांडे ने कबीर नाम के ऐसे शख्स का रोल निभाया है जो पैसों के लिए दंगा करवाता है।चंकी इस फिल्म में अलग लुक में नजर आ रहे हैं, उसे देखकर आपको उससे नफरत हो जाएगी और यही चंकी की जीत है।आशीष विद्यार्थी और रजित कपूर का किरदार भी काफी मजबूत है।

वेब दुनिया लिखता है फिल्म की सिनेमाटोग्राफी भी कई बार अजीब लगती है, खासतौर पर हरिप्रसाद और इलियास के चेहरे कई बार आधे दिखाए गए हैं। यह जताने की कोशिश की गई है कि बंटवारे के कारण चेहरे भी आधा हो गया है। लेकिन बार-बार इस तरह के आधे चेहरे स्क्रीन पर देखना दर्शक के लिए अच्छा अनुभव नहीं कहा जा सकता। फिल्म का संपादन भी ढंग का नहीं है और देखते समय दर्शक लगातार झटके महसूस करता है।

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