‘कांटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बां, ये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में’

0

कहां से आए हो भइया? जवाब मिला बिहार से, आगे कहां जाओगे? पंजाब जाने की सोच रहा हूं पर कैसे जाऊंगा पता नहीं बस दिल्ली तक पहुंचने के ही पैसे थे। घर पर (बिहार में) अब भी कोई है? नहीं, ज़मीन थी वो कोसी में दहा गई (बह गई) बुजुर्ग पिता, तीन मासूम बच्चियां और गर्भ में किसी भी वक़्त आने की तैयारी में एक और जान जो बेहद कमजोर औरत की महज़ सांस और पानी के क़तरों के आसरे पल रही थी।मैंने पूछा ऐसी हालत में इन लोगों को आगे कैसे लेकर जाओगे, ले जा पाओगे? जवाब में वो आसमान की तरफ़ यूं देखने लगा जैसे की बहते आंसू शायद ऐसा करने से आंखों के अंदर ही ठहर जाएंगे…पर वो तो सीने में उतर गए और सिसकियों में उमड़ पड़े। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बैठे उस शख्स से मेरे इंटरव्यूह का ये आख़िरी सवाल था इसके बाद मैं उनके लिए जो कर सकती थी किया और वहां से निकल गई।

2008 में कोसी में आई बाढ़ के बाद हज़ारों लोगों ने दिल्ली, पंजाब और देश के दूसरे राज्यों में पलायन किया था उन्हीं पर स्टोरी करने के लिए मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन गई थी स्टोरी तो मिल गई लेकिन मैं कोसी की त्रासदी में दिल्ली आए उस शख़्स के दर्द में बह गई। समझ नहीं आ रहा था स्टोरी कैसे फ़ाइल करूं? ऑफ़िस जाने की बजाए घर का रुख़ किया।

घर पहुंचते-पहुंचते मुझे कॉलोनी के गेट से लेकर उसके पेड़, पत्तों यहां तक की गेट के बाहर बना वो टूटा फूटा चबूतरा भी बहुत अज़ीज़ हो गया जिसपर खेलते हुए हमारा बचपन बीता था। घर पहुंची तो दिल भारी था लग रहा था कि घर की दीवारों को पकड़ कर रो लू। वो दर-ओ-दीवार आज पहले से कहीं ज़्यादा अपने हो गए थे उस शख़्स के घर से बिछड़ने के दर्द ने मुझे मेरे घर को लेकर एक अजीब से डर में धकेल दिया था। मैं इस बात का तसुव्वर भी नहीं कर सकती कि मजबूरी घर भी छुड़वा सकती है।

(Associated Press)

अगली सुबह ऑफ़िस पहुंची और स्टोरी बनाई। स्टोरी बहुत मन से लिखी थी लेकिन जब चली तो मुझमें उस दर्द को सुनने की हिम्मत नहीं थी, मैं ऑफ़िस से बाहर ली गई वापस लौटी तो एक सीनियर ने कहा तुम्हारी स्टोरी बहुत शानदार थी और उसमें ना बोलने वाली बाइट बहुत कुछ बयां कर गई। मैं मुस्कुरा दी और शुक्रिया कह कर बेदिल दुनिया की रवायत को निभाते हुए आगे बढ़ गई।

Also Read:  गुजरात में राहुल गांधी पर हुए हमले को लेकर राजनाथ सिंह ने संसद में दी सफाई

कई साल बीत गए और नौकरी के दौरान जाने क्यों मेरे हिस्से हमेशा दर्द में डूबी ही रिपोर्टिंग आई, मैंने रिपोर्टिंग छोड़ दी और डेस्क पर कॉपी लिखने की कोशिश करने लगी (जो सिलसिला आज भी जारी है) इस दौरान मैंने विदेश की ख़बरों पर पकड़ बनाने की कोशिश की देश के हालत से जी भर गया था सोचा विदेशों में ही कुछ तलाशा जाए (लेकिन मिला नहीं)।

इस दौरान मैंने संजीदगी से सीरिया संकट और इससे जुड़े मुद्दों पर काम किया शरणर्थियों से जुड़े मुद्दों पर लिखा। कभी सीरिया नहीं गई पर दहशत में डूबी तस्वीरों को देखा, पढ़ा, समझा और समझाने की कोशिश की। मेरा सीरिया से महज़ इतना सा नाता था कि मैं उससे जुड़ी स्टोरी पर काम कर रही थी लेकिन इस छोटे से लिंक ने मुझे एक कनेक्शन में पिरो दिया।

दोपहर का वक़्त रहा होगा मैं एपीटीएन( इंटरनेशनल न्यूज़ एजेंसी) की फीड खंगाल रही थी कि तभी मेरी नज़र समंदर पर सवार होकर घर की तलाश में निकले मासूम आयलन कुर्दी की तस्वीर पर पड़ी। तस्वीर देखकर मेरी रूह कांप गई ऐसा लग रहा था कि दिमाग़ की नसें में बह रहा ख़ून जज़्ब हो गया हो। उस वक़्त तक वो तस्वीर किसी भी न्यूज़ चैनल पर नहीं चली थी। मैं उस तस्वीर के दर्द को अपने अल्फ़ाजों में उतारने में नाकाम रही।

Rohingya minority
(AP File Photo)

ऐसा लग रहा था कि मेरे शब्दों ने मुझसे बग़ावत कर दी हो। ऐसा नहीं था कि मैंने कोशिश नहीं की थी पर हर हर्फ़ मुझपर दहाड़ने लगा कहने लगा भले ही इंसानी दुनिया में दर्द को समझने की सलाहियत ख़त्म हो गई हो पर हमारी जमात में अब भी ग़ैरत बाक़ी है। मैंने नालायक कर्मचारी की तरह उस स्टोरी को छोड़ दिया। मुझे डांट पड़ी, मेरे न्यूज़ सेंस को कूड़ा बता दिया गया।

Congress advt 2

आयलन कुर्दी के बाद भी कई तस्वीरें आई जिनमें कहीं रसायनिक हमलों से जूझते मासूमों की उखड़ती सांसे थी तो कहीं स्कूलों के ब्लैकबोर्ड पर बच्चों के मुस्तक़बिल की जगह बारूद से लिखी दहशत की इबारतें। तो कहीं एंबुलेंस में बैठा शून्य सा हो गया ओमार था जो गहरे घाव से रिसते ख़ून को हाथ में देखकर उसे एंबुलेंस की सीट पर पोछने की हिम्मत नहीं जुटा पाया तो ख़ून को अपने ही कपड़े में पोछने लगा।

Also Read:  वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता गौरी लंकेश हत्याकांड की अमेरिका ने की आलोचना

रिफ़्यूज़ियों के इस दर्द ने मुझे ज़िन्दगी को समझने की वो सीख दी जो शायद ही मैं किसी दूसरे पेशे में कमा पाती। सीरिया का दर्द सुर्खियां बना पूरी दुनिया में आईएसआईएस की आलोचना हुई, आंतकवाद से लड़ने की क़समें खाई गईं जिसमें हमारा मुल्क़ भी पहली कतार में खड़ा दिखा।

बिहार में बाढ़ के बाद अपना घर छोड़ने की मजबूरी हो या फिर सीरिया में आसमान से बरसते बारूद से अपने बच्चों के लिए महफूज़ आशियाने की तलाश में निकले आयलन कुर्दी के पिता। हर रिफ़्यूज़ी अपने घर को छोड़ उस रहगुज़र पर दौड़ रहा है जहां उसे सिर पर एक महफ़ूज आसमान नसीब हो जाए। कुछ ऐसे ही दर्द को कांधे पर ढोते हुए रोहिंग्या मुसलमान सिर पर साया तलाश रहे हैं।

बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा के बीच नाफ़ नदी के रास्ते म्यांमार से भागते ये लोग हथेलियों में जान का सरमाया बांधे चांद सी दिखने वाली कश्तियों में सवार हो रहे हैं पर इनमें से कई किनारे तो पहुंचे पर किनारा देख नहीं पाए लहरों पर तैरती उनकी जान दुनिया से किनारा कर गई। हालांकि इस रुख़सती का सही आंकड़ा क्या है कोई नहीं जानता?

(AP)

25 अगस्त के बाद से ही मीडिया में भले ही कम पर सोशल मीडिया पर इन रोहिंग्या मुसलमानों का दर्द फ़्लोट ( तैर) हो रहा है कीचड़ की भांस से ख़ुद को निकालने की जद्दोजहद में धंसते बच्चों से लेकर श्रवण कुमार बने लोग दिख रहे हैं जिनके कंधों पर ज़िन्दगी की आख़िरी मुक़ाम पर खड़े बुजुर्ग अपने वतन से वतन ब्रद होते दिख रहे हैं। हर तस्वीर मुझे थ्री डी लग रही है आंखों में तैरती दहशत, चेहरे पर बेबसी। लाशों को दो गज़ ज़मीन भी मयस्यर नहीं।

बीबीसी की रिपोर्ट पर यकीन करूं तो जो कहानियां या रिपोर्ट सामने आ रही हैं हालात उससे कहीं ज़्यादा ख़तरनाक़ हैं । जलते रखाइन से उठते गुबार में सू ची को ना कुछ दिखाई दे रहा है और ना ही सुनाई। लेकिन सैटेलाइट तस्वीरें बहुत बता रही हैं। कमाल की बात तो ये है इन बेघरों की बेबसी वासुदेव कुटुम्बकम का नारा बुंलद करने वाले हमारे देश को भी नहीं दिख रही बल्कि हमें तो उनमें आंतकी दिखाई दे रहे हैं।

Also Read:  शारीरिक संबंध से लंबे समय के लिए मना करना तलाक का आधार: हाई कोर्ट

वो आतंकी जिनका पेट खाली है। जो बेबस है, पीने के पानी के लिए बिलबिला रहे हैं। वो ना खाना मांग रहे हैं ना पानी महज़ जान बचाने का एक ठिकाने के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं। पर हम ख़ामोश हैं, ये कैसी चुप्पी है जो हमें बेगुनाह बना रही है । ये कैसी ख़ुदगरज़ी है जो हमें रोहिंग्या के साथ मुसलमान लगने पर मदद करने से रोक रही है।

Getty Images

शांति के लिए नोबेल ले लेने से क्या कोई शांति का दूत बन जाता है? शायद इसकी टेक्निकल व्याख्या करने की ज़रूरत है। दिल्ली में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों को मैंने टीवी पर देखा वो ज़ार ज़ार रोते हुए कह रहे थे हम वहां वापस नहीं जाना चाहता अगर भारत ने हमें दोबारा वहां भेजने की कोशिश की तो हम यहीं अपनी जान दे देंगे पर वहां नहीं जाएंगे। तो कोई डबडबाई आंखों से कह रहा था कौन अपने वतन को छोड़कर दर-बदर भटकना चाहता है?

इस टीस को दुनिया में कोई समझे या ना समझे लेकिन भारत को ज़रूर महसूस करना चाहिए क्योंकी जिस देश से ये लोग जान बचाकर भागते फिर रहे हैं कभी उसी जगह भारत के आख़िर मुग़ल बादशाह ने त़ड़पते हुए अपनी सरज़मी के नाम जाने कितने आशार में घर से बिछड़ने के दर्द को रख छोड़ा है इन्हीं में से एक ये भी है-

कांटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बां
ये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार ‘जनता का रिपोर्टर’ के नहीं हैं, तथा ‘जनता का रिपोर्टर’ उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है)

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here