तकनीक की कच्ची सड़क पर कैशलेस अर्थव्यवस्था की गाड़ी दौड़ाने का जोखिम भरा प्रयास

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नोटबंदी के बाद हर तरफ कैशलेस का शोर है। जिसे देखो जहाँ देखो यहाँ देखो या वहाँ देखो हर कोई अर्थशास्त्री बनकर कैशलेस के नफा और नुकसान के गुणा भाग में लगा हुआ है। किसी को कैशलेस इकोनॉमी में भविष्य का संवरता भारत नज़र आ रहा है। तो कहीं ज्यादातर लोग कारोबार और लेन देन की इस डिजिटल तकनीक के संभावित दुष्परिणाम को लेकर भयभीत है।

देश की जनता अभी नोटबंदी के झटके से उबर भी नहीं पायी थी की कैशलेस इकोनॉमी के नाम पर एक और जोर का झटका देने की पूरी तैयारियाँ कर ली गई। लेन देन के इस नये तरीके को लेकर सरकार जिस जल्दबाजी मे है उससे लगता है की कहीं नोटबंदी की तरह देश की जनता को एक बार फिर परेशान ना होना पड़ जाए। नोटबंदी की आधी अधुरी तैयारी आये दिन बदलते नियम ATM और बैंकों में कैश को लेकर मारामारी जैसे हालात देश की जनता के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं थे।

ऐसे मे कैशलेस के नाम पर एक बार फिर उसके सामने एक बड़ी परेशानी खड़ी होती नज़र आ रही है। क्या ऐसा नहीं लगता की सरकार तकनीक की कच्ची सड़क पर 120 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से कैशलेस अर्थव्यवस्था की गाड़ी दौड़ाने का जोखिम भरा प्रयास कर रही है?

क्या सरकार ने इसके दूरगामी परिणामों का विस्तृत अध्ययन कराया है? देश का एक बड़ा वर्ग रोजगार सहित बहुत सारी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए असंगठित क्षेत्र के कारोबार पर निर्भर है। क्या सरकार की इस कैशलेस योजना के लिए ये असंगठित क्षेत्र तकनीकी रूप से तैयार है या सरकार ने इस क्षेत्र को कैशलेस लेन-देन के प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता के लिए कोई कार्ययोजना बनाई है?

क्या ये सब इतनी जल्दबाज़ी में होना संभव जितनी जल्दबाज़ी सरकार दिखा रही है? कैशलेस इकोनॉमी में छोटे मोटे खोमचे वालों, दूध फल सब्जी की छोटी सी दुकान चलाने वालों, फुलकी-चाट समोसा गन्ने का रस लस्सी वालों और इसी तरीके का दूसरा छोटा मोटा काम करके अपनी अजीविका चलाने वाले देश के लाखों लोगों के लिए क्या कार्ययोजना है?

ऐसे वक्त में जब देश की जनता ने सरकार के नोटबंदी के फैसले पर हो रही दुख परेशानियों को सहते हुए आये दिन होने वाली मुश्किलों को दरकिनार करके। बैंक की कतारों में दिन दिन भर भूखे प्यासे परेशान होने बावजूद। सरकार के इस जनविरोधी फैसले पर अभूतपूर्व धैर्य का परिचय दिया है। ऐसे समय जब देश की आम जनता को सरकार की तरफ से थोड़ी राहत और हितकारी कदम की उम्मीद थी तब सरकार ने ऐसा कुछ ना करते हुऐ कैशलेस के नाम पर एक और अप्रत्याशित योजना लाकर देश की जनता के सामने ऐक नयी परेशानी खड़ी कर दी है।

अगर थोड़ी देर के लिए ये मान भी लिया जाए की सरकार का ये फैसला देश अर्थव्यवस्था की भलाई के लिया उठाया गया एक अच्छा कदम है तो फिर भी एक बहुत बड़ा सवाल जो हम सबके सामने है वो ये की क्या ये सब करने का ये उचित समय था जबकि देश की जनता बैंको और ATM की कतारों में फंसी हुई है। पिछले 40-42 दिनों से मानसिक रूप से परेशान हो चुकी है। उसके सामने अनेकों किस्म की परेशानियाँ घेरे खड़ी है।

ऐसे मे सरकार की एक और नीति लोगो की परेशानी का सबब बनती नज़र आ रही है। हालांकि ज्यादातर लोगों को तो ये सरकार की नोटबंदी की विफलता को छिपाने के लिए की गई एक नाकाम और बेतुकी कोशिश मात्र लगती है। क्योंकि हमारा देश अभी तकनीकी रूप से इतना सक्षम नही हुआ है की कैशलेस योजना एकदम से थोपी जा सके? लेकिन सरकार जिस तरह से इसे लेकर जल्दबाजी दिखा रही है उससे तो यही लगता है की नोटबंदी की तरह कैशलेस योजना भी हम पर कभी भी थोपी जा सकती है।

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