चोटिल हूँ, लिहाजा कुछ दिनों से लिख नहीं पा रहा हूँ. हाथ टूट गया है. बडी हिम्मत करके कुछ लिख रहा हूँ. खुद बेबस हूँ, और मेरा पेशा, यानि पत्रकारिता मुझसे भी ज़्यादा बेबस. मेरा तो सिर्फ हाथ टूटा है, मगर मौजूदा पत्रकारिता के हाथ पैर पीछे से या तो बांध दिये गये हैं या तोड़ दिये गये हैं या फिर कुछ ने तो अपनी कलम सौंप दी है. इमोशनल अत्याचार ना समझे इसे मगर सोचें ज़रूर.मामला वारिष्ठ पत्रकार परंजोय गुहा ठाकुरता के इस्तीफे का है. उन्होने इस्तीफा इसलिये दिया या दिलवाया गया क्योंकि उनकी पत्रिका इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली केबोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर ने, जो पत्रिका का ट्रस्ट चलाते हैं, उन्हे ये आदेश दिया कि अदानी बिजनेस समूह के बारे में लिखे गये दो लेखों को हटाये. अदानी गुट पहले ही मानहानी का मुकददमा ठोंकने का नोटिस भेज चुका था.
अगर लेख इतने कमजोर थे, तो क्या उन्हे छापने से पहले हकीकत की कसौटी पर परखा नहीं गया था? और अगर विश्वास था तो किस बात का डर? दरअसल, डर सिर्फ मानहानी का नहीं, बल्की प्रक्रिया का है. फैसला तो जब आयेगा तब आयेगा. मगर उससे पहले महंगी न्यायिक प्रक्रिया से कौन गुजरे. अब प्रक्रिया ही सजा है.
मीडिया हाउस पे छापा मार दो, चाटुकार टीवी चैनलों में उसे जमकर उच्छाल दें, आधा काम वही हो जाता है. ये वो काल है जब मामले की सत्यता मायने नहीं रखती, बस शोर होना चाहिये. झूठ भी चीख चीख कर बोलो. कचरा सोच जनता मान ही लेगी. यह वही जनता है जो मोदीजी की काया से चौंधियाये हुई है. उनके वादों पे कोई जवाब नहीं चाहिये.
इसका पेट शब्दों से भर जाता है. और क्या जनता और क्या पत्रकार. तीन साल बाद अब भी सारे सवालों के जवाब, विपक्ष से चाहिये. थकी मरी विपक्ष से. ऐसे पत्रकार कैसे करेंगे सवाल एक ऐसी सरकार से, जो सिर्फ चतुराई से मुद्दों को भटकाना जानती है. ना किसानों पे सवाल, ना शहीद सैनिकों के बढ़ते जनाजों पर सवाल, ना नौकरियों पे सवाल.
मोदीजी गाय पे नाम पर हो रही हत्याओं पर बोलते हैं मगर अपनी शर्तों पर. मीडिया का कोई दबाव नहीं था उनपर. तीन साल पूरा होने पर कितने पत्रकारों ने इस सरकार और उसकी नाकामी पर उसे कटघरे मे खड़ा किया? हम यानि पत्रकार खाते हैं अपनी विश्वश्नियता की. अपनी इमेज़ की. भक्ति काल में हमने इसे ही दांव पे लगा दिया है. चाहे डर, या मौजूदा प्रधानसेवक जी से मंत्रमुग्ध होने के चलते, हमने वो सवाल पूछने बंद कर दिये हैं.
अधिकतर मीडिया में मुद्दे गायब हैं. और जब सवाल नहीं पूछे जाते या उसकी ज़रूरत नहीं मेहसूस होती तो फिर ऐसा ही कॉरपोरेट आतंक सामने आता है. जब सम्पादक कमजोर हो जाता है और “मालिक” दिशा तय करता है. अगले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट को फैसला करना है के निजता यानि प्राइवेसी एक बुनियादी अधिकार है या सामान्य अधिकार.
मोदी सरकार इसे बुनियादी अधिकार नहीं मानती. हैरानी नहीं है मुझे. ये बात अलग है के सामान्य नागरिकों और समय पर कर्ज चुकाने वाले धन्ना सेठों के लिये इस सरकार के लिये निजता के अधिकार के मायने बदल जाते हैं. आज आपकी “निजता” है, कल आपके विचारों की अभिव्यक्ति के अधिकार की बारी हो सकती है. मस्त रहो अपनी भक्ति की चरस में…
(अभिषेक शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं और लेखक के यह व्यक्तिगत विचार हैं, ‘जनता का रिपोर्टर’ लेखक के विचारों का समर्थन नहीं करता।)