कासगंज हिंसा का सच: क्या मुसलमानों को फंसाया गया? पहले FIR में सामने आई 10 बड़ी गलतियां

0

उत्तर प्रदेश के कासगंज में इस साल गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) के दिन तिरंगा यात्रा के दौरान हुई सांप्रदायिक हिंसा मामले में कई सनसनीखेज खुलासा हुआ है। एक स्वतंत्र जांच में किए गए तहकीकात में सामने आया है कि यूपी पुलिस की जांच में कासगंज हिंसा मामले में कथित तौर पर हिंदुओं को बचाने की कोशिश की गई है, जबकि बेगुनाह मुसलमानों को फर्जी तरीके से फंसाया गया है। इस रिपोर्ट को देश और विदेश में कार्यरत कई सामाजिक और मानवाधिकार संगठनों ने समर्थन किया है।

File Photo

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) के मौके पर तिरंगा यात्रा के दौरान दो समुदायों में भिड़ंत हो गई जिससे तनाव व्याप्त हो गया। इस दौरान दोनों समुदायों की और से जमकर पथराव और आगजनी की गई। इसके बाद वहां तोड़-फोड़ और कई गाड़ियों और दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया। इस हिंसा में 22 वर्षीय चंदन गुप्ता नाम के युवक की जान चली गई थी, वहीं अकरम नाम के एक युवक की एक आंख फोड़ दी गई थी। इस बीच इस स्वतंत्र रिपोर्ट में पहले FIR में 10 बड़ी गलतियां सामने आई हैं।

पहले FIR में 10 बड़ी गलतियां

  • ग़लत समय: एफ़आईआर के मुताबिक एसएचओ रिपुदमन सिंह को हिंसा की सूचना सुबह 9:30 बजे मिली। लेकिन सीसीटीवी फ़ुटेज से पता चलता है कि दोनों गुटों के बीच का झगड़ा कम से कम 25 मिनट बाद शुरू हुआ।
  • अलग-अलग घटनास्थल: रिपुदमन सिंह ने लिखा कि हिंसा बिलराम गेट चौराहे से शुरू हुई, लेकिन अन्य पुलिस वालों और चश्मदीद गवाहों ने बाद में बयान दिए कि हिंसा वहां से 400 मीटर दूर अब्दुल हमीद चौक पर हुई।
  • जानकारियां शामिल नहीं की गई: एफ़आईआर में इसका जिक्र नहीं है कि अब्दुल हमीद चौक पर मुसलमानों द्वारा तिरंगा फहराए जाने के कार्यक्रम में हिंदुओं द्वारा बाधा डालने की कोशिश के बाद हिंसा शुरू हुई।
  • ग़लत दूरी: एफ़आईआर कहता है घटनासल कासगंज कोतवाली से 500 मीटर दूर है जबकि ये दूरी 300 मीटर की है।
  • ग़लत दावा: एफ़आईआर कहता है कि पुलिस स्टेशन को हिंसा की जानकारी रात 10:09 बजे मिली जबकि एसएचओ रिपुदमन सिंह के साथ अन्य पुलिस वाले भी उस सुबह हिंसा के चश्मदीद गवाह रहे थे।
  • विलंब का कारण नही: एफ़आईआर में “देरी का कारण बताओ” वाला कॉलम ख़ाली है। हिंसा की अविध 00:00 लिखी गई है।
  • हत्या दर्ज नहीं: एफ़आईआर हिंसा के 12 घंटे बाद दर्ज किया गया फिर भी उसमें चंदन गुप्ता की मृत्यु का जिक्र नहीं है। और न ही इस बात की कोई जानकारी दी गई कि हत्या का जिक्र क्यों नहीं है।
  • शिकायतकर्ता नहीं: हिंसा भीड़भाड़ वाले इलाक़े में दिनदहाड़े हई जहां सैकड़ों घर और दुकानें हैं। फिर भी स्वतंत्र शिकायतकर्ता खोजने के बजाए एसएचओ रिपुदमन सिंह ने एफ़आईआर में शिकायतकर्ता की जगह अपना नाम लिख दिया।
  • ढीली जांच: एसएचओ ने कहा झगड़ा उनके पहुंचने से पहले शुरू हो गया था। फिर भी 12 घंटे तक एफ़आईआर नहीं दर्ज किया।
  • दंगाइयो की पहचान: हिंसा के समय एसएचओ सिंह हिंदुओं से बात कर रहे थे। एफ़आईआर में फिर भी हिंदुओं का नाम नहीं है। जो मुस्लिम दंगाई उनके मुताबिक गली के अंदर से गोलियां चला रहे थे उनको दूर से पहचान लिया।

TRUTH OF KASGANJ

Investigative Report Exposes Gaping Holes In FIR/Charge-sheet

Posted by Janta Ka Reporter on Wednesday, 29 August 2018

Pizza Hut

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here