वाह रे भारत की पत्रकारिता, जहां भूक से एक मां की मौत हो जाती है लेकिन मीडिया इंद्राणी के धुन में मस्त है

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रिफत जावेद 

लगभग दो सप्ताह से भारतीय मीडिया जगत में इंद्राणी मुखर्जी की खबरें जोरों पर दिखाई  जा रही हैं। जिसके कारण कई बुद्धिजीवियों ने टीवी चैनलों की इस भटकी हुई प्राथमिकता पर सोशल मीडिया के जरिए अपनी भावनाओं को व्यक्त भी  किया है.

इन टीवी चैनलों ने इंद्राणी मुखर्जी की खबरें परत दर परत दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, किस प्रकार इंद्राणी ने अपनी बेटी की हत्या की जिसे पहले बहन कहा जा रहा था, वो भी ऐसे समय जब पूरा गुजरात हिंसा की आग में झुलस रहा था।

इतना ही नहीं,  हद तो तब हो गई जब इन चैनलों पर हेडलाइंस ये चलने लगे कि  ‘इंद्राणी ने सैंडविच खाया , इंद्राणी खार पुलिस स्टेशन पहुंची, मुंबई पुलिस कमिश्नर खार पुलिस स्टेशन पहुंचे, फिर वह खार पुलिस स्टेशन से बाहर गए और भी बहुत कुछ। मानो आप खबर नहीं क्राइम थ्रिलर की रनिंग कमेंटरी सुन रहे हों। एक टीवी संपादक ने मुझे ट्विटर के जरिए बताया कि गुजरात औऱ इंद्राणी से भी महत्वपूर्ण खबर सीरियाई संकट है तो क्या उन की सारी कवरेज सीरिया पर होनी चाहिए?

इस तरह के बेतुका तर्क का क्या उत्तर दिया जाए। उनके तर्क की अनुसार खबर का चयन उस की महत्वता पर नहीं बल्कि ग्लैमर, सनसनी फैलाने वाले तत्त्व और अनावश्यक नाटक पर होना चाहिए।

मैंने इससे पहले भी लिखा था कि क्या इंद्राणी मुखर्जी की कहानी गुजरात हिंसा से भी बड़ी खबर थी जबकि गुजरात पुलिस का भयावह चेहरा सीसीटीवी कैमरे मैं क़ैद होकर पूरी दुनिया के सामने आ गया था। क्या हमारी पत्रकारिता का स्तर इस हद तक गिर गया है की अब हमारे पास लोगों को दिखाने केलिए सिर्फ़ ये बचा है कि एक पूर्व स्टार इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की पत्नी सैंडविच खाती हैं या फिर कुछ और?

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वो भी ऐसे समय जब देश के  पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत का एक बड़ा भाग भीषण बाढ़ की चपेट में है। केवल असम में ही 50 लोगों की जानें जा चुकी हैं, पंद्रह लाख लोग इस से प्रभावित हुए हैं और दो लाख लोगों को इस समय कैंप में रहना पड़ रहा है। उधर मणिपुर में प्रांतवाद के नाम पर भड़के प्रदर्शनकारियों ने अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के घरों को आग के हवाले कर दिए, इस हिंसा में आठ लोग मारे भी गए। इतना ही नहीं भारत के दक्षिणी भाग में ख्यातिप्राप्त और बुद्धिवादी विचारक एक विद्वान डॉ. मल्लेसपा कलबुर्गी को मार डाला गया फिर इन सब के बीच महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में भयावह सूखा  का आलम ये है की सिर्फ पिछले आठ महीनों में यहां 628  लोगों की जान जा चुकी हैं।

लेकिन इन कहानियों का मीडिया बिरादरी के बीच कोई खरीदार नहीं लगता। कितना अच्छा होता यदि ‘इंद्राणी ने सैंडविच खाया’ या नहीं की जगह अगर मीडिया खास कर न्यूज चैनल में मेरे दोस्त ये भी दिखाते कि  मनीषा या उसके पाँच बच्चों ने खाना खाया या नहीं तो शायद हमारी छोटी से कोशिशों से आज किसी महिला को अपने बच्चों को भूख से बिलकते देखने की शर्मिन्गी से जान न गंवानी पड़ती।

रक्षाबंधन के दिन जब देश भर में भाइ अपनी बहनों की रक्षा करने के लिए अपनी प्रतिज्ञा का नवीकरण कर रहे थे तब महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में एक असहाय 40 वर्षीय महिला किसान मनीषा गटकल खुद को आग लगाने के लिए अपने उपर मिट्टी का तेल डाल रही थी। जो शायद भारत में किसानों द्वारा किए जाने वाले आत्महत्या की चक्र में पहली महिला बन गई।

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लेकिन क्या आप ने किसी भी चैनलों में इस खबर की फ्लैश देखी? क्या किसी भी टीवी चैनलों ने इस पर कोई विशेष प्रोग्राम किए? काश इस का जवाब हाँ में होता। लेकिन सच्चाई कुछ और है।

ज़रा इन तथ्यों पर गौर किजिये।

  • महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में लगातार तीन सालों से हो रहे सूखे के कारण किसानों की आत्महत्या की संख्या में वृद्धि हुई है।
  • 2014 में,  इस क्षेत्र में 574 किसानों ने आत्महत्या की थी ।
  • साल 2015  के पहले आठ महीनों में यहां लगभग 628 किसानों ने अब तक आत्महत्या की है।
  • अनुमान है कि  इस साल मराठवाड़ा के 70 फीसदी भूमि की खरीफ की फसल बर्बाद हो जाएगी।

मनीषा की मौत ने मुझे परेशान कर दिया है। मैं अब तक माने को तैयार नहीं हूँ कि  2015 के भारत में किसी को इस वजह से मरना चाहिए कि उस के पास अपने बच्चों को खिलाने केलिए कुछ नहीं है। मनीषा इस लिए नहीं मरी की उसकी पारिवारिक जीवन में कोई परेशानी थी या फिर उस के अपने सास ससुर से सम्बन्ध ख़राब थे, बल्कि उसकी आत्महत्या के पीछे एक ही वजह थी और वो ये कि  बस वह भूख से बिलकते अपने पांच बच्चों से नज़रें नहीं मिला सकी।

यहां राजनेताओं को दोष देने का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि राजनेता अपना काम सही ढंग से करें यही तो हम पत्रकारों की ज़िम्मेदारी है। हम राजनेताओं को उनकी ज़िम्मेदारी समझाने की जगह उनके ग़ुलाम बन कर रह गए हैं, जो की अतिदुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसा होना नहीं चाहिए था, परन्तु वास्तविकता यही है कि  ऐसा हो रहा है और हम इस बुराई में बराबर के भागीदार हैं ।

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चलिए अगर सीरिया की ही मिसाल ली जाए, जैसा कि  मेरे क़ाबिल टीवी एडिटर ने अपने तर्क के तौर पर इस्तेमाल किया था तो ये सच है कि सीरियाई संकट एक महत्वपूर्ण खबरें होने के बावजूद भी हम अपने देश से जुड़े खबरों को प्राथमिकता देते हैं।  लेकिन फिर भी सीरियाई कवरेज से हमें एक सीख तो मिलती है. वो ये कि सीरिया में नागरिकों की हो रही मौत के बीच जिस तरीके से सीरिया का एक तीन वर्षीय बच्चे आईलान कुर्दी की समूद्र तट पर हुई मौत ने विश्व के विकसित देशों को सीरियाई शरणार्थियों को अपने देशों में जगह देने पर मजबूर होना पड़ा वो किसी सी छुपा नहीं हैं।

इस बच्चे की मौत ने यूरोप की सामूहिक अंतरात्मा को हिलाकर रख दिया। जिस यूरोप ने सीरिया में युद्ध से पीड़ित असहाय लोगों के लिए अबतक अपने दरवाजे बंद कर रखे थे, वे भी उन्हें अपनाने को तैयार हो गए। और इस के पीछे वजह थी पारंपरिक और सोशल मीडिया पर चलायी गई कैंपेन जिसने शरणार्थियों का विरोध करने वाले योरोपीय देशों को भी इन शरणार्थियों को फिर से बसाने के लिए मजबूर कर दिया ।

लेकिन मैं यहां मनीषा की मौत के लिए चिंतित हूं क्योंकि अगर आइलान कुर्दी की मौत दुनिया भर की खबर बन सकती है और वह वायरल हो सकती है तो फिर मनिषा की क्यों नहीं। इसलिए मैं विनम्रता के साथ मीडिया कर्मियों और सोशल मीडिया यूज़र्स से आग्रह करता हूं कि सब मिलकर सरकार पर दबाव बनाएं ताकि फिर किसी और मनीषा को अपने बच्चों को भूखा रखने के शर्म से न मरना पड़े ।

 

1 COMMENT

  1. रिफर जी आपने सही शब्द का प्रयोग किया है ।मीडिया नेताओ का गुलाब हो गया है ।
    मालिक के इशारे पर नाचना गुलाम की मजबूरी है ।शहर जले या घर, बच्चे भूख से मरे या किसी और वजह से, इनके तमाशाई चैनल पर वही दिखाया जायेगा जो बिकता है । अब बुंदेलखंड का मामला ही देख लीजिए, देश पानी से परेशान है और यह इलाका सूखा से त्रस्त है ।पर कोई खबर नही? लो जिले

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