जब देश का मिज़ाज ख़राब हो तो ट्विटर पे मिलेंगे #देशभक्ति_के_नुस्खे

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एक ज़माना था जब हमारी तबीयत खराब होती थी और अच्छे डाक्टरों की सुविधा न होने की वजह से हमें दादी जी या फिर नानी जी के नुस्खे पर निर्भर करना पड़ता था । यक़ीन मानिये वो नुस्खे कमाल के होते थे ।

मिसाल के तौर पर, अगर सर्दी, ज़ुकाम हो जाये तो नानी के कहने पर फ़ौरन तुलसी, अदरक और काली मिर्च की चाय से बढ़कर कोई दवा नहीं होती थी । और अगर चोट लग जाए तो दादी माँ द्वारा हल्दी की लेप दर्द को छू मंतर कर देती थी ।

शरीर में कोई खराबी आ जाये तो दादी माँ या फिर नानी जान के नुस्खों को आज भी याद करके अपने स्वास्थ को ठीक कर लेते हैं, लेकिन जब बात देश के स्वास्थ की हो और पुरे मुल्क के मिज़ाज को एक ज़हरीली विचारधारा ने विषैला बना दिया हो तो फिर किन नुस्खों पर अमल किया जाए?

मैं भी इसी उधेड़ बुन में था मेरी निगाह ट्विटर पर पड़ी । ऊपर वाला भला करे ट्विटर यूज़र्स का, जो आपदा की ऐसी घडी में बहुत कामयाब सिद्ध होते हैं, फिर भले ही उनके द्वारा दिए गए सुझाव या नुस्खों में कटाक्ष ही क्यों ना हो ।

जवाहरलाल यूनिवर्सिटी विवाद के बाद जब आरएसएस की विचारधारा को समर्थन करने वाले वकीलों, राजनीतिक पार्टियों और पत्रकारों और चैनलों ने फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाना शुरू किया तो, ट्विटर पर ऐसे पाखंडियों केलिए नुस्खे आना शुरू हो गए ।

हैशटैग #देशभक्ति_के_नुस्खे के तहत किसी ने आरएसएस की यह कह कर खिल्ली उड़ाई के उन्हें राष्ट्र ध्वज को अपने नागपुर स्थित आफिस में लहराने में 52 साल क्यों लगे, तो किसी ने भाजपा से पुछा के ज़रा ये तो बताईये के आप अफज़ल गुरु को शहीद मानने वाली पार्टी पीडीपी के साथ 10 महीने सरकार में क्या कर रहे थे ।

आखिर वो कौन सा राष्ट्रवाद था जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पीडीपी नेता मेहबूबा मुफ़्ती के साथ फोटो खिंचवा कर गर्वान्वित महसूस कर रहे थे ख़ास कर ऐसे समय जब जम्मू कश्मीर की इस पार्टी के दर्जनो नेता एक लिखित बयान के माध्यम से अफज़ल गुरु को न सिर्फ शहीद मान रहे थे बल्कि उसकी फांसी की तुलना ‘इन्साफ का गला घूँटने’ जैसी बात से कर रहे थे ।

शायद देशभक्ति के मुद्दे पर भाजपा या संघी मानसिकता के इसी दोहरे मापदंड को उजागर करने केलिए ही सोशल मीडिया यूज़र्स ने ट्विटर का सहारा लिया।

पेश है ट्विटर पर इस मुद्दे पर पोस्ट किये गए ट्वीट्स :

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