अयोध्या भूमि विवाद मामला: वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने बताया कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अंदर हिंदू महासभा के नक्शे को क्यों फाड़ा

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अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ आखिरी सुनवाई बुधवार (16 अक्टूबर) को शाम चार बजे पूरी कर ली। सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद की सुनवाई के दौरान पल-पल बदलते घटनाक्रम के बीच मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने अखिल भारतीय हिंदू महासभा द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों और नक्शे को फाड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने दस्तावेजों और नक्शे को फाड़ने के अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उन्हें ऐसा करने की अनुमति दी थी।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील राजीव धवन
फाइल फोटो: राजीव धवन

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, राजीव धवन ने नक्शा फाड़ने को लेकर कहा- मैंने कहा था कि मैं इसे फेंक रहा हूं। चीफ जस्टिस ने कहा कि जो करना है करो, तो मैंने फाड़ दिया। इसलिए मैं यह कहता हूं कि यह अदालत की अनुमति से था। अब वो सोशल मीडिया पर चल रहा है। इस पर सीजेआई रंजन गोगाई ने कहा कि आप सफाई दे सकते हैं कि CJI ने फाड़ने को कहा था। वहीं, जस्टिस नजीर ने कहा कि ये खबर वायरल हो रही है, हमने भी देखी है।

राजीव धवन के सुनवाई के दौरान कहा, 6 दिसंबर 1992 को जिसे नष्ट किया गया वो हमारी प्रोपर्टी थी। हम कह चुके हैं कि मुस्लिम वक़्फ़ एक्ट 1860 से ही ये सारा गवर्न होता है। वक़्फ़ सम्पत्ति का मतवल्ली ही रखरखाव का जिम्मेदार होता है। उसे बोर्ड नियुक्त करता है। सनद यानी रजिस्टर में रज्जब अली ने मस्जिद के लिए फ्री लैंड वाले गांव की ज़मीन से 323 रुपए की आमदनी ग्रांट के तौर पर दर्ज की है।

गौरतलब है कि, सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मुकदमे की सुनवाई पूरी हो गई है। इससे पहले, भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 17 अक्टूबर तक समाप्त होने वाले भूमि विवाद मामले में सभी दलीलें मांगी थीं। अब इस समय सीमा को एक दिन पहले कर दिया गया है।सुनवाई खत्म होने के साथ ही अयोध्या प्रशासन ने 10 दिसंबर तक क्षेत्र में धारा 144 लगा दी है।

उल्लेखनीय है कि, संविधान पीठ अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि को तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच बराबर-बराबर बांटने का आदेश देने संबंधी इलाहाबाद हाईकोर्ट के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर सुनवाई कर रही है।

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