EXCLUSIVE- रिपोर्टर मुझसे जो पूछ के जा रहे हैं, टीवी पर उसका उलटा क्यूं दिखा रहे हैं?

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शाहनवाज़ मलिक

जनवरी 2015 में एनआईए ने सीलमपुर के एक मदरसा संचालक अब्दुल समी क़ासमी को उत्तर प्रदेश के हरदोई से गिरफ्तार किया था। क़ासमी पर इस्लामिक स्टेट के पक्ष में भड़काई बयान और तक़रीरें करने का इल्ज़ाम है। तभी से दिल्ली का नॉर्थ ईस्ट इलाक़ा खुफ़िया और सिक्योरिटी एजेंसियों के राडार पर है।

नई गिरफ़्तारी एक दिन पहले इसी इलाक़े के गोकलपुरी से मोहम्मद साजिद की हुई है। इनके अलावा छह लड़के हिरासत में हैं। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने साजिद को जैश-ए-मुहम्मद के एक नए मॉड्यूल का मुखिया बताया है।
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जब मुझे इस ख़बर के लिए गोकलपुरी निकलना था, तब मैं साउथ एक्स में अपने एक दोस्त के दफ़्तर में चाय पी रहा था। वो मुझे बार-बार रुकने के लिए कह रहे थे। तब मैंने उनसे कहा कि जनाब अभी वहां पहुंचने और लोगों से बात करने में मुझे काफी दिक्कतें आने वाली हैं। बहुत मुश्किल से लोग खुलकर बात करने के लिए तैयार होते हैं।

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उन्होंने वजह पूछी? तब मैंने बताया कि टीवी के पत्रकारों को लेकर पब्लिक में ज़बरदस्त गुस्सा होता है। वो अपनी ख़बरों के लिए झूठ बोलते हैं, धोखा देते हैं, फिर काम निकालकर वहां से भाग जाते हैं। ऐसी हरकतों से नाराज़ पब्लिक का गुस्सा उन पत्रकारों को झेलना पड़ता है जो वहां लंबे समय तक रुककर ढंग से काम करना चाहते हैं।

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मेरा अंदेशा बिल्कुल सही निकला। जब मैं चांद बाग पहुंचा तो लोग भड़के हुए थे। गली नंबर-2 से उठाए गए इमरान के कज़िन अयूब ने बात करने से इनकार कर दिया। उन्होंने बताया कि मुहल्ले का एक बच्चा घर से इमरान की एक आईडी लेकर गया था। अब टीवी पर वही आईडी घूम रही है और उसे जैश-ए-मुहम्मद का आतंकी बताया जा रहा है। बहुत मुश्किल से वो मुझसे बात करने के लिए तैयार हुए। इससे पहले मेरे कई सारे आईडी प्रूफ उन्होंने दिखाने पड़े।

स्पेशल सेल ने गली नंबर 6 से अज़ीम अहमद नाम के एक लड़के को उठाया है। ये दिमाग़ी तौर कमज़ोर हैं। वज़न 50 किलो से भी कम है। इनके बड़े भाई कलीम कनॉट प्लेस की इनर सर्किल की मोती मस्जिद के इमाम हैं। मुझे देखते ही भड़क गए। साफ कर दिया कि हमें मीडिया से कोई बात नहीं करनी। उन्होंने कहा कि हम देवबंद से पढ़े हुए हैं। आप जमीयत प्रमुख मौलाना अरशद मदनी से बात करिए। हम आपके किसी सवाल का जवाब नहीं देंगे।
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चूंकि अरशद मदनी मेरे जानने वालों में से हैं। मैंने उनसे कहा कि आप ख़ुद अरशद मदनी को फोन करके पूछ लें कि शाहनवाज़ से बात करनी चाहिए या नहीं? इसके बाद वो लोग तैयार हुए और काफी लंबी बात चली।

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वहां से लौटते वक्त मैं वापस साजिद के घर गया। मुझे उनकी बहन महज़बीं से मिलना था। जब मेरे सवाल ख़त्म हुए तो महजबीं ने कहा कि मैं भी कुछ पूछूं? मैंने कहा बेशक़ पूछिए।
उनके सवाल कुछ इस तरह थे….
1- टीवी पर ऐसा क्यूं दिखाया जा रहा है कि मेरे घर से आग की लपटें उठ रही हैं? आप ख़ुद देखिए यहां आग या धुएं का निशान कहां है?
2- टीवी पर हमारे ग्राउंड फ्लोर को तहख़ाना क्यूं कहा जा रहा है?
3-रिपोर्टर मुझसे जो पूछ के जा रहे हैं, टीवी पर उसका उलटा क्यूं दिखा रहे हैं?
4- वो मेरे भाई को बार-बार मास्टरमाइंड क्यूं कह रहे हैं?
मैंने कहा कि वो दिन बहुत क़रीब है जब मोबाइल छिनने या जेब कटने पर भी टीवी के अंदर से मास्टरमाइंड मास्टरमाइंड की आवाज़ आने लगेगी। बस कुछ दिन और इंतज़ार करिए।
उन्होंने कहा कि टीवी देखते हुए लगा कि मेरे हाथ की नसें फट जाएंगी। फिर मैं उसे बंद करके बाहर आ गयी।

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हिन्दुस्तान में टीवी पत्रकारिता के बारे में कमोबेश यही राय हर तरफ बनती जा रही है। एक दिन मेरे मकान मालिक ने कहा कि अब हमारे दफ्तर में लोग दूरदर्शन देखने लगे हैं। वो ओएनजीसी में अफसर हैं।

मौलाना अरशद मदनी आज सुबह ब्रिटेन के लिए निकल रहे थे लेकिन मुझे उनसे स्टोरी के लिए बात करनी थी। कॉल के वक्त वो आईजीआई एयरपोर्ट पर थे। मेरे सवालों का जवाब देने के अलावा उन्होंने कहा कि टीवी के पत्रकार पुलिस और एजेंसियों के भोंपू की तरह बर्ताव करते हैं। बाद में जब कोर्ट ऐसे मुलज़िमों को बाइज़्ज़त रिहा करता है तो ये ख़बर तक नहीं चलाते। इससे आतंकवाद के झूठे इल्ज़ाम का शिकार होने वाला मुसलमान ज़िंदगीभर उसके साथ जीने को मजबूर हो जाता है।

उन्होंने हैदराबाद के डॉक्टर जलीस अंसारी की मिसाल दी। उन्होंने बताया कि 6 दिसंबर 1993 में हैदराबाद में सीरियल ब्लास्ट हुए थे। जनवरी 1994 में आंध्रा पुलिस ने जलीस अंसारी को गिरफ्तार किया था। मीडिया इन्हें डॉक्टर बम डॉक्टर कहकर पुकारा या लिखा करती थी लेकिन 22 साल के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कल इन्हें रिहा कर दिया और सारा मीडिया ख़ामोश है।

Shahnawaz Malik is an independent crime journalist 

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