लोकसेवकों के अध्यादेश पर राहुल गांधी ने वसुंधरा सरकार को घेरा, कहा- मुख्यमंत्री जी ये 21वीं शताब्दी है, 1817 नहीं

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राजस्थान में लोकसेवकों पर मुकदमे से पहले राज्य सरकार की मंजूरी लेने के अध्यादेश पर सियासत गरमा गई है। जहां एक ओर सरकार का तर्क है कि इससे सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को बेवजह परेशान करने से निजात मिलेगी, वहीं विपक्ष ने इसे भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाला कदम करार दिया है।

(Getty Images)

इस बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी वसुंधरा सरकार पर निशाना साधा है। राहुल गांधी ने रविवार (22 अक्टूबर) को इंडियन एक्सप्रेस के एक खबर को शेयर करते हुए ट्वीट कर लिखा है, ‘मैडम चीफ मिनिस्टर, हम 21वीं सदी में रह रहे हैं। यह साल 2017 है, 1817 नहीं।’

दरअसल, 1817 का जिक्र करने की एक वजह है। रिपोर्ट के मुताबिक 1794 से लेकर 1827 तक ग्वालियर में दौलतराव सिंधिया का शासन था। 1816 में अंग्रेजों ने पिंडारियों के दमन के लिए सिंधिया घराने से सहयोग करने को मांगा। कुछ समय तक सिंधिया घराना अंग्रेजों के आमंत्रण पर ऊहापोह की स्थिति में रहा, अगले साल 1817 में पूर्ण सहयोग का वादा करते हुए ग्वालियर की संधि हुई। इसी संधि के जरिए राहुल ने वसुंधरा सरकार पर हमला बोला है।

इससे पहले राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष सचिन पायलट ने राज्य की वसुंधरा राजे सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि, ‘हम सरकार के इस कदम से हैरान हैं। इससे पता चलता है कि सरकार भ्रष्टाचार को संस्थागत करने की कोशिश कर रही है। राज्य सरकार इसके जरिए उन लोगों को बचाना चाहती है, जिनके जरिए राज्य में भ्रष्टाचार और घोटाले करवाए गए हैं।’

वहीं, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राधेकांत सक्सेना और प्रदेश अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव ने इस अध्यादेश का विरोध करते हुए कहा है कि इससे अदालतों और मीडिया के अधिकार सीमित हो जायेंगे। पीयूसीएल ने कहा कि इस अध्यादेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी जाएगी।

सक्सेना ने आरोप लगाया कि अपने गलत कारनामों पर पर्दा डालने के लिए राजस्थान सरकार संवैधानिक व सुप्रीम कोर्ट के घोषित कानूनों के विरुद्ध जाकर इस तरह के संशोधन लाई है। जबकि राज्य के गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया ने इस कदम का बचाव किया है। कटारिया ने कहा कि यह अध्यादेश लोकप्रियता पाने के इरादे से सरकार के कामकाज में बाधा उत्पन्न करने वाले लोगों पर लगाम लगाने के लिये लाया गया है।

क्या है राजस्थान सरकार के अध्यादेश में?

दरअसल, राजस्थान सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर दंड प्रक्रिया संहिता व भारतीय दंड संहिता में संशोधन किया है जिसके तहत राज्य सरकार की मंजूरी के बिना शिकायत पर जांच के आदेश देने और जिसके खिलाफ मामला लंबित है, उसकी पहचान सार्वजनिक करने पर रोक लगा दी गई है।

अध्यादेश के अनुसार, राज्य सरकार की मंजूरी नहीं मिलने तक जिसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाना है, उसकी तस्वीर, नाम, पता और परिवार की जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकेगी। इसकी अनदेखी करने पर दो साल की कैद और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

गत सात सितंबर को जारी अध्यादेश के अनुसार, सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत अदालत शिकायत पर सीधे जांच का आदेश नहीं दे पाएगी। अदालत, राज्य सरकार से अनुमति मिलने के बाद ही जांच के आदेश दे सकेगी। अध्यादेश के तहत राज्य सरकार की मंजूरी के बिना लोक सेवकों के खिलाफ पुलिस ना कोई मुकदमा दर्ज कर सकेगी, ना ही जांच कर सकेगी, ना ही मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दे सकेगा।

 

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