CBI के बाद अब केंद्र सरकार और RBI गवर्नर उर्जित पटेल के बीच बढ़ रहा तनाव! जानिए क्या है पूरा माजरा

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देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और मोदी सरकार के बीच पिछले कुछ दिनों से घमासान जारी है। यहां तक की यह मामला देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। खबरों की मानें तो अब केंद्र सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के बीच तनातनी की खबर है। रिपोर्ट के मुताबिक आरबीआई के गवर्नर ऊर्जित पटेल और सरकार में नीतिगत मुद्दों पर पर्याप्त मतभेद हैं।

अंग्रेजी अखबार द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 2018 के शुरुआती महीनों में सरकार और आरबीआई की दूरियां बढ़ी हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सरकार और आरबीआई के बीच संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न होती जा रही है। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने हाल ही में सरकार के हस्तक्षेप की ओर इशारा किया था। विरल ने कहा था कि आरबीआई की स्वायत्तता पर चोट किसी के हक में नहीं होगी। विरल अचार्य ने आरबीआई की स्वायत्तता को लेकर चिंता जाहिर की थी।

अखबार के मुताबिक अगले साल सितंबर में उर्जित पटेल के तीन साल का कार्यकाल पूरा हो रहा है। लेकिन पटेल के सेवा विस्तार की बात तो दूर की है उनके बाकी के कार्यकाल पर भी सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि केवल 2018 में ही कम से कम आधे दर्जन नीतिगत मसलों पर मतभेद उभरकर सामने आए। अखबार के मुताबिक उर्जित से मोदी सरकार की नाराजगी ब्याज दरों में कटौती नहीं किए जाने को लेकर भी रही है।

अखबार के मुताबिक केंद्र सरकार की नाराजगी की शुरुआत तब हुई, जब आरबीआई ने न सिर्फ मुख्य ब्याज दरों में कटौती करने से इनकार कर दिया, बल्कि उसे और बढ़ा दिया। इसके बाद 12 फरवरी को आरबीआई ने नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) और लोन रीस्ट्रक्चरिंग के नए नियम को लेकर सर्कुलर जारी किया। केंद्रीय बैंक के इस कदम से सरकार आग बबूला हो गई।

कहा जा रहा है कि वर्तमान हालात का असर उर्जित पटेल के भविष्य पर भी पड़ेंगे। नीरव मोदी के धोखाधड़ी मामले पर भी बैंक और सरकार के बीच स्थिति तनावपूर्ण है। वहीं 2018 की शुरुआत से ही करीब आधे दर्जन मुद्दों पर बैंक और सरकार के बीच मतभेद हैं। पटेल चाहते हैं कि सरकारी बैंकों पर नजर रखने के लिए आरबीआई को और शक्तिशाली बनाना चाहिए।

TOI की रिपोर्ट के मुताबिक, आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य द्वारा शुक्रवार को अपने बयान में केंद्रीय बैंक के कामकाज में केंद्र सरकार के हस्तक्षेप तथा उसकी स्वायत्तता के खतरे की ओर इशारे ने आग में घी डालने का काम किया। बात यहां तक पहुंच चुकी है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के ही कुछ लोग कहने लगे हैं, ‘इनसे तो रघुराम राजन ही बेहतर थे।’ हालांकि पटेल ने इस मामले पर टाइम्स ऑफ इंडिया के मेसेज का कोई जवाब नहीं दिया।

उर्जित पटेल को तलब किया गया

इस बीच संसद की एक समिति ने आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल को सरकार के नोटबंदी के कदम के बारे में जानकारी लेने के लिए तीसरी बार तलब किया है। इस समिति में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी सदस्य हैं। वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली वित्त मामलों की स्थायी संसदीय समिति लगभग दो सालों से इस मुद्दे पर मंथन कर रही है। समिति में 31 सदस्य हैं। आपको बता दें कि सरकार ने 8 नवंबर 2016 को 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद कर नए 500 और 2000 के नोट जारी करने की घोषणा की थी।

समिति की बैठक के नोटिस के मुताबिक पटेल को 12 नवंबर को 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद करने और ‘इसके प्रभावों’ के बारे में समिति के सदस्यों को जानकारी देने के लिए तलब किया है। आरबीआई के गवर्नर अविनियमित जमा योजना विधेयक को प्रतिबंधित करने और संबंधित मुद्दों पर भी समिति को जानकारी देंगे।

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक संपर्क किए जाने पर मोइली ने कहा, ‘सदस्य नोटबंदी और खास तौर पर इसके प्रभावों को लेकर कुछ और जानकारी और विवरण चाहते थे। इसलिए आरबीआई गवर्नर को बुलाया गया है।’ उन्होंने कहा कि संभवत: यह पहला मौका है जब आरबीआई गवर्नर को एक ही मुद्दे पर समिति द्वारा तीन बार बुलाया गया हो।

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