संजीव भट्ट का सनसनीखेज फेसबुक पोस्ट, एक महिला पत्रकार पर लगाया गुजरात दंगों में मोदी के खिलाफ केस कमजोर करने का आरोप

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गुजरात के पूर्व IPS अधिकारी संजीव भट्ट ने बेहद सनसनीखेज तरीके से आरोप लगाते हुए अपनी पुस्तक में बताया कि कैसे 2002 में गुजरात के नरसंहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को कम करने में एक खोजी पत्रकार की भूमिका थी।

संजीव भट्ट

भट्ट ने अपने फेसबुक पोस्ट में ‘गुजरात की एक छोटी सी ज्ञात कहानी’ शीर्षक से लिखा, सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति पर CBI जांच चरम पर थीं, जिसने तबके तत्कालीन गृहमंत्री और तत्कालीन मुख्यमंत्री (नरेंद्र मोदी) के भाग्य को अधर में लटका दिया था।

उस कहानी की तलाश में एक युवा खोजी पत्रकार ने अपनी पत्रिका के लिए पुलिस और CBI की छानबीन को कवर करने की जिम्मेदारी ली, जो उसे बाद में उसे बेचनी थी। इसके लिए वह अहमदाबाद आई और पुलिस व CBI के टेपिंग स्रोतों को जानने का प्रयास किया। दुर्भाग्य से उसे राज्य पुलिस या CBI की जानकारी बहुत सहज ही नहीं मिल गई।

भट्ट ने कहा कि पत्रकार ने जानकारी जुटाने की खातिर अहमदाबाद स्थित वकील कार्यकर्ताओं के साथ अपने भाग्य को आजमाने की कोशिश की, जो अदालत में फर्जी मुठभेड़ मामले में छानबीन कर रहे थे।

गुजरात नरसंहार से जुड़े तथ्यों को उजागर करने के इस मामले में वकील कार्यकर्ता पत्रकार के आकर्षण में आ गए और उन्होंने कई सारी जानकारियों को साझा किया जिससे एक कहानी ने आकार लेना शुरू कर दिया।

इसके अलावा दो IPS अधिकारी भी इस युवा पत्रकार की और आकर्षित हो गए थे जिसके बाद इन लोगों की अनिवार्य रूप से बैठके होने लगी। इन सभी बैठकों में सूचनाएं आसानी से मिलने लगी। इस मामले में पत्रिका ने अपनी कहानी जारी रखी ये यह युवा प्रेमी जोड़े अच्छे तरह से अपना समय व्यतीत कर रहे थे।

हालांकि, भट्ट के अनुसार, पत्रकार और अधिकारी इस बात से अनजान थे कि गेस्ट हाउस जहां वह कथित तौर पर मिलते हैं, वे राज्य सरकार और एजेंसियों के लिए गड़बड़ी कर रहे थे।

आगे इस पर भट्ट लिखते है कि लेकिन दो प्रेमियों को उस समय पता था कि सरकारी गेस्ट हाउस में बैठकों के दौरान जहां वह अपने कामुक प्रेमालाप को भी अंजाम दिया करते थे और सावधानी पूर्वक गड़बड़ कर रहे थे, पर अब नज़र रखी जाने लगी थी। जो दस्तावेज, जानकारियां, आकंड़े, वीडियो इन बैठकों में प्रेम लीलाओं को विस्तार देते हुए जुटाए गए थे अब नज़र में आने लगे थे। शिकारी अचानक शिकार बन गया था और सौदा खत्म होने जा रहा था।

यह जांच पटरी से उतर गई थी। मुठभेड़ मामले अब कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी। सीबीआई तक यह बातें पहुंच चुकी थी। आईपीएस अधिकारी को जांच से हटा दिया गया था और वापस उनके माता पिता के पास अपने राज्य में भेज दिया गया था। लेकिन इस मामले में यह बड़ा नुकसान हो चुका था। जिसकी भरपाई नहीं हो सकती थी।

आगे भट्ट ने लिखा कि युवा पत्रकार को एक विकल्प दिया गया था अधिकारी के साथ शर्मनाक चेहरा या वकील कार्यकर्ता के प्रयासों को उखाड़ने में मदद। पत्रकार ने बाद वाले विकल्प को चुना। फिर प्लान तरीके से वकील कार्यकर्ताओं पर गंदगी उछालने के लिए पत्रकार का इस्तेमाल किया गया।

कपटपूर्ण तरह से चालाकी के साथ वकील कार्यकर्ता पर गंदगी उछाली गई। यहीं वकील कार्यकर्ता 2002 के दंगों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को फाॅलो कर रहे थे जो जांच में साथ चल रहा था। लेकिन इसके बाद वकील कार्यकर्ताओं को आयोग की कार्यवाही से पूरी तरह हटा दिया गया जो असहाय पीड़ितों के लिए के लिए आगे आए थे और लड़ रहे थे।

गुजरात नरसंहार में, अनधिकृत रूप से 4,000 से अधिक लोग मारे गए जबकि मारे गए लोगों की आधिकारिक संख्या 1200 थी, जिसमें ज्यादातर मुसलमान थे। इस मामले में मोदी को भी एक आरोपी बनाया गया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक एसआईटी ने बाद में इस मामले में उन्हें निर्दोष बताया।

आर के राघवन जो SIT की अध्यक्षता कर रहे थे को बाद में Cyprus का राजदूत बना दिया गया था। इसके अलावा एक अन्य आईपीएस अधिकारी, जो एससीआई के एक सदस्य थे वाईसी मोदी को हाल ही में एनआईए का प्रमुख नियुक्त किया गया जो आतंकवाद के मामलों की जांच करने वाली एजेंसी हैं।

भट्ट ने लिखा, युवा पत्रकार ने गुजरात में पत्रकारिता के शोषण का एक आकर्षक और काल्पनिक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया था। लेकिन गुजरात नरसंहार में तत्कालीन मुख्यमंत्री की भूमिका पर विशेष गौर करने और सहयोगी तरीका अपनाने के बदले उनकी पुस्तक को बिना किसी भी बाधा के प्रकाशित और प्रचारित करने की अनुमति दी गई थी। क्या गुजरात की राजनीतिक सड़क पर कामयाबी के झंडे गाड़ने वाली आज की लोकप्रिय राजनीतिक जोड़ी का अंत हो सकता था? और युवा पत्रकार-शोधकर्ता का पक्ष जीत में बदल सकता था?

अंत में उन्होंने अपनी पोस्ट को समाप्त करते हुए निष्कर्ष निकाल कि आशा है कि यह आपको कड़िया जोड़ने में इससे मदद मिलेगी।भट्ट ने 2011 में सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे में मोदी पर 2002 के नरसंहार में शामिल होने का आरोप लगाया था। बाद में गुजरात सरकार ने उन्हें सेवा समाप्त होने से पहले ही निलंबित कर दिया था।

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