एक और झूठ हुआ उजागर! तुलसीदास ने अकबर की सुरक्षा में लिखा था रामचरितमानस

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आज (30 जुलाई) भारत के महान संत और कवि तुलसीदास की जयंती है। 16वीं शताब्दी में अवध में लिखा गया है, तुलसीदास के रामचरिता मानस को भारत-गंगा बेल्ट का बाइबिल माना जाता है। राम चरित्र मानस को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विद्वानों द्वारा दुनिया में लिखा गया सबसे गहनतम साहित्य के रूप में माना जाता है। तुलसीदास सम्राट अकबर के समकालीन थे।आम तौर पर हिन्दुत्व सेना अकबर के खिलाफ तुलसीदास को लेकर खड़े हो जाते हैं। इसका कारण यह है कि अकबर अपने उदारवादी, सहिष्णु और उदार नीतियों के साथ, मुगल और अंग्रेजों को जोड़ते हुए और भारत के 1000 वर्ष के ‘गुलामी’ की झूठी संघी कथा से परेशान करते हैं। मुगल भारतीय प्रोटो-राष्ट्रवादी थे और देश के भीतर भारत के धन को परिचालित करते थे, भारत की सकल घरेलू उत्पाद को 20 फीसदी और भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में 22 फीसदी तक लेकर गए थे।

चूंकि, भारत की अधिकांश जनसंख्या हिंदू थी, मुगल शासन, जैसा कि अभिलेखों में वर्णित है जाट खाप, जैन साहित्य, ब्राह्मण ग्रंथों, ईसाई यात्रा, और राजस्थान (मारवाड़ी), गुजरात (बन्नियस और वोहरा), बंगाल और वर्तमान में यूपी के कई बड़े इलाके जहां व्यापारिक परिवारों की अकाउंट बुक्स की शांति, सुरक्षा और अनकहा समृद्धि लोगों के लिए है।

वहीं दूसरी तरफ, ब्रिटिश डे-इंडस्ट्रीज इंडिया ने अंग्रेजी औद्योगिक क्रांति के वित्तपोषण के लिए भारत की संपत्ति को लूट लिया, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भारत का हिस्सा 2 प्रतिशत कर दिए और 1947 तक भारत की विकास दर काफी नीचे गिरा दिए।

भारत 18वीं शताब्दी में अपनी औद्योगिक क्रांति के शिखर पर था… हमें रेलवे, कानूनों की व्यवस्था और ‘आधुनिकता’ और लोकतंत्र के सभी सामानों का निर्माण करने के लिए ब्रिटिश हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी…हम स्वतंत्र परिणामों के साथ उपनिवेशवाद के आघात के बिना वास्तव में यह सब कर सकते थे।

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आदित्यनाथ योगी द्वारा बीजेपी के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में 25 मार्च को दिए गए पहले वक्तव्य में से एक तुलसीदास और अकबर के बारे में था। योगी ने गोरखपुर में कहा कि अकबर तुलसीदास से मिलना चाहता था। लेकिन बाद में प्रस्ताव को खारिज करते हुए दावा किया गया कि राम एकमात्र ‘सम्राट’ थे जिसे उन्होंने मान्यता दी थी। योगी ने अकबर को एक आक्रमणकारी और हिंदूविरोधी भी कहा था… हालांकि, संघी अकबर के तुलसीदास को कैद के बारे में गलत कहानियां नहीं कही।

इलाहाबाद स्कूल ऑफ इंडियन हिस्ट्री(जिसे ध्वस्त कर दिया गया है) के प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार और मुगल विरोधी डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने अपनी किताब बंगाल स्कूल ऑफ हिस्ट्री में लिखा है कि भारतीय इतिहास कहता है कि अकबर ने तुलसीदास को किसी कारण की वजह से कभी कैद कर लिया था। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। डॉ आरपी त्रिपाठी, डॉ ताराचंद, और डॉ सतीश चंद्र इसके विपरीत है जो इलाहाबाद स्कूल के संघी डॉ ईश्वरी प्रसाद से संबंध है।

सबूत है कि तुलसीदास न केवल काशी में अकबर से मुलाकात की थी। लेकिन यह है कि अब्दुर रहीम एक भक्त कवि के माध्यम से जो कृष्ण के बारे में लिखा है वैसे ही तुलसीदास ने राम के बारे में लिखा। अकबर विद्वानों के प्रकोप से संरक्षित था…तुलसीदास काशी में राम चरित मानस पूरा की… रूढ़िवादी ताकतें राम की कहानी को फिर से परिभाषित करने के लिए तुलसीदास के प्रयास, मूल रूप से संस्कृत और अवध में वाल्मीकि द्वारा लिखे जाने से बेहद नाराज थे।

रूढ़िवादी ताकतों ने तुलसीदास को अपमानित करने की कोशिश की। वे भी तुलसीदास को मारने के लिए कई प्रयास किए है। तुलसीदास ने इन हमलों से नाराज होकर लिखा था: धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूत कहौ, जोलहा कहौ कोऊ। काहूकी बेटीसो बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ॥ तुलसी सरनाम गुलामु है रामको, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ। माँगि कै खैबौ, मसीतको सोइबो, लैबोको एकु न दैबेको दोऊ॥

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(चाहे कोई धूर्त कहे अथवा परमहंस कहे; राजपूत कहे या जुलाहा कहे, मुझे किसी की बेटी से तो बेटे का ब्याह करना नहीं है, न मैं किसी से सम्पर्क रख कर उसकी जाति ही बिगाड़ूँगा। तुलसीदास तो राम का प्रसिद्ध गुलाम है, जिसको जो रुचे सो कहो। मुझको तो माँग के खाना और मस्जिद में सोना है; न किसी से एक लेना है, न दो देना है…)

कई विद्वानों ने यह भी समझा है कि तुलसीदास ने वास्तव में एक मस्जिद में रहते हुए रामचरित मानस लिखा था, क्योंकि यह एकमात्र स्थान है, जो उसे जीवित रहने के लिए पर्याप्त था… इस समय यह है कि तुलसीदास रहिम दास खाननाखेना के संपर्क में आए…तुलसीदास को अजीब तरह से पता चला था जिसमें जन्म से रहिम मुसलमान था, लेकिन भगवान कृष्ण का भक्त था…

जबकि गरीबों को दान देते हुए, रहिम ने उस व्यक्ति को कभी नहीं देखा जिसे वह दान कर रहा था, उसकी नजर को नीचे की ओर रखते हुए धरम, चरम विनम्रता में, दान करने वालों के चेहरे की ओर ध्यान न दे .. तुलसीदास एक महान कवि थे जिन्होंने स्वयं निम्नलिखित कविता लिखी और इसे रहिम को भेज दिया। “ऐसी देनी देंन ज्यूँ, कित सीखे हो सैन ज्यों ज्यों कर ऊंच्यो करो, त्यों त्यों निचे नैन”

काशी के लक्खा मेले में हुई सन्त तुलसीदास और सम्राट अकबर की भेंट… धर्म नगरी काशी में…नाग नथैय्या की झांकी कभी अकबर बादशाह ने भी ली थी… बादशाह की शिरकत का मन्तव्य था इस महौत्सव में हाजरी बाजाना और श्री राम चरित मानस के कालजयी रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास महाराज का सानिध्य पाना…इस एतिहासिक छण का गवाह है जयपुर संग्रहालय में उप्लब्ध वो नायब तस्वीर जिसमे काशी के तुलसी घाट पर गंगा में तैरती दो अलग-अलग नौकाओं पर बैठे वार्तालाप करते गोस्वामीजी और बादशाह अकबर को दिखाया गया है…

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चित्र के अन्कन के अनुसार यह एतिहसिक घटना आज से लगभग चार सौ साल पहले सन 1590 की है…जब बादशाह चुनार गढ के बन्दोबस्त के लिये यहां आये और गोस्वामीजी से मिलने की आकुलता के चलते तुलसी घाट तक खींचे चले आये…इस दुर्लभ चित्र में हाथी घोड़ों और शाही फौज की रजगज ही बताने को काफी है की यह अवसर किसी मेले का है…और इसका वैभव यह साबित करता है की यह नाग नथैय्या मेला ही है…

चित्रकार ने अपनी रचना का फोकस उस वार्तालाप पर केन्द्रित रखा है…जिसमे बादशाह अकबर और गोस्वामी जी एक दूसरे से मुखातिब हैं…दस्तावेजो के अनुसार बादशाह ने गोस्वामीजी को दरबार में आमन्त्रित किया था गोस्वामीजी ने बड़ी विनर्मता से राजकिय प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया…इस साफगोई का बादशाह पर इतना असर हुआ की वो गोस्वामीजी जैसे लोकनायक से मिलने को आतुर हो उठे…

बादशाह को जब पूर्वांचल आने का मौका मिला तो गोस्वामीजी से मिले बिना न रह सके…चित्रकार ने तूलिका से इस मुलाकात के भावों को उकेरा है…चित्र यह भी बताता है की उस दिन तुलसी घाट उत्सवी रंग से सरोबार था…चित्र का गहन अध्ययन करने के बाद विख्यात पाण्डुलिपि विशेषज्ञ डॉक्टर उदय शंकर दुबे बताते हैं की इस मुलाकात के बाद बादशाह अकबर गोस्वामी तुलसीदास तथा उनकी अमर अजर रचना से इतना प्रभावित हुए की राजधानी पहुंच कर सबसे पहले राम चरित मानस की सुरक्षा और उसके फारसी अनुवाद का काम रहीम दास खानेखाना को सौंपा…इसी ग्रन्थ की छाया प्रतियां आज तुलसी संग्रहालय में उप्लब्ध हैं…

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