दूसरे कार्यकाल की पहली ‘मन की बात’ में पीएम नरेंद्र मोदी ने जल संकट पर दिया जोर

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ‘मन की बात’ कार्यक्रम में जल संकट की समस्या से निपटने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें भारत के लोगों पर हमेशा से विश्वास था कि वे उन्हें एक बार फिर वापस लाएंगे। प्रधानमंत्री लोकसभा चुनाव जीतने के बाद अपने दूसरे कार्यकाल में रविवार (30 जून) को अपना पहला ‘मन की बात’ कार्यक्रम किया। उनका यह कार्यक्रम लगभग चार महीने बाद हुआ है।

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File Photo

प्रधानमंत्री मोदी ने देश में पानी की कमी को देखते हुए देशवासियों से जल संरक्षण के लिए जन आंदोलन शुरू करने का आह्वान करते हुए कहा कि इसके लिए पारंपरिक तौर तरीकों पर जोर दिया जाना चाहिए। इस दौरान उन्होंने कहा कि आपातकाल, इसके परिणामों, लोगों के सुझाव जो हमेशा उनके समाधान के साथ उन्हें हैरान करते हैं, इन सब पर बोलने के साथ ही मोदी ने देश के विशाल हिस्सों में बड़े पैमाने पर सूखे से निपटने के लिए जल संरक्षण पर जोर दिया।

मोदी ने आकाशवाणी पर अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘ मन की बात’ में राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि जैसे स्वच्छता अभियान को एक जन आंदोलन का रुप दिया गया है वैसे ही जल संरक्षण के लिए भी जन आंदोलन शुरु किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूरे देश में जल संकट से निपटने का कोई एक फॉर्मूला नहीं हो सकता है। इसके लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में, अलग-अलग तरीके से, प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन सबका लक्ष्य एक ही है और वह है पानी बचाना, जल संरक्षण।

प्रधानमंत्री ने कहा, “हम सब साथ मिलकर पानी की हर बूंद को बचाने का संकल्प करें और मेरा तो विश्वास है कि पानी परमेश्वर का दिया हुआ प्रसाद है, पानी पारस का रूप है। पहले कहते थे कि पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है। मैं कहता हूं, पानी पारस है और पारस से, पानी के स्पर्श से, नवजीवन निर्मित हो जाता है। पानी की एक-एक बूंद को बचाने के लिए एक जागरूकता अभियान की शुरुआत करें।”

मोदी ने कहा कि जन आंदोलन में पानी से जुड़ी समस्याओं के बारे में बताया जाना चाहिए और पानी बचाने के तरीकों का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “मैं विशेष रूप से अलग-अलग क्षेत्र की हस्तियों से, जल संरक्षण के लिए, नव अभियानों का नेतृत्व करने का आग्रह करता हूं। फिल्म जगत हो, खेल जगत हो, मीडिया के हमारे साथी हों, सामाजिक संगठनों से जुड़ें हुए लोग हों, सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ें हुए लोग हों, कथा-कीर्तन करने वाले लोग हों, हर कोई अपने-अपने तरीके से इस आंदोलन का नेतृत्व करें।”

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