सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद HC के फैसले को रखा बरकरार, टोल फ्री रहेगा डीएनडी

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सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले पर बरकरार रखा है जिसमें दिल्ली-नोएडा-दिल्ली (डीएनडी) पर रोक लगाने से फिलहाल इनकार कर दिया है। डीएनडी को टोल फ्री करने वाले हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

कंपनी ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ बृहस्पतिवार को ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी थी। इतना ही नहीं कंपनी ने कोर्ट से मामले पर जल्द सुनवाई की भी गुहार लगाई थी। इसे स्वीकार करते हुए कोर्ट ने सुनवाई की रजामंदी दे दी थी।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुधवार को जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए डीएनडी फ्लाईओवर पर तत्काल प्रभाव से टोल टैक्स वसूलने पर रोक लगा दी थी। कंपनी ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा है कि हाई कोर्ट ने लागत की गणना ठीक से नहीं की है।

गुरुवार को याचिका दाखिल करने के साथ ही सुबह कंपनी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने न्यायमूर्ति एआर दवे की पीठ के समय मामले का जिक्र करते हुए शीघ्र सुनवाई की मांग की। इस बीच मौलिक भारत संस्था के सदस्य कैप्टन विकास गुप्ता ने भी सुप्रीम कोर्ट में कैवियेट दाखिल कर दी ताकि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई भी फैसला सुनाने से पहले उनका भी पक्ष सुने।

दोपहर में मामला जब फिर सुनवाई पर आया तो कंपनी के वकील ने कुछ दस्तावेज दाखिल करने की बात कहते हुए कोर्ट से मामले पर शुक्रवार को सुनवाई करने का अनुरोध किया जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ सुनवाई करेगी।

हाई कोर्ट ने डीएनडी फ्लाईओवर पर टोल वसूली पर तत्काल रोक लगाने का आदेश देते हुए अपने फैसले में कहा था कि यह समझ से परे है कि कंपनी किस तरह से लागत की गणना कर रही है। इसमें वसूली जारी रहने के बाद फ्लाईओवर की लागत राशि बढ़ती जा रही है।

कोर्ट ने कंपनी को करार में छूट देने को अनुचित और गलत ठहराया था। कोर्ट ने कहा था कि ये कानून के विपरीत और लोकनीति के खिलाफ है।

ज्ञात हो कि नोएडा अथॉरिटी व नोएडा टोल ब्रिज कंपनी के बीच डीएनडी फ्लाई ओवर बनाने का करार हुआ था। बाद में करार में संशोधन कर कंपनी को छूट दी गई और कहा गया कि पूरी लागत वसूली तक कंपनी टोल वसूल सकेगी। इसकी मियाद एक अप्रैल 2031 तक होगी।

फ्लाईओवर की शुरुआती लागत लगभग साढ़े चार सौ करोड़ आई थी। 31 मार्च 2011 तक यह लागत 2168 करोड़ पहुंच गयी। यह करार हुआ कि कंपनी एक अप्रैल 2031 तक टोल वसूली करने के बाद फ्लाई ओवर नोएडा अथारिटी को स्थानांतरित कर देगी।

यह भी शर्त लगाई गई कि यदि नोएडा मनमाने ढंग से बीच में करार रद करता है तो वह कंपनी को 2168 करोड़ प्रोजेक्ट लागत का भुगतान करेगा। साथ ही यदि कंपनी एक अप्रैल 2031 तक 2168 करोड़ की वसूली नहीं कर पाती तो शेष बची राशि का भुगतान नोएडा प्राधिकरण टोल ब्रिज कंपनी को करेगा।

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