…जब शिक्षक ने अपनी बेटी का नाम एक डॉक्टर के नाम पर रखा

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फरवरी 2003 में, समस्तीपुर में रहने वाली तीन साल की चुनचुन को मस्तिष्क कैंसर की सर्जरी के लिए दिल्ली के एक अस्पताल में ले जाया गया था। लेकिन चार साल बाद जब उसके पिता उसे एक चेक अप के लिए फिर से उसी अस्पताल में ले कर गए तब वह अमृता आचार्य बन चुकी थी।

नाम परिवर्तन के पीछे एक खांसा रहस्य है, डॉ राजेश आचार्य जो एक न्यूरोसर्जन हैं, इन्होने ही 2003 में सर गंगा राम अस्पताल में एक व्याकुल परिवार को दिलासा देते हुए कहा था कि, वह सर्जरी का खर्च माफ करवा सकते हैं और उसके बाद उनहोंने चुनचुन की ब्रेन सर्जरी की थी।

उस सर्जरी के बाद चुनचुन का परिवार डॉक्टर आचार्य का इतने आभारी हुआ कि उन्होंने आधिकारिक तौर पर चुनचुन का नाम बदलने का फैसला किया।

अमृता, जो अब 15 साल कि हैं और समस्तीपुर के आइकॉन-प्रीत पब्लिक स्कूल में दसवीं कक्षा की छात्रा हैं उसने बताया कि,”जब मेरा स्कूल में एडमिशन कराया गया तब मेरे दादाजी एक विचार के साथ आए और कहा कि मेरा नाम एक श्रद्धांजलि के रूप में एक सर्जन के नाम पर होना चाहिए, जिन्होंने मुझे जिंदगी दी और उसके बाद एफिडेविट पर लिख दिया कि जिन्होंने मेरे जीवन को बचाया है उन डॉक्टर के नाम पर मेरा नाम नामित किया जाएगा। ”

दूसरी तरफ डॉक्टर आचार्य कि बात करें तो वह इसको “एक पुरस्कार” के रूप में स्वीकार करते हैं। डॉक्टर आचार्य ने बताया कि ,”मैं बहुत चकित हो गया जब मुझे पता लगा कि उन्होंने उसका नाम बदल दिया है। अक्सर सर्जन को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिलते हैं, और उन्हें वह प्रदर्शन के लिए रखते है, पर इस इनाम को मैं कैसे प्रदर्शित करू ?”

एक सप्ताह अमृता अपने दादाजी के साथ दिल्ली आई, जिनका नाम विकास कुमार है।

विकास ने बताया कि,”हमारे पास उस वक़्त बिलकुल पैसे नहीं थे और सभी हमें बोल रहे थे कि बिहार में इसका इलाज़ करना जोखिम भरा हो सकता है। उसके बाद हम दिल्ली के डॉक्टर आचार्य के पास अपनी किस्मत आज़माने आगए। ”

अस्पताल में जल्द से जल्द बच्ची की सर्जरी कराने को बोला गया, आगे विकास ने बताया कि,”हमारे पास उतने पैसे नहीं थे इसलिए डॉक्टर आचार्य से हमने मदद मांगी। शुक्र है, उन्होंने सामान्य वार्ड में हमारे प्रवेश में मदद की और सर्जरी की लागत को माफ करने के लिए प्रशासन से बात भी की। ”

परिवार वालों को सरकारी अस्पताल में बच्ची को भर्ती कराने के लिए भी बोला गया था पर उन लोगों ने मना कर दिया। जिसपर कुमार ने बताया कि,”हम बिहार में पहले ही सरकारी अस्पताल जा चुके थे, वहां उन्होंने बोला था कि कोई चमत्कार ही होगा जो इसको बचा ले। उन्होंने कहा था कि यह ज़िंदा नहीं रह सकेगी इसलिए अब हम दिल्ली के भी किसी सरकारी अस्पताल में जाना नहीं चाहते थे।”

सर्जरी के बारे में जब डॉक्टर आचार्य से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि,”हमने तीन-चार बार इलाज़ किया। सर्जरी के बाद वह काफी ठीक हो गयी थी, और मार्च में हमने उसको डिस्चार्ज  भी कर दिया था, साथ ही हर 2-3 साल में चैकअप कराने कि सलाह दी।”

डॉक्टर ने यह भी कहा कि जब अमृता 2007 में आई तब बड़ी मुश्किल से वह उसे पहचान पाए।

आगे अमृता ने बताया कि,”जब मैंने इस साल अपने बोर्ड परीक्षा के लिए पंजीकृत किया तब स्कूल के अधिकारियों ने मेरे सरनेम के बारे में प्रश्न उठाये थे, क्यूंकि वह मेरे पिता के नाम से बिलकुल अलग है, पीतम कुमार पंकज। ”

आखिर में अमृता ने अपने भविष्य के बारे में बताते हुए कहा कि,”मैं जान गई हूं कि लोगों कि जिंदगी किस तरह एक डॉक्टर्स पर निर्भर होती है और मेरे माता-पिता भी कितने हेल्पलेस रहें होंगे जब वह डॉक्टर आचार्य के पास गए। मैं भी लोगों की मदद करना चाहूंगी जैसे डॉक्टर आचार्य ने की। ”

 

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