जिस देश में तुमने जनम लिया उसको दुश्मन बतलाते हो

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योगेश्वर दत्त

गज़नी का है तुम में खून भरा जो तुम अफज़ल का गुण गाते हों,
जिस देश में तुमने जनम लिया उसको दुश्मन बतलाते हो!

भाषा की कैसी आज़ादी जो तुम भारत माँ का अपमान करो,
अभिव्यक्ति का ये कैसा रूप जो तुम देश की इज़्ज़त नीलाम करो!

अफज़ल को अगर शहीद कहते हो तो हनुमनथप्पा क्या कहलायेगा,
कोई इनके रहनुमाओं का मज़हब मुझको बतलायेगा!

अपनी माँ से जंग करके ये कैसी सत्ता पाओगे,
जिस देश के तुम गुण गाते हो, वहाँ बस काफिर कहलाओगे!

हम तो अफज़ल मारेंगे तुम अफज़ल फिर से पैदा कर लेना,
तुम जैसे नपुंसको पे भारी पड़ेगी ये भारत सेना!

तुम ललकारो और हम न आये ऐसे बुरे हालात नहीं
भारत को बर्बाद करो इतनी भी तुम्हारी औकात नहीं!

कलम पकड़ने वाले हाथों को बंदूक उठाना ना पड़ जाए,
अफज़ल के लिए लड़ने वाले कहीं हमारे हाथो न मर जाये!

भगत सिंह और आज़ाद की इस देश में कमी नहीं, बस इक इंक़लाब होना चाहिए,

इस देश को बर्बाद करने वाली हर आवाज दबनी चाहिए!

ये देश तुम्हारा है ये देश हमारा है, हम सब इसका सम्मान करें,
जिस मिट्टी पे हैं जनम लिया उसपे हम अभिमान करें!

जय हिंद ।

योगेश्वर दत्त ओलिंपिक मेडल विजेता पहलवान हैं, और ये कविता उन्होंने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में हो रहे विवाद के बाद लिखा है. यहाँ व्यक्त किये गए विचार उनके निजी हैं ।

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