न्याय एक अधूरी प्रक्रिया: भारत में न्याय अमीरों को और गरीबो को सजा

0

सपन गुप्ता, दिल्ली

जब भारत का सविंधान बनाया जा रहा था तो भारतीय न्याय व्यवस्था को ऐसा बनाया गया कि उसमें सबको न्याय मिले और कहा गया की “भले ही कानून की प्रक्रिया से 10 गुनाहगार बच जाये लेकिन किसी बेगुनाह की सजा नहीं होनी चाहिए”| लेकिन भारतीय कानून व्यवस्था की ये आदर्शवादी बाते आज के दौर में कही न कही कुछ अधूरी सी लगती है|

अभी हाल में नैशनल लॉ यूनिवर्सिटी के लॉ कमीशन की एक रिपोर्ट के अनुसार जिसमें यह शौध किया गया की, भारत में मौत की सज़ा को बरकरार रखना है या ख़तम करना है| लॉ कमीशन के चेयरमैन ए.पी.शाह के अनुसार मौत की सज़ा के मामले में विचार करने की बहुत ज्यादा आवश्कयता है| “आम तौर पर मौत की सज़ा दलितों और गरीबो के लिए है, ऐसा लगता है मौत की सज़ा गरीबों का विशेषधिकार है”|

जस्टिस शाह ने अपने एक लेक्चर के दौरान बोलते हुए कहा की “भारत में मौत की सज़ा के बारे में सोचा जाना चाहिए और अब इसके बदले किसी वैकल्पिक सज़ा के बारे में गौर करने की ज़रूरत है”|

एक शौध के अनुसार भारत में पिछले 15 सालों में मौत की सज़ा पाए 373 दोषियों के इंटरव्यू के डेटा को स्टडी किया गया| जिसमे ये पाया गया कि इनमें तीन-चौथाई पिछड़ी जातियों और धार्मिक अल्पसंख्यक वर्गों से थे| 75 फीसदी लोग आर्थिक कमजोर तबके से है| गरीब, दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों को हमारी अदालतों से कठोर सजा इसलिए मिलती है, क्योंकि वे अपना केस लड़ने के लिए काबिल वकील नहीं कर पाते। आतंक से जुड़े मामलों के लिए सजा पाने वालों में 93.5 प्रतिशत लोग दलित और धार्मिक अल्पसंख्यक हैं।

भारत की जेलें ऐसे लाखों लोगों से भरी पड़ी है जिनके पास अपना केस लड़ने के लिए वकील करने के पैसे भी नहीं है| ऐसे लोगों की या तो कभी सुनवाई ही नहीं होती और अगर सुनवाई होती भी है तो कानून की जानकारी के आभाव में या फिर एक अच्छा वकील न कर पाने के कारण ये ख़ुद का पक्ष नहीं रख पते और इन्हें सज़ा सुना दी जाती है|

सीनियर वकील प्रशांत भूषण के अनुसार, ‘यह सच है कि क्लास को लेकर थोड़ा भेदभाव है, वरना हमारी जेलों में इतने सारे लोग ऐसे क्यों भरे होते, जो जमानत लेने के लिए एक वकील तक का इंतज़ाम करने की क्षमता नहीं रखते?’ उन्होंने कहा कि सिर्फ 1 फीसदी लोग ही लायक वकील ढूंढ पाते हैं।

ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क के संस्थापक और सीनियर ऐडवोकेट कॉलिन गॉन्जाल्वेज ने भी यही विचार रखे। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि 75 फीसदी मौत की सजाएं गरीबों को हुई है। अमीर लोग आसानी से बच जाते हैं मगर गरीब, खासकर दलित और आधिवासी फंसे रह जाते हैं।

लॉ कमीशन की रिपोर्ट पर अपनी बात रखते हुए पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए.पी.जे.अब्दुल कलाम ने कहा “किसी भी राष्ट्र के अध्यक्ष के रूप में सबसे मुश्किल काम किसी की फाँसी की सज़ा पर फ़ैसला लेना होता है”|

डॉ कलाम के अनुसार उनके कार्यकाल के दौरान एक स्टडी से पता चलता है की सभी लंबित मौत की सज़ा के केसों में अधिकतर समाजिक-आर्थिक बेस होते है| अगर दुसरे शब्दों में कहे तो ज्यादातक मौत की सज़ा गरीबों के लिए होती है|

आज भी अगर भारत की कोर्ट में लंबित केसों को देखा जाये तो इनकी संख्या 3 करोड़ से कही ज्यादा है या तो सालों से कोर्ट की फाइलों में या तो जेलों में बंद पड़े है| जिसमे ज्यादातर केस तो ऐसे है जिनके ऊपर सिर्फ छोटी-मोती झगड़े या चोरी के केस है लेकिन वो सालों से जेल में सिर्फ इस लिए बंद है क्योकिं उनके पास या तो वकील करने के पैसे नहीं या तो ज़मानत मिलने के बाद ज़मानत की रक़म भरने के लिए भी पैसे नहीं है|

तिहाड़ जेल में सज़ा काट चुके एक व्यक्ति से जब हमने बात की तो उसने बताया की उसे सुनवाई के दौरान 2 बार ज़मानत मिली लेकिन उसके पास ज़मानत की रक़म चुकाने के पैसे न होने के कारण वो बाहर नहीं आ पाया| साथ ही उसे उस पूरी व्यवस्था में अपना पक्ष रखने के दौरान वकील की फीस में ही उसके दो माकन और गाँव की जमीन बिक गई|

भारत की न्याय व्यवस्था दुनियाँ की सबसे मंहगी और जटिल व्यवस्था में से एक है, जहाँ आज भी कोर्ट में पूरी न्याय व्यवस्था अंग्रेजी में है, जहाँ आज भी देश के 70% लोग अंग्रेजी या क़ानूनी भाषा की समझने में अक्षम है| ये एक ऐसी क़ानूनी व्यवस्था है जो की सिर्फ पढ़े लिखे आमिर लोगों के लिए ही है| गरीब और कम पढ़े लिखे लोगो के लिए आज भी भारत की न्याय व्यवस्था बहुत दूर की बात मालूम होती है|

 

 

 

LEAVE A REPLY