CBIVsCBI LIVE: आलोक वर्मा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश- ‘जज की निगरानी में 2 हफ्ते में जांच पूरी करे सीवीसी’

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इस समय देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) खुद सवालों के घेरे में आ गई है। सीबीआई के दो सीनियर अधिकारी एक दूसरे के ऊपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। सीबीआई में आतंरिक कलह के मद्देनजर मोदी सरकार ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए सीबीआई निदेशक आलोक कुमार वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया है। वहीं संयुक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को तत्काल प्रभाव से अंतरिम निदेशक नियुक्त कर दिया है। ओडिशा कैडर के 1986 बैच के आईपीएस अधिकारी राव ने मंगलवार रात ही पदभार संभाल लिया।

सीबीआई के अंदरखाने की यह लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट के दर पर पहुंच चुकी है। केंद्र के इस कदम के खिलाफ सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस की बेंच ने शुक्रवार को अपना फैसला सुना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने ताजा विवाद पर केंद्र सरकार को नोटिस भेजते हुए कहा कि सीवीसी इस मामले की जांच दो हफ्तों के भीतर पूरी करे। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने सीवीसी से अपनी जांच अगले दो हफ्ते में पूरी करने को कहा है। इस मामले में अगली सुनवाई 12 नवंबर को होगी।

देखिए, लाइव अपडेट्स:- 

  • इस मामले में अगली सुनवाई 12 नवंबर को होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बतौर अंतरिम सीबीआई डायरेक्टर एम नागेश्वर राव ने अब तक जो भी फैसले लिए हैं और ट्रांसफर किए हैं उसे सीलबंद लिफाफे में पेश किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बतौर अंतरिम सीबीआई डायरेक्टर एम नागेश्वर राव ने अब तक जो भी फैसले लिए हैं और ट्रांसफर किए हैं उसे सीलबंद लिफाफे में पेश किया जाए।
  • सीबीआई मामले में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि वह इस मामले को देखेंगे, उन्होंने सीवीसी से अपनी जांच अगले 2 हफ्ते में पूरी करने के लिए कहा है, यह जांच सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज एके पटनायक की निगरानी में होगी।
  • सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने CVC के लिए आलोक वर्मा के खिलाफ जांच करने की अवधि को 10 दिन से बढ़ाकर 15 दिन (12 नवंबर) किया, जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दोबारा सुनवाई नहीं कर लेता तब तक अंतरिम सीबीआई डायरेक्टर एम नागेश्वर किसी भी तरह का नीतिगत फैसला नहीं ले सकेंगे।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना मामले में 10 दिन के भीतर CVC जांच पूरी करे, इस बीच नागेश्वर राव कोई नीतिगत फैसला नहीं लेंगे

‘सीबीआई प्रमुख के खिलाफ सीवीसी दो सप्ताह में जांच पूरी करे’

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को केन्द्रीय सतर्कता आयोग को निर्देश दिया कि केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक आलोक वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच दो सप्ताह के भीतर पूरी की जाये। यह जांच उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ए के पटनायक की निगरानी में होगी। आलोक वर्मा ने ब्यूरो निदेशक के अधिकार उनसे वापस लेने, उन्हें अवकाश पर भेजने और ब्यूरो प्रमुख की जिम्मेदारी संयुक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को सौंपने के आदेश को न्यायालय में चुनौती दी है।

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ ने कहा कि 23 अक्टूबर से नागेश्वर राव द्वारा लिये गये निर्णय लागू नहीं होंगे। साथ ही पीठ ने स्पष्ट किया कि राव जांच एजेन्सी के कामकाज से संबंधित रोजमर्रा का काम करते रहेंगे और उनके द्वारा लिये गये फैसले सीलबंद लिफाफे में उसके समक्ष पेश किये जायेंगे।

इस बीच, सभी अधिकारों से वंचित करने के साथ ही छुट्टी पर भेजे गये विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने भी न्यायालय में अलग से याचिका दायर की है। पीठ ने कहा कि आलोक वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए के पटनायक की देखरेख में केन्द्रीय सतर्कता आयोग करेगा और यह ‘एक बार का अपवाद’ है।

इसके साथ ही पीठ ने आलेक वर्मा की याचिका पर केन्द्र और केन्द्रीय सतर्कत आयोग को नोटिस जारी किये। पीठ ने अस्थाना सहित जांच ब्यूरो के अधिकारियों के खिलाफ विशेष जांच दल से जांच कराने के लिये गैर सरकारी संगठन कामन काज और राकेश अस्थाना की याचिका पर भी विचार किया।

न्यायालय ने गैर सरकारी संगठन की याचिका पर केन्द्र, सीबीआई, सीवीसी, अस्थाना, वर्मा और राव को नोटिस जारी किये। इन सभी को 12 नवंबर तक नोटिस के जवाब देने हैं। सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि वह सारे मामले पर गौर करेंगे और केन्द्रीय सतर्कता आयोग की जांच शीर्ष अदालत के पीठासनी न्यायाधीश की निगरानी में दस दिन के भीतर पूरी हो जानी चाहिए।

पीठ ने कहा, ‘‘हम दस दिन के भीतर प्रारंभिक जांच रिपोर्ट देखना चाहते हैं ताकि यह निर्णय किया जा सके कि क्या इसमें आगे जांच की आवश्यकता है।’’ सीवीसी की ओर से सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि आयोग में जांच करने की प्रक्रिया चल रही है और बड़ी संख्या में दस्तावेज होने की वजह से जांच पूरी करने के लिये दस दिन का वक्त् पर्याप्त नहीं होगा। उन्होंने कहा, ‘‘हमें जांच के लिये उचित और तर्कसंगत समय मिलना चाहिए।’’

इस पर पीठ ने कहा, ‘‘ठीक है, तो फिर 240 घंटे। हम इसे लंबा नहीं खींचना चाहते। यह देश के हित में नहीं है। हमें विश्वास है कि सीवीसी इसे कर लेगा।’’ हालांकि बाद में न्यायालय इस मामले की जांच पूरी करने के लिये केन्द्रीय जांच आयोग को दो सप्ताह का वक्त देने के लिये तैयार हो गया। मेहता ने यह भी अनुरोध किया कि फिलहाल शीर्ष अदालत इस मामले पर सिर्फ सीवीसी द्वारा ही गौर करने पर विचार कर सकता है।

इस मामले में सुनवाई शुरू होते ही वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरिमन ने कहा कि प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और प्रधान न्यायाधीश की सदस्यता वाली चयन समिति ने जांच ब्यूरो निदेशक की नियुक्ति दो साल के लिये की थी। नरिमन ने कहा, ‘‘सवाल यह है कि क्या किसी भी समय उनका कार्यकाम बाधित किया जा सकता है?’’ उनहोंने विनीत नारायण मामले में शीर्ष अदालत के 1997 के फैसले और दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेबलिशमेन्ट कानून में संशोधन का भी जिक्र किया। इसी कानून के तहत सीबीआई का सृजन हुआ है।

उन्होंने वर्मा से सारे अधिकार वापस लेने के सीवीसी का जिक्र करते हुये कहा कि केन्द्र ने भी उसी दिन एक आदेश पारित करके एक अन्य अधिकारी को जांच ब्यूरो के मुखिया के कामकाज के लिये नियुक्त कर दिया। पीठ ने शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में सीवीसी की जांच का आदेश देते हुये कहा कि इस मामले के महत्व को देखते हुये और किसी भी सांविधानिक या विधायी प्राधिकारी पर बगैर किसी आक्षेप के ऐसा किया जा रहा है।

शीर्ष अदालत ने न्यायमूर्ति पटनायक से अनुरोध किया कि वह यह सुनिश्चित करें कि सीवीसी की इस जांच को समय से पूरी हो। अस्थाना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने पीठ से कहा कि उन्होंने भी इस मामले में न्यायालय में याचिका दायर की है। इस पर पीठ ने कहा, ‘‘हम ऐसे किसी मामले की सुनवाई नहीं कर सकते जो हमारे समक्ष नहीं है।’’ रोहतगी ने पीठ से कहा कि अस्थाना की याचिका पर भी 29 अक्तूबर को सुनवाई की जाये। उन्होंने यह भी कहा कि अस्थाना को गैर सरकारी संगठन की याचिका में प्रतिवादी बनाया गया है।

आलोक वर्मा के समर्थन में आया विपक्ष

सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को पद से हटाए जाने को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि यह फैसला “राफेल फोबिया” के कारण लिया गया, क्योंकि वह (आलोक वर्मा) राफेल विमान सौदे से जुड़े कागजात एकत्र कर रहे थे। कांग्रेस ने सीबीआई के निदेशक को छुट्टी पर भेजे जाने को एजेंसी की स्वतंत्रता खत्म करने की अंतिम कवायद बताया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हुए कहा कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को अनिश्चितकालीन छुट्टी पर जाने के लिए बाध्य करना ‘‘अवैध’’ है।

इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सरकार इस बात से डर गई थी कि वह राफेल विमान सौदे की जांच कर सकते हैं। राहुल ने दावा किया कि वर्मा को हटाना संविधान, देश के प्रधान न्यायाधीश और नेता प्रतिपक्ष का ‘‘अपमान’’ है। उन्होंने कहा कि यह कदम ‘अवैध’ है। कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री पर हमला तेज करते हुए कहा कि उन्होंने आधी रात को घबराकर वर्मा को इसलिए हटा दिया क्योंकि वह विवादास्पद राफेल सौदे में जांच शुरू करने वाले थे जो कि मोदी के लिए ‘आत्मघाती’ साबित होता।

उन्होंने कहा, “मुख्य वजह यह थी कि सीबीआई प्रधानमंत्री की भूमिका और राफेल सौदे में उनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार की जांच शुरू करने वाली थी। इस घबराहट से रात में 2 बजे, उन्होंने सीबीआई निदेशक को हटा दिया। अगर जांच का आदेश दे दिया जाता तो सच्चाई बाहर आ जाती और देश को पता लग जाता कि प्रधानमंत्री ने राफेल मामले में भ्रष्टाचार किया है।” उधर, केंद्र सरकार ने इस कार्रवाई का बचाव करते हुए इसे ‘अपरिहार्य’ बताया। सरकार ने दलील दी है कि सीबीआई के संस्थागत स्वरूप को बरकरार रखने के लिए यह कार्रवाई जरूरी थी।

क्या है मामला?

आपको बता दें कि आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच पिछले कुछ दिनाें से आरोप-प्रत्यारोंपों का सिलसिला चल रहा था। वर्मा और अस्थाना के तल्ख रिश्तों की शुरुआत पिछले साल अक्टूबर में तब हुई जब सीबीआई डायरेक्टर ने अस्थाना को स्पेशल डायरेक्टर प्रमोट किए जाने पर आपत्ति जताई। अस्थाना ने बाद में वर्मा के खिलाफ मीट कारोबारी मोइन कुरैशी के सहयोगी सतीश बाबू सना से 2 करोड़ रुपये लेने का आरोप लगाया।

उधर, इस विवाद में उस समय नया मोड आया जब 15 अक्टूबर को सीबीआई ने अपने ही विशेष निदेशक अस्थाना, उप अधीक्षक देवेंद्र कुमार तथा कुछ अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली। अस्थाना पर मांस कारोबारी मोइन कुरैशी के मामले के सिलसिले में तीन करोड़ रुपये रिश्वत लेने का आरोप है। कथित रिश्वत देने वाले सतीश सना के बयान पर यह केस दर्ज किया गया था। FIR में अस्थाना पर उसी सतीश बाबू सना से 3 करोड़ रुपये रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया, जिसका आरोप वह वर्मा पर लगा रहे थे।

इसके 4 दिनों बाद अस्थाना ने केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को खत लिखकर सीबीआई डायरेक्टर वर्मा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। सना रिश्वतखोरी के एक अलग मामले में जांच का सामना कर रहा है, जिसमें मांस कारोबारी मोइन कुरैशी की कथित संलिप्तता है। सीबीआई के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि इसके दो सबसे बड़े अधिकारी कलह में उलझे हैं।

अस्थाना ने प्राथमिकी दर्ज किए जाने के खिलाफ गत दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है जहां से उन्हें 29 अक्टूबर को अगली सुनवाई तक किसी तरह की कार्रवाई से राहत मिल गई। वहीं, देवेंद्र कुमार को सीबीआई ने मंगलवार को गिरफ्तार कर लिया था। जांच एजेंसी में चल रहे आंतरिक कलह के कारण उस पर उठ रहे सवालों को देखते हुए उसकी साख बरकरार रखने के लिए सरकार ने मंगलवार रात अभूतपूर्व कदम उठाते हुए वर्मा और अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया।

 

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