नोटबंदी: कैश न होने के कारण धान देकर चुकाई बच्चों की फीस

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मध्यप्रदेश के ग्वालियर में किसान कैश की कमी के कारण अपने बच्चों की स्कूल की फीस नहीं दे पा रहे थे। उन्होंने फीस के तौर पर 45 क्विंटल धान स्कूल में जमा कराया। इसे स्कूल मैनेजमेंट ने स्वीकार कर लिया है। स्कूल ने मंडी में खुद से धान बेचा और 58,500 रुपये का चेक प्राप्त कर लिया है।

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गधौटा गांव में एक निजी स्कूल में पढ़ रहे बच्चों की फीस जमा नहीं हो पा रही थी। फीस मांगे जाने पर एक ही जवाब मिल रहा था कि नए नोट मिल ही नहीं रहे, तो फीस कहां से जमा करें। प्रबंधन के बार-बार तगादा करने से 15 बच्चों के पालकों ने प्रस्ताव रखा कि बच्चों की एक साल की फीस जितनी बनती है, उतनी कीमत का धान ले लो।

इस प्रस्ताव को स्कूल संचालक ने मान लिया इन बच्चों की एक साल की फीस के बदले 45 क्विंटल धान ले लिया। स्कूल संचालक शुक्रवार को इस धान को ट्रैक्टर-ट्रॉली से कृषि उपज मंडी ले गए और वहां बेच दिया। हर कोई इस कदम की तारीफ कर रहा है।

विकासखंड के गधौटा पंचायत में स्थित एमएलबी प्राइमरी स्कूल में एलकेजी से कक्षा 5वीं तक 125 बच्चे पढ़ते हैं। इनमें 35 बच्चों की कई माह की फीस बकाया है।

शुरुआत में उन लोगों को लगा कि वह फसल बेचने मंडी में जाएंगे को पैसे मिल जाएंगे। लेकिन मंडी से उन्हें पैसों के बदले चैक मिला। वे चैक लेकर बैंक पहुंचे तो वहां काफी भीड़ थी।

मीडिया रिपोट्स के अनुसार, स्कूल के डायरेक्टर ने भी बात की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि कुछ किसानों ने फीस के पैसों के बदले धान देने की बात कही थी। उन्होंने बताया कि स्कूल की फीस 300 रुपए प्रति महीना है और 300 रुपए पेपर की फीस है। ऐसे करके प्रति बच्चे की 3,900 रुपए फीस बकाया थी।

इनमें से कई किसानों के पास बैंक खाते नहीं हैं। उन्हें पता चला कि मंडी में फसल बेचने पर भी उन्हें कैश नहीं चेक मिलेगा। किसान मदनलाल जाटव ने बताया कि मेरा बेटा केजी में पढ़ता है। नोटबंदी के कारण हम उसकी फीस नहीं जमा कर पा रहे थे।

ऐसे में मंडी में फसल बेचकर चेक लेना और फिर बैंक की लंबी लाइनों में लगकर कैश मिलने का इंतजार करना चुनौतीपूर्ण था इसलिए हमने स्कूल से बातकर धान देने का फैसला किया।

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