उत्तर प्रदेश में बढ़ते अपराधों पर मीडिया की चुप्पी की वजह क्या?

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उत्तर प्रदेश चुनाव में सबसे बड़े मुद्दों में से एक था क़ानून व्यवस्था का मुद्दा। ये मुद्दा इतना बड़ा था कि भाजपा के लिए चुनाव में ये लगभग अकेला सेक्युलर मुद्दा रहा।

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File photo: Jagran

पिछली सरकार में हर छोटी बड़ी घटना को मीडिया ने पूरी बारीकी से कवर किया। कई बार तो पुलिस और कोर्ट के फ़ैसले से पहले ही गुनहगार तय कर दिए गए। ऐसा मालूम हो रहा था कि देश में कहीं अपराध है तो सिर्फ उत्तर प्रदेश में है।

चुनाव के दौरान बार बार उत्तर प्रदेश को अपराध में नम्बर वन होने की बात कही गयी। ये बात ना सिर्फ़ मीडिया में बल्कि खुले मंचों से प्रधानमंत्री जी व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा भी कही गयी।

हालाँकि इस बात में कितनी सच्चाई है वह केंद्र सरकार के द्वारा प्रकाशित NCRB के आँकड़ों से पता चल जाएगा।

भाजपा का दावा था कि सरकार बनाते ही क़ानून व्यवस्था में तुरंत सुधार आ जाएगा और 45 दिन में सभी अपराधी जेल की सलाखों के पीछे होंगे।

दंगों को ले कर भी कई दावे किए गए। प्रदेश सरकार पर दंगों को क़ाबू करने में असमर्थ होने का आरोप लगाया गया।

इन सभी आरोपों को मीडिया ने बढ़ चढ़ कर दिखाया। मैं यह नहीं कहती कि मीडिया की भूमिका यहाँ ग़लत थी। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ होने के नाते बाक़ी स्तम्भों पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी मीडिया की ही तो है। मीडिया का काम सत्ताधारी सरकार की नाकामियों को जनता के सामने लाना है और ये काम मीडिया ने उत्तर प्रदेश में बख़ूबी और कभी कभी ज़रूरत से ज़्यादा उत्साह के साथ किया।

लेकिन चुनाव के बाद से मीडिया की चुप्पी हैरान करने वाली है। ऐसा नहीं है कि मीडिया की नज़र उत्तर प्रदेश से हट गयी है। उत्तर प्रदेश नहीं तो यहाँ के मुख्यमंत्री लगातार चर्चा में हैं।

मीडिया की दिलचस्पी नए मुख्यमंत्री में कुछ ऐसी है कि उनके जगने सोने, खान पान, पालतू जानवरों से लेकर उनके नाई तक हर विषय पर चर्चा हो चुकी है।

लेकिन हैरान और परेशान करने वाली बात यह है कि क़ानून व्यवस्था के मुद्दे में मीडिया की अब ख़ास दिलचस्पी नहीं नज़र आ रही है।

आश्चर्य की बात है कि जो मीडिया क़ानून व्यवस्था के मुद्दे पर इतनी गंभीर थी उसे नए मुख्यमंत्री पर चल रहे दर्जन भर मुक़दमे नहीं नज़र आए. ऐसा कैसे हुआ कि हत्या की कोशिश जैसे गम्भीर आरोपों पर मीडिया की नज़र नहीं पड़ी?

वहीं उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी मीडिया के कटघरे में हर अपराध से बाइज़्ज़त बरी होते दिखायी दिए।

ख़ैर जो हुआ सो हुआ. शायद नयी सरकार बनने के उत्साह में मीडिया से ये छोटी सी चूक हो गयी।
लेकिन अब जब सरकार को दो महीने हो चुके हैं तब मीडिया की इस चुप्पी का क्या कारण है?
सहारनपुर में ३ हफ़्ते में ३ बार दंगे हो जाते हैं और यह प्राइम टाइम डिबेट में यह चर्चा का मुद्दा नहीं बनता ऐसा क्यूँ ? आज ही संभल से खबर आयी है कि किस तरह संभल के एक गाँव से लोग सांप्रदायिक तनाव के बाद पलायन करने को मजबूर हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निजी संगठन हिंदू युवा वाहिनी का नाम एक बुज़ुर्ग की हत्या समेत कई अपराधों में सामने आता है लेकिन उसपर सवाल नहीं उठते ऐसा क्यूँ ?

सरकार के पहले ही हफ़्ते में शुरू हुई एंटी रोमियो ड्राइव को मीडिया ने पूरे उत्साह से दिखाया लेकिन उसका क्या नतीजा हुआ और कितनी सफलता मिली इसपर चर्चा क्यूँ नहीं की गयी?

दो महीने में जगह जगह से पुलिस व पुलिस स्टेशन पर हमलों के तमाम केस सामने आते रहे लेकिन अपराधियों के बड़ते हौसले पर मीडिया को कोई आपत्ति नहीं हुई. ऐसा क्यूँ?

सहारनपुर के पुलिस कप्तान के घर पर भाजपा सांसद के हमले के बाद भी उस सांसद को निष्काषित करने की माँग कैसे नहीं उठी ?

महिला पुलिस अफ़सर को सबके सामने प्रताड़ित करने वाले भाजपा नेता पर कारवाई की माँग क्यूँ नहीं हुई?

प्रधानमंत्री जी के संसदीय क्षेत्र में 13 साल की बच्ची के सामूहिक बलात्कार की घटना पर कोई ख़बर नहीं बनती ऐसा क्यूँ?

दिन दहाड़े इलाहाबाद व लखनऊ जैसे बड़े शहरों में महिलाओं के साथ बलात्कार व हत्या जैसे अपराध हो जाते हैं फिर भी मीडिया का ध्यान नहीं जाता।

यह फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है और इसमें अनेकों बलात्कार, हत्या, लूट, डकैती व दंगों के मामले हैं।
समानता एक ही है – मीडिया की चुप्पी।

आख़िर वजह क्या है? क्या मीडिया पर किसी तरह का दबाव है? या मीडिया की प्राथमिकताएँ बदल गयी हैं? मीडिया के इस बदलते रवैए का समाज व राजनीति पर क्या असर हो रहा है?

सवाल उठने लगे हैं। देखना ये है कि मीडिया कब तक चुप्पी साधे रखेगी।

(The author is a Samajwadi Party spokesperson. Views expressed here are her own and Janta Ka Reporter doesn’t endorse them)

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