उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने खारिज किया CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव

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उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू ने देश के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को ‘पद से हटाने’ के लिए कांग्रेस एवं अन्य दलों की ओर से दिये गये नोटिस पर कानूनविदों से विस्तृत विचार विमर्श के बाद सोमवार (23 अप्रैल) को उसे नामंजूर कर दिया।

उपराष्ट्रपति
File photo- PTI

राज्यसभा सचिवालय के सूत्रों के अनुसार नायडू ने कांग्रेस सहित सात दलों के नोटिस को नामंजूर करने के अपने फैसले की जानकारी राज्यसभा के महासचिव देश दीपक वर्मा को दे दी है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नायडू के फैसले की पुष्टि करते हुये बताया, ‘‘सभापति ने वर्मा से कहा है कि वह नोटिस देने वाले सदस्यों को उसे नामंजूर किये जाने की जानकरी से अवगत करा दें।’’

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस सहित सात दलों ने न्यायमूर्ति मिश्रा के खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए शुक्रवार को उपराष्ट्रपति नायडू को नोटिस दिया था। नोटिस में न्यायमूर्ति मिश्रा के खिलाफ पांच आधार पर कदाचार का आरोप लगाते हुये उन्हें ‘प्रधान न्यायाधीश के पद से हटाने की प्रक्रिया’ शुरू करने की मांग की थी।

अधिकारी ने बताया कि नायडू ने देश के शीर्ष कानूनविदों से इस मामले के सभी पहलुओं पर विस्तार से विचार विमर्श करने के बाद यह फैसला लिया है।

उन्होंने बताया कि नोटिस में न्यायमूर्ति मिश्रा पर लगाये गये कदाचार के आरोपों को प्रथम दृष्टया संविधान के अनुच्छेद 124 (4) के दायरे से बाहर पाये जाने के कारण इन्हें अग्रिम जांच के योग्य नहीं माना गया। राज्यसभा सचिवालय नोटिस देने वाले सदस्यों को इसे स्वीकार नहीं करने के नायडू के फैसले के मुख्य आधारों से भी अवगत करायेगा।

विपक्षी दलों के 71 सदस्यों के हस्ताक्षर वाले इस नोटिस पर नायडू ने कल संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप और पूर्व विधि सचिव पी. के. मल्होत्रा सहित अन्य विशेषज्ञों से कानूनी राय ली थी। नोटिस पर हस्ताक्षर करने वाले सदस्यों में 64 वर्तमान सदस्य हैं जबकि सात सदस्य अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ लगाये गये आरोप न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमतर आंकने वाले

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ विक्षप की ओर से दिये गये महाभियोग का नोटिस खारिज करते हुए राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि प्रस्ताव में न्यायमूर्ति के खिलाफ लगाये गये आरोप न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमतर आंकने वाले हैं।

समाचार एजेंसी भाषा के मुताबिक नायडू ने सोमवार को इस प्रस्ताव को नामंजूर करते हुये अपने आदेश में कहा कि उन्होंने न्यायमूर्ति मिश्रा के खिलाफ लगाये गये प्रत्येक आरोप के प्रत्येक पहलू का विश्लेषण करने के बाद पाया कि आरोप स्वीकार करने येाग्य नहीं हैं। उन्होंने आरोपों की विवेचना के आधार पर आदेश में लिखा ‘‘इन आरापों में संविधान के मौलिक सिद्धातों में शुमार न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कम करने वाली प्रवृत्ति गंभीर रूप से दिखती है।’’

नायडू ने कहा कि वह इस मामले में शीर्ष कानूनविदों, संविधान विशेषज्ञों, संसद के दोनों सदनों के पूर्व महासचिवों और देश के महान्यायवादी के. के. वेणुगोपाल, पूर्व महान्यायवादी के. पारासरन तथा मुकुल रोहतगी से विचार विमर्श के बाद इस फैसले पर पहुंचे हैं। उन्होंने विपक्षी सदस्यों द्वारा पेश नोटिस में खामियों का जिक्र करते हुये कहा कि इसमें सदस्यों ने जो आरोप लगाये हैं वे स्वयं अपनी दलीलों के प्रति स्पष्ट रूप से अनिश्चिचत हैं।

उन्होंने कहा कि सदस्यों ने न्यायमूर्ति मिश्रा के खिलाफ कदाचार के आरोप को साबित करने के लिये पेश किये गये पहले आधार में कहा है, ‘‘प्रसाद एजूकेशन ट्रस्ट में वित्तीय अनियमितता के मामले में प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि प्रधान न्यायाधीश भी इसमें शामिल रहे होंगे।’’ इस आधार पर सदस्यों ने कहा कि देश के प्रधान न्यायाधीश को भी मामले की जांच के दायरे में रखा जा सकता है।

नायडू ने आरोपों की पुष्टि के लिये इसे अनुमानपरक आधार बताते हुये कहा कि देश के प्रधान न्यायाधीश को पद से हटाने की मांग करने वाला प्रस्ताव महज शक और अनुमान पर आधारित है। जबकि संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत न्यायाधीश को पद से हटाने लिये कदाचार को साबित करने वाले आधार पेश करना अनिवार्य शर्त है। इसलिये पुख्ता आधारों के अभाव में यह स्वीकार किये जाने योग्य नहीं हैं।

नायडू ने उच्चतम न्यायालय में मुकदमों की सुनवाई हेतु विभिन्न पीठों को उनके आवंटन में प्रधान न्यायाधीश द्वारा अपने प्रशासनिक अधिकारों का दुरुपयोग करने के आरोप को भी अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि हाल ही में उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की पीठ ने अपने फैसले में निर्धारित कर दिया है कि प्रधान न्यायाधीश ही मुकदमों के आवंटन संबंधी ‘रोस्टर का प्रमुख’ है। ऐसे में अधिकारों के दुरुपयोग का आरोप भी स्वीकार्य नहीं है।

राज्यसभा के सभापति ने कहा कि पुख्ता और विश्वसनीय तथ्यों के अभाव में पेश किये गये प्रस्ताव को स्वीकार करना अनुपयुक्त और गैरजिम्मेदाराना होगा। उन्होंने इस तरह के आरोप लगाने से बचने की सदस्यों को नसीहत देते हुये कहा ‘‘लोकतांत्रिक व्यवस्था के संरक्षक होने के नाते इसे वर्तमान और भविष्य में मजबूत बनाना तथा संविधान निर्माताओं द्वारा सौंपी गयी इसकी समृद्ध एवं भव्य इमारत की नींव को कमजोर नहीं होने देना हम सबकी यह सामूहिक जिम्मेदारी है।’’

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