RTI के तहत बैंकों की वार्षिक रिपोर्ट की जानकारी देने का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाते हुए RBI को दिया अंतिम मौका

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सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को शुक्रवार (26 अप्रैल) को निर्देश दिया कि सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत यदि बैंकों को कोई छूट प्राप्त नहीं हो तो इस कानून के अंतर्गत उनकी वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट से जुड़ी जानकारी मुहैया कराई जाए। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ ने रिजर्व बैंक को सूचना के अधिकार कानून के तहत सूचना मुहैया कराने की अपनी नीति की समीक्षा करने का भी निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि कानून के तहत वह ऐसा करने के लिये बाध्य हैं।

(Reuters)

हालांकि, पीठ ने रिजर्व बैंक के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही नहीं की, लेकिन उसने स्पष्ट किया कि वह सूचना के अधिकार कानून के प्रावधानों का पालन करने के लिए उसे अंतिम अवसर दे रही है। पीठ ने कहा कि अगर रिजर्व बैंक ने अब सूचना के अधिकार कानून के तहत जानकारी उपलब्ध कराने से इंकार किया तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा। पीठ ने कहा, ‘‘किसी भी तरह के उल्लंघन को गंभीरता से लिया जाएगा।’’

इस साल जनवरी में शीर्ष अदालत ने सूचना के अधिकार कानून के तहत बैंकों की वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट का खुलासा नहीं करने के लिए रिजर्व बैंक को अवमानना नोटिस जारी किया था। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय सूचना आयोग ने कहा था कि आरबीआई तब तक पारदर्शिता कानून के तहत मांगी गई सूचना देने से इनकार नहीं कर सकता, जब तक कि उसे कानून के तहत खुलासे से छूट ना प्राप्त हो।

रिजर्व बैंक ने अपने बचाव में कहा था कि वह अपेक्षित सूचना की जानकारी नहीं दे सकता क्योंकि बैंक की वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट में ‘‘न्यासीय’’ जानकारी निहित है। न्यायालय रिजर्व बैंक के खिलाफ सूचना के अधिकार कार्यकर्ता एस सी अग्रवाल की अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रहा था। अग्रवाल ने नियमों का उल्लंघन करने वाले बैंकों पर लगाये गये जुर्माने से संबंधित दस्तावेजों सहित रिजर्व बैंक से इस बारे में पूरी जानकारी मांगी थी।

उन्होंने उन बैंकों की सूची भी मांगी थी जिन पर जुर्माना लगाने से पहले रिजर्व बैंक ने कारण बताओ नोटिस जारी किए थे।इस तरह की जानकारी का खुलाासा करने के बारे में शीर्ष अदालत के फैसले के बावजूद रिजर्व बैंक ने ‘‘खुलासा करने की नीति’’ जारी की थी जिासके तहत उसने कुछ जानकारियों को सूचना के अधिकार कानून के दायरे से बाहर रखा था। रिजर्व बैंक ने आर्थिक हितों के आधार पर ऐसी जानकारी देने से इंकार कर दिया था।

शीर्ष अदालत ने 2015 में अपने फैसले में कहा था कि रिजर्व बैंक को उन बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी चाहिए जो गलत कारोबारी आचरण अपना रहे हैं। न्यायालय ने यह भी कहा था कि सूचना के अधिकार कानून के तहत इस तरह की जानकारी रोकी नहीं जा सकती है। (इनपुट- भाषा के साथ)

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