बड़ी सोशल नेटवर्किंग के छोटे दिखावे

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इरशाद अली 

आजकल फेसबुक और टिवटर पर एक ट्रेंड तेजी से फैल रहा है कि लोग किसी जरूरतमंद की मदद करते हुए अपनी सेल्फी उसके साथ लेकर शेयर करते है। इसमें कुछ अलग-अलग तरह की मजेदार कहानियां वो कहते है।

जैसे एक साहब ने कहा कि “मुझे ये बच्चा सड़क पर पेन बेचता हुआ मिला, मैने पुछा तुम स्कूल क्यों नहीं जाते उसने कहां उसे पैसे की जरूरत है इसलिए वो पेन बेचता है, मुझे उस बच्चे के ऐसे हालात पर बहुत दुख हुआ मैंने तभी एक पेन उससे खरिदा और बराबर के होटल से एक चाय उसे पिलायी और बिस्किट भी दिलाया।”

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अब दूसरी स्टोरी देखिए – “अपने चाचा जी को अस्पताल से देखकर लौटते वक्त अस्पताल में ही एक बुजूर्ग मुझे मिले जिनसे मिलने उनके घरवाले काफी दिनों से नहीं आए थे मैंने कुछ सेब उनके लिए खरीदे और उनके साथ ली गयी अपनी सेल्फी आपके साथ शेयर कर रही हूं।”

एक और स्टोरी देखिए-“आॅटोवाले भय्या के पास पैसे छुटे नहीं थे तब मैंने बाकि का चेंज भी उन्हें ही दे दिया। पूरे सत्तर रूपये थे। आॅटोवाले भय्या की स्माइल कमाल की थी, पिक आपके साथ शेयर करती हूं।”

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आपको इस तरह की और भी बहुत सारी कहानियां फेसबुक और टिवटर पर दिखाई देगी जिनमें यूजर अपने आपको ऐसे शो करते है जैसे किसी की मदद कर उन्होने दुनिया को बदल दिया है।

इस तरह की कहानियों में एक आम सवाल हर किसी गरीब बच्चें से वो पुछते है वो ये कि तुम स्कूल क्यों नहीं जाते और बच्चें का जवाब भी एक सा होता है ‘मैं पैसे के लिए ये काम करता हूं।’

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फिर हमारा यूजर उससे खिलौना, मूर्ति या जो वो बेच रहा है खरीद लेता है और अपनी सेल्फी लेकर दुनिया पर अहसान कर देता है।

जरूरत है इस तरह के सोशल दिखावे से बचने की क्योंकि लोग दिखावे और असलियत को समझ जाते है और बाद में आपका मजाक आपकी ही सेल्फी करवा देती है।

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  1. बहुत ही उम्दा लेख लिखा है है हकीक़त है ये सेल्फी में लोग इतने पागल हो गये है;

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