साम्प्रदायिकता और नफरत की राजनीति पर मोदीजी का दाँव खुद उन पर उल्टा पड़ा

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इरशाद अली

भाजपा द्वारा सरकार बनाने के लिए दिए गए विकास के वादे की छवि अब पूरी तरह से धूमिल होती जा रही है और जो सरकार का नया चेहरा निकल कर आ रहा है उसमें विकास के स्थान पर दिखाई देती है साम्प्रदायिकता, हिंसा और फासीवादी विचारधारा।

भाजपा को चुनाव जीताने के लिए विज्ञापन कम्पनियों द्वारा तैयार किया गया स्लोगन ‘अच्छे दिन आने वाले है’ अब अपना मतलब खो चुका है। मोदी जी देश के प्रधानसेवक तो बन गए लेकिन अपने मुख्य एजेंण्डे से बाहर नहीं निकल सके।

उन्होेंने अपने इस डेढ़ साल के कार्यकाल में लोगों का विश्वास पक्का किया है कि गुजरात जैसा नरसंहार केवल नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में ही सम्भव था। एक उन्माद भीड़ किसी मासूम आदमी को घर से निकाल कर हैवानों की तरह से मार देती है और प्रधानमंत्री अपनी चुप्पी तोड़ने में भी दिलचस्पी नहीं दिखाते।

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सरकार ना सिर्फ इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगा लगाने में बुरी तरह नाकाम रही है बल्कि ऐसी घटनाओं के जिम्मेदार और भड़काउ लोगों के संरक्षक की भूमिका का निर्वाह भी कर रही है। कल ही अमित शाह ने संगीत सोम, खट्टर और दूसरे भड़काउ भाषण देने वाले फायरब्रांड चेहरों की ‘क्लास’ ली। ऐसा भारतीय मिडिया का कहना था, जबकि एक पक्ष यह भी कह रहा था यह सब महज़ एक दिखावा था।

उनके मुताबिक़ बिहार चुनाव में अपनी हार महसूस कर भाजपा के नेतृत्व ने शायद यह दिखाने की कोशिश की हो कि साम्प्रदायिकता और नफरत की राजनीति के मुद्दों पर वह बहुत सख्त है। यदि ऐसा है तो मोदी जी ने अब तक दादरी हत्याकांड, ग़ुलाम अली मामले या फिर सुधींद्र कुलकर्णी के मुंह पर कालिख पोथे जानी की खुलकर भर्त्स्ना क्यों नहीं की।

सिर्फ इन्ही मुद्दों पर मोदीजी क्यों मौन व्रत धारण कर लेते हैं? भारतीय जनता बहुत जागरूक है, वह सब भली भाँति समझती है। फ़र्क़ सिर्फ यह है कि वह सही समय का इंतज़ार करती ऐसे दोहरे चेहरे वाले नेताओं को सबक सिखाने केलिए।

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वहीं दूसरी तरफ आरएसएस के राकेश सिन्हा लगातार मीडिया से बात करते हुए कह रहे है कि इस तरह के भड़काउ बयान और गतिविधियों को अंजाम देने वाले लोगों से बचने की जरूरत है। ये नरेन्द्र मोदी सरकार का एक ऐसा दांव था जिसके बल पर उन्होने हिन्दूराष्ट् का सपना देखा था। इस सपने को देखने में जिन लोगों की भूमिका थी आज जब वो अपने कारनामों को दिखा रहे है तो सरकार ऐसे लोगों से अपनी दूरी बनाने का ढोंग दिखा रही है।

जबकि दूसरी तरफ मोदी भक्तों को मनचाहा करने की छूट मिली हुई है। अगर वो अब भी ऐसा नहीं कर पाए तो कब करेगें।

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लेकिन सवाल ये उठता है कि सरकार का बनाया हुआ जिन्न अब खुद सरकार को ही डराने लगा है। मोदी जी भले ही ऐसे में संरक्षक की भूमिका में दिखते हो लेकिन वे अपना पीछा भी इस सबसे छुड़ाना चाहते है। गुजरात नरसंहार के दाग अभी उनके दामन से छुटे भी नहीं है और भक्त हर प्रदेश को गुजरात बनाने की कवायद में लगे हुए दिखते है।

चाहे वो संगीत सोम हो या साध्वी प्राची या योगी आदित्यनाथ या दूसरे नेता, सब मिलकर जिस भारत का निर्माण कर रहे है उसमें लोकतंत्र की भावना का सम्मान नहीं है। अगर कुछ है तो वह कट्टरता और सर्किणता। ऐसे में आज नरेन्द्र मोदी जी का दांव उन पर ही उल्टा पड़ गया है।

NOTE: Views expressed are the author’s own. Janta Ka Reporter does not endorse any of the views, facts, incidents mentioned in this piece.

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