JNU से लापता छात्र नजीब पर फर्जी रिपोर्ट छाप बेनकाब हुए टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रवि शेखर झा

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न्यू इंडिया में जिस प्रकार राजनीतिक पार्टियां अपने भड़काऊ बयानों से आम जनता के दिमाग को कट्टरपंथ से भर कर अपना अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं, ठीक उसी प्रकार भारतीय मीडिया का भी एक वर्ग अपना रूप बदलकर दुनिया के सबसे खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट(आईएस) से भी ज्यादा खतरनाक साबित होते जा रहे हैं।

दरअसल, हम ऐसी बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि 21 मार्च 2017 को अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ़ इंडिया में पत्रकार राज शेखर झा ने एक रिपोर्ट छापी कि पिछले वर्ष अक्टूबर महीने से लापता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय(जेएनयू) के छात्र नजीब अहमद के आईएस से जुड़ने की फिराक में था, क्योंकि पुलिस ने उसके लैपटॉप की ब्राउजिंग हिस्ट्री में यह पाया कि वह आईएस से संबंधित जानकारी जुटा रहा था।

झा ने अपने रिपोर्ट में दावा किया था कि गूगल और यूट्यूब द्वारा दिल्ली पुलिस को मुहैया कराई गई रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि लापता होने से पहले नजीब आईएस की विचारधारा, नेटवर्क, कार्यप्रणाली, जुड़ने के तरीके की जानकारी जुटा रहा था। जबकि उसी दिन दिल्ली पुलिस ने पत्रकार रवि शेखर झा कि रिपोर्ट को खारिज कर उन्हें बेनकाब कर दिया।

पुलिस ने कहा कि जेएनयू से लापता छात्र नजीब अहमद केस में जांच के दौरान उसके, आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट से किसी प्रकार के जुड़ाव की जानकारी सामने नहीं आई है। दिल्ली पुलिस के मुख्य प्रवक्ता दीपेन्द्र पाठक ने खुद यह जानकारी दी। पाठक ने बताया कि दिल्ली पुलिस को केस की जांच में नजीब के आईएसआईएस के साथ किसी भी प्रकार के जुड़ाव की जानकारी सामने नहीं आई है।

जिसके बाद मुख्य और तीसरे पृष्ठ पर 600 शब्दों में फर्जी रिपोर्ट छापने वाले टाइम्स ऑफ इंडिया ने अगले दिन यानि 22 मार्च 2017 को अखबार के पांचवें पेज पर एक कोने में मात्र 100 शब्दों का भूल सुधार छाप कर अपना कोटा पूरा कर दिया। जबकि उसी फर्जी रिपोर्ट के आधार पर कई राष्ट्रीय न्यूज चैनलों ने नजीब को आतंकी घोषित कर दिन भर न्यूज चलाते रहे। सोशल मीडिया पर लोग रवि शेखर झा से मांफी की मांग करते हुए उनकी जमकर आलोचना कर रहे हैं।

बता दें कि नजीब (27) गत वर्ष 14-15 अक्टूबर से ही कथित रूप से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्यों के साथ हुई हाथापाई के बाद से लापता हैं। पांच महीने से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन अब तक नजीब का कोई अता-पता नहीं है। आखिर कहां गया नजीब? क्या हुआ उसके साथ? इन सवालों के जवाब न तो दिल्ली पुलिस के पास हैं और न ही केंद्र सरकार के पास। जबकि दिल्ली में कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी केंद्र सरकार के ऊपर है।

पढ़ें, नजीब मामले में अब तक क्या हुआ है?

जेएनयू

  • 14 अक्तूबर 2016- रात के वक्त नजीब अहमद का जेएनयू में कथित तौर पर एबीवीपी छात्रों से झगड़ा हुआ।
  • 15 अक्तूबर 2016- दोपहर नजीब हॉस्टल छोड़ कर कहीं चला गया, लापता होने का आरोप लगा।
  • 16 अक्तूबर 2016- पुलिस ने नजीब के गायब होने का मामला दर्ज करने के बाद जांच शुरू की।
  • 20 अक्तूबर 2016- नजीब के बारे में सूचना देने वालों को 50 हजार रुपये देने का किया ईनाम घोषित।
  • 25 अक्तूबर 2016- नजीब मामले में पुलिस ने ईनाम की राशि 50 हजार से बढ़ाकर एक लाख की।
  • 04 नवंबर 2016- नजीब की सूचना देने वाले के लिए ईनाम की राशि बढ़ाकर की गई दो लाख रुपये।
  • 05 नवंबर 2016- पुलिस ने नजीब की तलाश के लिए जारी किया वीडियो विज्ञापन।
  • 12 नवंबर 2016- नजीब मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई।
  • 15 नवंबर 2016- नजीब मामले में ईनाम की राशि पांच लाख रुपये की गई।
  • 16 नवंबर 2016- पुलिस ने उस आटो चालक को ढूंढ निकाला, जिस पर सवार होकर नजीब निकला था।
  • 28 नवंबर 2016- ईनाम की राशि बढ़ाकर दस लाख रुपये कर दी गई।
  • 16 मार्च 2017- नजीब को पांच महीने बाद भी ढूंढने में नाकाम रही दिल्ली पुलिस को हाईकोर्ट ने लगाई फटकार।
  • कोर्ट ने पुलिस को लताड़ते हुए कहा कि आप सिर्फ पेपर वर्क पर ध्यान दे रहे हैं और जनता का पैसा बर्बाद कर रहे हैं।

 

 

 

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