जोकीहाट उपचुनाव: तेजस्वी ने खुद को स्थापित कर नीतीश को सोचने पर किया मजबूर, जानिए क्यों राजद की इस जीत का दिखेगा दूरगामी असर

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बिहार के अररिया जिले में जोकीहाट विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रत्याशी शाहनवाज आलम विजई हुए हैं। राजद उम्मीदवार शाहनवाज आलम ने राज्य में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के जनता दल यूनाईटेड (जदयू) उम्मीदवार मुर्शीद आलम को करीब 40 हजार से अधिक मतों के अंतर से पराजित किया है। यह सीट पहले जदयू के पास थी जिसे राजद ने अब छीन ली है।

वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में जोकीहाट सीट जदयू प्रत्याशी एवं शाहनवाज आलम के बड़े भाई सरफराज आलम ने जीती थी। लेकिन, उनके पिता एवं सांसद मोहम्मद तस्लीमुद्दीन के निधन से अररिया लोकसभा सीट खाली होने के बाद सरफराज आलम ने जदयू विधायक पद से इस्तीफा देकर राजद की टिकट पर उपचुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। सरफराज आलम के लोकसभा चुनाव जीतने के कारण जोकीहाट विधानसभा सीट खाली हुई थी, जिस पर 28 मई को उपचुनाव कराया गया था।

नीतीश को सोचने पर किया मजबूर

यह जीत राजद के लिए बेहद अहम है, क्योंकि यह चुनाव तेजस्वी यादव और पार्टी ने बिना लालू प्रसाद यादव के लड़ा था। हालांकि इससे पहले बिहार के अररिया लोकसभा सीट पर भी हुए उपचुनाव में राजद ने अपना कब्जा बरकरार रखा था। राजद प्रत्याशी सरफराल आलम ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के प्रदीप कुमार सिंह को 61,988 मतों के अंतर से मात दी थी। एक के बाद एक जीत के साथ तेजस्वी यादव ने यह साबित कर दिया है कि वह अब राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हो गए हैं।

साथ ही तेजस्वी ने नीतीश कुमार को इस हार से सबक लेते हुए सोचने पर मजबूर कर दिया है, क्योंकि इस चुनाव में जदयू के साथ पूरा प्रशासनिक कुनबा और बीजेपी के लोग भी थे। अररिया के बाद तेजस्वी ने इस चुनाव में जीत दर्ज कर नीतीश को एक बार फिर बता दिया कि वह अब उन्हें हलके में ना लें। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी का राजनीतिक कद अब लगातार बढ़ने लगा है। वह खुद काफी तेजी से राजनीति में अपनी पहचान बनाने में कामयाबी हासिल कर रहे हैं।

बीजेपी के लोगों के सामने टेक दिए घुटने 

यह भले ही उपचुनाव था, लेकिन इस चुनाव को जद (यू) व राजद के लिए प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा था। जेडीयू प्रत्याशी के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी जमकर प्रचार किया और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भी पूरी तैयारी के साथ मैदान में थे। यहां नीतीश की हार की एक वजह यह भी हो सकती है कि जेडीयू प्रत्याशी मुर्शीद आलम के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिसे उन्होंने नजरअंदाज कर दिया जो नीतीश के ‘मिस्टर क्लीन’ की छवि से मेल नहीं खाते हैं।

चुनाव के दौरान लोगों के बीच यह चर्चा का विषय था कि आखिर नीतीश कुमार ऐसे उम्मीदवार का चयन कैसे कर सकते हैं। नीतीश कुमार इस मुद्दे से जुड़े सवाल को टालते नजर आए। वहीं आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने सांप्रदायिकता को हथियान बनाया। दरअसल, जिस राज्य ने खुद को हमेशा सांम्प्रदायिक उन्माद से दूर रखा, उस सभी ने पिछले दिनों उसमे दफ्न होते हुए देखा। नीतीश के साथ सरकार में शामिल पार्टी के कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने पिछले दिनों लोगों में दरारें पैदा करने कोशिश की।

भागलपुर में भड़की सांप्रदायिक हिंसा मामले में मुख्य आरोपी और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे अर्जित शाश्वत ने रामनवमी के दौरान लोगों में दरारें पैदा करने की पूरी कोशिश की, लेकिन सत्ता के लिए नीतीश ने बीजेपी के लोगों के सामने घुटने टेक दिए। यही वजह है कि एक आम बिहारी इसे बर्दाश्त नहीं कर सका। लोगों के मन में कई सवाल उठे। जैसे आखिर सुशासन बाबू क्या कर रहे हैं? क्या नीतीश कुमार वाकई अपनी रीढ़ गिरवी रखवा दी है? लोगों ने पूछा कहां गया आपका प्रशासनिक हंटर…जिसकी वजह से आपको हम लोगों ने सुशासन बाबू का दर्जा दिया था?

मुस्लिमों के बीच तेजस्वी ने खुद को किया स्थापित

ये विधानसभा क्षेत्र मुस्लिम बहुल इलाका है और दोनों ही नेताओं में मुस्लिमों के बीच खुद को बड़ा नेता स्थापित करने की होड़ थी, जिसमें आखिरकार तेजस्वी ने बाजी मार ली है। क्योंकि इस उपचुनाव में मुस्लिम फैक्टर नीतीश की हार की मुख्य वजह हो सकती है। दरअसल जानकारों का कहना है कि नीतीश कुमार का बीजेपी के साथ जाना शायद मुस्लिम समुदाय को रास नहीं आया और यही वजह है कि उनके समर्थक मतदाता धीरे-धीरे कटते जा रहे हैं। जिसका खामियाजा उन्हें एक के बाद दूसरे उपचुनावों में उठाना पड़ रहा है। साथ ही जेडीयू की यह हार बताती है कि नीतीश कुमार की लोकप्रियता कम हो रही है।

तेजस्वी यादव ने साबित किया है कि अपने पिता व राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव की गैरमौजदूगी में भी वे राजद को जीत दिलाने में सक्षम हैं। इस नतीजों ने नीतीश की चुनौती बढ़ा दी है। अगले साल होने वाले आम चुनावों से पहले बीजेपी के साथ सीटों का मोलभाव करने की उनकी ताकत कम कर दी है। इसलिए, आने वाले चुनाव में जदयू की भूमिका बड़े भाई की जगह छोटे भाई की हो जाए तो हैरान मत होइएगा। तेजस्वी ने नीतीश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वह सुशासन से समझौता करेंगे, तो उन्हें ऐसे ही हार देखने पड़ेंगे और उनके समर्थक भी कटते चले जाएंगे।

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