अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यरुशलम को इजराइल की राजधानी के रूप में दी मान्यता, जानें इस ऐलान के बाद क्यों मचा है बवाल?

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विश्व समुदाय की चेतावनियों को दरकिनार कर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका यरुशलम को इसराइल की राजधानी के रूप में मान्यता देता है। साथ ही उन्होंने अमरिकी दूतावास को तेल अवीव से यरुशलम लाने को मंजूरी दे दी। ट्रंप के इस कदम का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध के साथ-साथ अमेरिका में भी विरोध हो रहा है।

Photo: Getty Images

ट्रंप ने दशकों पुरानी अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय नीति को तोड़कर ऐसा किया। इस कदम से जहां इजरायल खुश है, वहीं अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में चिंता है। वे इसे पश्चिम एशिया में हिंसा भड़काने वाला कदम मानते हैं। यह कदम पूर्व अमेरिकी प्रशासनों की कोशिशों के विपरीत भी माना जा रहा है जो कि इस कदम को अशांति के डर से अब तक रोके हुए थे।

बीबीसी के मुताबिक ट्रंप में अपने भाषण में कहा कि ‘अतीत में असफल नीतियों को दोहराने से हम अपनी समस्याएं हल नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि आज मेरी घोषणा इसराइल और फलस्तीनी क्षेत्र के बीच विवाद के प्रति एक नए नजरिए की शुरुआत है।

ट्रंप ने इस बात की पुष्टि की कि वो यरुशलम को इसराइल की राजधानी का दर्जा देंगे। उन्होंने कहा कि यरुशलम को इसराइल की राजधानी की मान्यता देने में देरी की नीति ने शांति स्थापित करने की ओर कुछ भी हासिल नहीं किया है। ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि वह यरुशलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता देंगे।

यरुशलम को इसराइल की राजधानी के रूप में मान्यता दिए जाने के ट्रंप के फैसले की काफी आलोचना हो रही है। मुस्लिम जगत के नेताओं और व्यापक अंतरराष्ट्रीय जगत ने इसकी तीखी आलोचना की है। यरुशमल को इसराइल की राजधानी की आधिकारिक मान्यता देने वाला अमेरिका पहला देश बन गया है।

क्यों मचा है हंगामा?

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक फलस्तीनी और इसराइली विवाद के केंद्र में प्राचीन यरुशलम शहर ही है। इस प्राचीन शहर में यहूदी, ईसाई और मुस्लिम धर्म के सबसे पवित्र स्थल हैं। रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर इसराइली यरुशलम को अपनी अविभाजित राजधानी मानते हैं। इसराइल राष्ट्र की स्थापना 1948 में हुई थी। तब इसराइली संसद को शहर के पश्चिमी हिस्से में स्थापित किया गया था। वर्ष 1967 के युद्ध में इसराइल ने पूर्वी यरुशलम पर भी कब्जा कर लिया था।

प्राचीन शहर भी इसराइल के नियंत्रण में आ गया था। बाद में इसराइल ने इस इलाके पर कब्जा कर लिया लेकिन इसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली। यरुशलम पर इसराइल की पूर्ण संप्रभुता को कभी मान्यता नहीं मिली है और इसे लेकर इसराइल नेता अपनी खीज जाहिर करते रहे हैं। वहीं, फलस्तीनी पूर्वी यरुशलम को अपनी राजधानी के रूप में मांगते हैं।1980 में इजरायल ने यरुशलम को अपनी राजधानी बनाने का ऐलान किया था। लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने एक प्रस्ताव पास करके पूर्वी यरुशलम पर इजरायल के कब्जे की निंदा की।

इस शहर को ही दो राष्ट्र समाधान के रूप में भी जाना जाता है। इसके पीछे इसराइल के साथ-साथ 1967 से पहले की सीमाओं पर एक स्वतंत्र फलस्तीनी राष्ट्र के निर्माण का विचार है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों में भी यही लिखा गया है।अंतरराष्ट्रीय समुदाय दशकों से ये कहता रहा है कि यरुशलम की स्थिति में कोई भी बदलाव शांति प्रस्ताव से ही आ सकता है। यही वजह है कि इसराइल में दूतावास रखने वाले सभी देशों के दूतावास तेल अवीव में स्थित हैं।

धार्मिक लिहाज से बेहद अहम

भूमध्य और मृत सागर से घिरे यरुशलम को यहूदी, मुस्लिम और ईसाई तीनों ही धर्म के लोग पवित्र मानते हैं। यहां स्थित टेंपल माउंट जहां यहूदियों का सबसे पवित्र स्थल है, वहीं अल-अक्सा मस्जिद को मुसलमान बेहद पाक मानते हैं। मुस्लिमों की मान्यता है कि अल-अक्सा मस्जिद ही वह जगह है जहां से पैगंबर मोहम्मद जन्नत पहुंचे थे। इसके अलावा कुछ ईसाइयों की मान्यता है कि यरुशलम में ही ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था। यहां स्थित सपुखर चर्च को ईसाई बहुत ही पवित्र मानते हैं।

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