“RBI पर जबरन थोपा गया था नोटबंदी का फैसला, कालेधन पर अंकुश लगाने के लिए नोटबंदी के विचार से असहमत थे केंद्रीय बैंक के डायरेक्टर्स”

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क्या 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने नोटबंदी का ऐलान भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मंजूरी के बिना ही कर दिया था? दरअसल, नोटबंदी के ऐलान के पीछे मोदी सरकार की मंशा काले धन के खात्मे की थी। हालांकि, कांग्रेस का दावा है कि आरबीआई के कुछ डायरेक्टर्स सरकार के इस विचार से सहमत नहीं थे। कांग्रेस के मुताबिक, आरबीआई बोर्ड की बैठक नोटबंदी के ऐलान के बस कुछ घंटे पहले ही हुई थी और बोर्ड द्वारा सरकार के सभी दावों खारिज करने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी का ऐलान कर दिया था।

File Photo: AFP

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नोटबंदी को लेकर कांग्रेस द्वारा किए गए इस सनसनीखेज दावों की वजह से बीजेपी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। कांग्रेस ने आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की बैठक के विवरण का हवाला देते हुए सोमवार (11 मार्च) को दावा किया कि नोटबंदी के लिए प्रधानमंत्री ने कालेधन पर अंकुश लगने सहित जो कारण गिनाए थे, उन्हें केंद्रीय बैंक ने इस कदम की घोषणा से कुछ घंटे पहले ही खारिज दिया था, इसके बावजूद नोटबंदी का फैसला उस पर थोपा गया।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड के बारे में आरटीआई से मिली जानकारी का ब्योरा रखते हुए सोमवार को यह भी कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार बनी तो नोटबंदी के बाद करचोरी के लिए पनाहगाह माने जाने वाली जगहों पर पैसे ले जाने में असामान्य बढ़ोतरी और देश के बैंकों में असामान्य ढंग से पैसे जमा किए जाने के मामलों की जांच की जाएगी।

पीटीआई/भाषा के मुताबिक रमेश ने सोमवार को प्रेस कॉन्फेंस के दौरान पत्रकारों से कहा, ‘‘8 नवंबर, 2016 को रात आठ बजे नोटबंदी की घोषणा हुई। उसी से कुछ घंटे पहले आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की बैठक हुई। उस बैठक में क्या हुआ किसी को पता नहीं चला। आरबीआई के गवर्नर रहते हुए उर्जित पटेल तीन बार संसद की समितियों के समक्ष आये। तीनों बैठकों में उन्होंने यह नहीं बताया कि आरबीआई की बैठक में क्या हुआ था? अब 26 महीने बाद आरटीआई के जरिए उस बैठक का ब्योरा सामने आया है।’’

दरअसल, टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी के ऐलान से तीन घंटे पहले शाम 5.30 बजे के आरबीआई की बोर्ड मीटिंग में कुछ डायरेक्टरों ने कहा, ‘ज्यादातर काला धन नोटों के रूप में नहीं, बल्कि सोना, जमीन, मकान, दुकान जैसे रीयल एस्टेट के रूप में रखे जाते हैं और इस (नोटबंदी के) कदम से उन संपत्तियों पर कोई भौतिक असर नहीं होगा।’ उन्होंने आगे कहा था, ‘जाली नोटों का छोटी सी संख्या भी चिंता का विषय है, लेकिन सर्कुलेशन में मौजूद नोटों के प्रतिशत के रूप में 400 करोड़ रुपये का आंकड़ा बहुत ज्यादा नहीं है।’

कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘इस बैठक में कहा गया कि कालाधन मुख्य रूप से सोना और रियल स्टेट के रूप में है। इसलिए नोटबंदी का कालेधन पर कोई बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। जाली नोटों के बारे में बहुत बातें की गई थीं, लेकिन बैठक में कहा गया है कि नोटबंदी से जाली नोटों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। रिजर्व बैंक का यह भी कहना था कि नोटबंदी का पर्यटन पर तात्कालिक नकारात्मक असर होगा।’’

जयराम रमेश ने दावा किया, ‘‘नोटबंदी को लेकर जो कारण दिए गए थे, उनको आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड ने नकारा था। इन सबके बावजूद आरबीआई ने कहा कि वह नोटबंदी के साथ है। इसका मतलब कि आरबीआई पर दबाव डाला गया। नोटबंदी का फैसला उस पर थोपा गया था।’’ उन्होंन आरोप लगाया था कि नोटबंदी एक ‘तुगलकी फरमान’ और ‘घोटाला’ था जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया।

आपको बता दें कि 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को प्रचलन से बाहर करने की घोषणा की थी। उस वक्त बाजार में चल रही कुल करेंसी का 86 प्रतिशत हिस्सा यही नोट थे। जानकारों ने तभी नोटबंदी के फैसले के कारण अर्थव्यवस्था की हालत बुरी होने, बेरोजगारी बढ़ने और सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी कम होने की आशंका जताई थी और नोटबंदी के बाद जितने भी रिपोर्ट आए उसमें यह साबित भी हुआ।

 

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