अब राष्ट्रपति को भी भेज दो पाकिस्तान, उन्होंने कह दिया कि देश में असहिष्णुता है

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इरशाद अली 
बढ़ती हुई असहिष्णुता के मुद्दे पर भले ही पीएम मोदी का मत स्पष्ट ना हो लेकिन माननीय राष्ट्रपति जी इस बढ़ती हुई कट्टरता से भली-भांती परिचित है।
इस पूरे मामले में पहले भी माननीय राष्ट्रपति जी ने पीएम मोदी को चेताया था लेकिन मोदी जी का मौन तो मुखर ही नहीं हुआ। बहरहाल माननीय राष्ट्रपति जी का मत असहिष्णुता को लेकर हमें क्लियर दिखाई देता है। वह इस बात को जानते है कि देश के माहौल में असहिष्णुता है और बढ़ रही है।
1 नवम्बर को देशभर से जुटे तमाम बुद्विजीवियों, कलाकारों, लेखकों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों  ने दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के मावलंकर हाॅल में ‘प्रतिरोध’ नाम से अपनी बात रखने के लिये कार्यक्रम आयोजित किया था जिसे लेकर भक्तजनों ने भारी हल्ला मचाया था और देश के कई नामी लेखकों, कलाकरों को अपनी बात रखते के एवज में ये आरोप लगाया था कि इन लोगों को एक-एक करोड़ रूपया दिया गया है ऐसा करने के लिये।
इस बात पर व्यंग करते हुए जनसत्ता के पूर्व सम्पादक ओम थानवी जी ने तो कहा था कि ‘भाई मैं तो करोड़पति हो गया हूं, तो हमारे भक्त किसी को भी करोड़पति बना सकते है मोदी राज में।’
खैर प्रतिरोध के उसी कार्यक्रम को लेकर कल रात साहित्यकार अशोक वाजपेयी, कलाकार विवान सुंदरम और ओम थानवी जी उस कार्यक्रम का एक ज्ञापन माननीय राष्ट्रपति जी को देने गए थे। जिसमें करीब 25 मिनट इन लोगों की बात माननीय राष्ट्रपति जी से हुई। ओम थानवी जी ने अपनी फेसबुक वाॅल पर लिखा कि पूरी बातचीत के दौरान देश में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर राष्ट्रपति जी चिंतित दिखाई दिये उन्होंने कहा कि दुनिया में कई सभ्यताएं खत्म हो गई, पर भारत अपने बहुलतावाद के कारण आगे बढ़ता रहा।
“उन्होंने आमिर खान प्रसंग का जिक्र छिड़ने पर कहा कि यह सही बात है कि पुरष्कार लौटाना प्रतिरोध का एक तरीका है। यह कहने पर कि इसमें कोई योजना या षड़यंत्र नहीं है, जैसा कि प्रतिरोध करने वालों पर आरोप मढ़ा जा रहा है, राष्ट्पति ने कहा कि मैं जानता हूँ कि यह (प्रतिरोध) स्वतःस्फूर्त है। हमने उन्हें बताया कि प्रतिरोध का आयोजन हम कुछ उत्साही लोगों ने अपनी पहल से किया। इसमें कोई राजनीतिक दल सहभागी नहीं था जैसा कि आरोप लगाया जाता रहा; हाँ, निजी हैसियत में राजनीतिक कार्यकर्त्ता भी साथ देते आए हैं।

“हमने राष्ट्रपति का आभार माना कि वे हिंसा और असहिष्णुता के खिलाफ बोलते रहे हैं और उनका उल्लेख प्रधानमंत्री ने भी किया, भले ही तब प्रधानमंत्री ने अपनी ओर से कुछ नहीं कहा। हमने गुजारिश की कि राष्ट्रपति केंद्र व संबंधित राज्य सरकारों और राजनीतिक दलों आदि को अपने दायित्व के उचित निर्वाह की हिदायत भी दें ताकि सहनशीलता, आपसी सहयोग, समझदारी, बहुलता के प्रति सम्मान, मत-वैभिन्न्य की गुंजाइश और अभिव्यक्ति की आजादी बनी रहे।”

बहरहाल आमिर खान प्रंसग ने बढ़ती असहिष्णुता के मुद्दे को फिर से आईना दिखा दिया है। आप सोचिये जब मुम्बई के लोग रोज सुबह उठकर अखबार खोलते होगें और देखते होगें कि किसी का मुंह काला कर दिया गया है, किसी पर पर इंक फैंक दी गई है, किसी को सिखाया जाता है कि उसे क्या खाना है, किसको आना है किसको जाना है, कैसे रहना है, कैसे जीना है, तब वो क्या सोचते होगें ।
बात सिर्फ मुम्बई या दिल्ली की नहीं देश सारा पूरे घटनाक्रम को देखता है लेकिन ऐसी बातों को नियंत्रण करने वाले जब चुप्पी साध लेते है तब उनकी नियत पर शक करना वाजिब ठहरता है। क्या ये पागल भीड़ किसी लोकतंत्र, किसी सरकार और किसी भी नियत्रंण से आगे निकल चुके है इनको लगाम नहीं कसी जा सकती, इन्हें रोका नहीं जा सकता है। खैर जब तक इन्हें रोका नहीं जा सकता तब तक आप इनको दी जा रही ढील को ही देखिये, लगाम ना सही ढील ही सही। पीएम मोदी की मर्जी वो जैसे चाहे देश चलाए लोकतंत्र और संविधान को नये तरह से परिभाषित करने वालों की जमात जो खड़ी हो गयी है।

 

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