सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: समलैंगिकता संबंध अब अपराध नहीं, कोर्ट ने धारा 377 को असंवैधानिक करार दिया

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समलैंगिकता को अपराध मानने वाली आइपीसी की धारा 377 की वैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (6 सितंबर) को ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि दो बालिगों में सहमति से बनाए गए संबंध अपराध नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को अवैध करार दे दिया है। बता दें कि आईपीसी की धारा-377 के तहत समलैंगिकता को अपराध माना गया था।

(Indian Express file photo by Partha Paul)

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने गुरूवार को एकमत से 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के उस हिस्से को निरस्त कर दिया, जिसके तहत परस्पर सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध बनाना अपराध था। न्यायालय ने कहा कि यह प्रावधान संविधान में प्रदत्त समता के अधिकार का उल्लंघन करता है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने परस्पर सहमति से स्थापित अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध के दायरे में रखने वाले, धारा 377 के हिस्से को तर्कहीन, सरासर मनमाना और बचाव नहीं करने योग्य करार दिया।

संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा शामिल हैं। संविधान पीठ ने धारा 377 को आंशिक रूप से निरस्त करते हुये कहा कि इससे संविधान में प्रदत्त समता के अधिकार और गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन होता है। न्यायालय ने कहा कि जहां तक एकांत में परस्पर सहमति से अप्राकृतिक यौन कृत्य का संबंध है तो यह न तो नुकसानदेह है और न ही समाज के लिये संक्रामक है।

पीठ ने चार अलग अलग परंतु परस्पर सहमति के फैसले सुनाये। इस व्यवस्था में शीर्ष अदालत ने 2013 में सुरेश कौशल प्रकरण में दी गयी अपनी ही व्यवस्था निरस्त कर दी। सुरेश कौशल के मामले में शीर्ष अदालत ने समलैंगिक यौन संबंधों को पुन: अपराध की श्रेणी में शामिल कर दिया था। शीर्ष अदालत ने हालांकि अपनी व्यवस्था में कहा कि धारा 377 में प्रदत्त, पशुओं और बच्चों से संबंधित अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करने को अपराध की श्रेणी में रखने वाले प्रावधान यथावत रहेंगे।

परेशान करने का हथियार था धारा 377

न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 एलजीबीटी के सदस्यों को परेशान करने का हथियार था, जिसके कारण इससे भेदभाव होता है। धारा 377 ‘अप्राकृतिक अपराधों’ से संबंधित है और इसमें कहा गया है कि जो कोई भी स्वेच्छा से प्राकृतिक व्यवस्था के विपरीत किसी पुरूष, महिला या पशु के साथ गुदा मैथुन करता है तो उसे उम्र कैद या फिर एक निश्चित अवधि के लिये कैद जो 10 साल तक बढ़ाई जा सकती है, की सजा होगी और उसे जुर्माना भी देना होगा।

शीर्ष अदालत ने हालांकि अपनी व्यवस्था में कहा कि धारा 377 में प्रदत्त पशुओं ओर बच्चों से संबंधित अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करने को अपराध की श्रेणी में रखने वाले प्रावधान यथावत रहेंगे। न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 एलजीबीटी के सदस्यों को परेशान करने का हथियार था, जिसके कारण इससे भेदभाव होता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि एलजीबीटी समुदाय को अन्य नागरिकों की तरह समान मानवीय और मौलिक अधिकार हैं।

अदालतों को व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि गरिमा के साथ जीने के अधिकार को मौलिक अधिकार के तौर पर मान्यता दी गई है। यौन रुझान को जैविक स्थिति बताते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा कि सरकार, मीडिया को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का व्यापक प्रचार करना चाहिए ताकि एलजीबीटीक्यू समुदाय को भेदभाव का सामना नहीं करना पड़े।

संविधान पीठ ने नृत्यांगना नवतेज जौहर, पत्रकार सुनील मेहरा, शेफ ऋतु डालमिया, होटल कारोबारी अमन नाथ और केशव सूरी, व्यावसायी आयशा कपूर और आईआईटी के 20 पूर्व तथा मौजूदा छात्रों की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। इन सभी ने दो वयस्कों द्वारा परस्पर सहमति से समलैंगिक यौन संबंध स्थापित करने को अपराध के दायरे से बाहर रखने का अनुरोध करते हुये धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी।

2013 में समलैंगिकता को कोर्ट ने माना था अपराध

समलैंगिक यौन संबंधों का मुद्दा पहली बार गैर सरकारी संगठन नाज फाउण्डेशन ने 2001 में दिल्ली हाई कोर्ट में उठाया था। हाई कोर्ट ने 2009 में अपने फैसले में धारा 377 के प्रावधान को गैरकानूनी करार देते हुए ऐसे रिश्तों को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था। हाई कोर्ट के इस फैसले को 11 दिसंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया था। इसके बाद शीर्ष अदालत ने अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिये दायर याचिका भी खारिज कर दी थी। हालांकि, शीर्ष अदालत में इस फैसले को लेकर दायर सुधारात्मक याचिकाएं अभी भी लंबित हैं।

क्या है धारा 377?

आईपीसी की धारा 377 के अनुसार यदि कोई वयस्‍क स्वेच्छा से किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करता है तो, वह आजीवन कारावास या 10 वर्ष और जुर्माने से भी दंडित हो सकता है। समलैंगिकों को एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) भी कहा जाता है, जिसमें- लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर्स और क्वीर शामिल हैं। धारा 377 अप्राकृतिक यौन संबंधों को गैर-कानूनी बताती है।

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