आलोक वर्मा को पद से हटाए जाने पर घिरी मोदी सरकार, राहुल गांधी से लेकर कानून के जानकारों ने राफेल से जोड़ उठाए गंभीर सवाल

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केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) प्रमुख आलोक वर्मा को उनके पद हटाए जाने के बाद से ही सियासी बयानबाजी शुरू हो गई है। आलोक वर्मा को हटाए जाने पर सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार पर कांग्रेस हमलावर है। बता दें कि एक अभूतपूर्व कदम के तहत आलोक वर्मा को सीबीआई के निदेशक पद से गुरुवार (10 जनवरी) को हटा दिया गया। उनको हटाने का फैसला तीन सदस्यीय एक उच्चस्तरीय चयन समिति द्वारा 2-1 के बहुमत से लिया गया। उन्हें भ्रष्टाचार और कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही के आरोपों में पद से हटाया गया।

इससे दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने वर्मा को सीबीआई निदेशक के रूप में फिर से बहाल कर दिया था। इसके बाद आलोक वर्मा ने बुधवार को अपना कार्यभार दोबारा संभाला था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यों वाली समिति ने लंबी बैठक के बाद आलोक वर्मा को सीबीआई प्रमुख के पद से हटाने का फैसला किया गया। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लोक सभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की ओर से नियुक्त जस्टिस एके सीकरी भी शामिल थे। खड़गे ने वर्मा को सीबीआई निदेशक पद से हटाने के फैसले का विरोध किया था।

विपक्ष सहित जानकारों ने उठाए सवाल

आलोक वर्मा को सीबीआई के निदेशक पद से हटाने पर विपक्षी दलों और कानूनी विशेषज्ञों ने जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि यह सरकार की ‘हताशा’ है ‘क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राफेल जेट सौदे में कोई जांच नहीं चाहते हैं।’ फैसले के आलोचकों ने यह भी पूछा कि चयन समिति वर्मा का पक्ष सुने बिना फैसला कैसे सुना सकती है।

कांग्रेस ने समिति के फैसले की आलोचना की और कहा कि मोदी ने यह दिखाया है कि वे राफेल सौदे की जांच से ‘बहुत डर गए’ हैं। कांग्रेस ने ट्वीट किया, “आलोक वर्मा को उनका पक्ष रखने का मौका दिए बिना, उन्हें पद से हटाकर पीएम मोदी ने एक बार फिर दिखाया है कि वह जांच से बहुत डरते हैं, चाहे वह स्वतंत्र सीबीआई निदेशक द्वारा की जाए या संसद द्वारा जेपीसी के माध्यम से की जाए।”

वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लिखा है, ”मिस्टर मोदी के दिमाग में डर हावी हो चुका है। वे रात को सो नहीं पा रहे। उन्होंने आईएएफ से 30 हजार करोड़ रुपए चोरी किए और अनिल अंबानी को दे दिए। सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को लगातार दो बार पद से हटाना, साफतौर पर दर्शाता है कि वे अपने ही झूठ में फंस चुके हैं। सत्यमेव जयते”

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने प्रधानमंत्री की भूमिका में ‘हितों के टकराव’ की बात कही क्योंकि प्रधानमंत्री उस तीन सदस्यीय समिति का हिस्सा हैं जिसने वर्मा को पद से हटाया है। इसमें लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और सर्वोच्च न्यायालय के मनोनीत प्रतिनिधि प्रधान न्यायाधीश द्वारा नामित न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी हैं।

उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ”ब्रेकिंग! आलोक वर्मा के सीबीआई निदेशक के पद पर लौटने के एक दिन बाद ही मोदी के नेतृत्व में बनी समिति ने उन्हें दोबारा पद से हटा दिया है और वो भी उनकी सुनवाई के बिना। यह सब इस डर से किया गया कि आलोक वर्मा मोदी के खिलाफ राफेल सौदे से जुड़ी एक एफआईआर करने जा रहे थे।” उन्होंने कहा कि आलोक वर्मा का पक्ष सुने बिना समिति यह कैसे तय कर सकती है? यह सरकार की हताशा को दर्शाता है। इसमें प्रधानमंत्री के हितों का टकराव है। इतनी हताशा, किसी भी जांच को रोकने के लिए है।

एक अन्य वरिष्ठ वकील व राज्यसभा सदस्य मजीद मेमन ने वर्मा को हटाने को ‘सत्ता का अतिक्रमण’ करार दिया। मेमन ने कहा, “आलोक वर्मा के खिलाफ चयन समिति का फैसला पूरी तरह से ‘सत्ता का अतिक्रमण’ है। समिति को उनकी बात सुननी चाहिए थी। मामले में सीवीसी की भूमिका भी संदेह के घेरे में है।”

कांग्रेस नेता व वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्मा को आरोपों के आधार पर हटा दिया गया, जबकि सीवीसी की कोई विश्वसनीयता नहीं है। उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री इस बात से आशंकित हैं कि उनके खिलाफ जांच होने पर कई सबूत सामने आएंगे।”

वहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा ने तंज सकते हुए ट्वीट किया, ”आलोक वर्मा दमकल विभाग में डीजी का महत्वपूर्ण पद दिया गया है। उन्हें इससे खुश होना चाहिए। अब अस्थाना को सीबीआई का निदेशक बना देना चाहिए। इसके साथ ही न्याय की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। जो इंसान संस्थानों को बर्बाद करे वह जिंदाबाद।’

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, बीते साल के अंत में सीबीआई के दो वरिष्ठ अधिकारियों निदेशक आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच आपसी मतभेद खुलकर सामने आए थे। दोनों अधिकारियों ने एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगाए थे। जिसके बाद झगड़े के मद्देनजर सरकार ने 23 अक्टूबर 2018 की देर रात विवादास्पद सरकारी आदेश के जरिए दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया गया था। जिसके बाद वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में सरकार के आदेश को चुनौती दी थी।

शीर्ष अदालत ने मंगलवार (8 जनवरी) को मोदी सरकारी आदेश को निरस्त कर दिया था, लेकिन उनपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की सीवीसी जांच पूरी होने तक उनके कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला करने पर रोक लगा दी थी। शीर्ष अदालत ने कहा था कि वर्मा के खिलाफ कोई भी आगे का फैसला उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति एक सप्ताह के भीतर करेगी। यह समिति सीबीआई निदेशक का चयन करती है और उनकी नियुक्ति करती है। अब एक बार फिर एक अभूतपूर्व कदम के तहत वर्मा को सीबीआई निदेशक पद से गुरुवार (10 जनवरी) को हटा दिया गया। उनको हटाने का फैसला तीन सदस्यीय एक उच्चस्तरीय चयन समिति द्वारा 2-1 के बहुमत से लिया गया।

इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की ओर से नियुक्त जस्टिस एके सीकरी भी शामिल थे। खड़गे ने सीबीआई निदेशक को पद से हटाने के कदम का विरोध किया था। फिलहाल, वर्मा को केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत दमकल सेवा, नागरिक रक्षा और होमगार्ड महानिदेशक के पद पर तैनात किया गया है। साथ ही सीबीआई का प्रभार अतिरिक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को दिया गया है। वर्मा का दो वर्षों का निर्धारित कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त होने वाला है और वह उसी दिन सेवानिवृत्त होने वाले हैं।

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